जी हां, मैं कोरोना हूं!

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मैं कोरोना हूं।

           क्या कहा आपने, सही नहीं सुना? नहीं सुना होगा। घर पर होते तो मुझे सुन लेते। मगर आप तो भीड़ में हैं। भीड़ का शोरगुल और वाहनों की चिल्लपों आप तक मेरी आवाज को ठीक से नहीं आने दे रही है। 

          तो फिर से बता देता हूं। कान खोलकर सुन लीजिए। मैं कोरोना हूं। जी हां, कोरोना।

मैं चाहता हूं कि आप मुझसे डरें। आपकी सरकारें मुझसे डरी हुई हैं। आपका देश ही क्या, पूरा विश्व मुझसे डरा हुआ है। विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में शुमार कुछ तीस मारखाओं ने ठीक वैसे ही मुझे हल्के में लिया था, जैसे आप ले रहे हैं। 

          मेरे अनादर का परिणाम नहीं देख रहे। वहां पके आम की मानिंद हर रोज सैकड़ों लोग जिंदगी की डाली से टपक रहे हैं। अब तक दुनिया भर में 14441 लोगों को मौत के घाट उतारने के बाद इस वक्त मैंने 3 लाख 33 हजार लोगों को अपने मजबूत बाहुपाश में जकड़ रखा है। 

          मैं महादैत्य हूं। मगर दिखाई नहीं देता। इंसानों के शरीर ही मेरे फैलाव के प्रमुख साधन हैं। तभी तो चीन के वुहान में जन्मने के बाद महज तीन महीनों में ही मैं 190 देशों में अपनी दस्तक दे चुका हूं। 

          मैं दिखाई नहीं देता, इसीलिए तो मैंने सबकी आंखों में धूल झोंक कर कभी हवाई जहाज तो कभी पानी के जहाज से 190 देशों की यात्रा कर ली। हवाई अड्डा हो या फिर बंदरगाह, ना किसी ने टोका, ना ही रोका। मुझे तो पासपोर्ट बताने की जरुरत भी नहीं पड़ी। किसी भी देश में घुसने के बाद मुझे हवाई यात्रा की आवश्यकता भी कतई महसूस नहीं हुई। ट्रेन और बसों में बेटिकट चला। मनचाहा जिस ट्रेन और बस में बैठ। मगर किसी भी टीसी या कंडक्टर को दिखाई नहीं दिया। आपके देश में भी बीस से ज्यादा राज्यों में मेरी उपस्थिति दर्ज हो चुकी है। यह बात अलग है कि अभी मरने वालों की संख्या दहाई तक नहीं पहुंची। लेकिन मुझे संतोष है कि 450 लोग मेरी गिरफ्त में हैं।

           हां, एक बात और। यदि आप लोगों का जैसा सहयोग इस वक्त मुझे मिल रहा है, वैसा ही आगे भी मिलता रहा तो मैं जल्द ही आपके राष्ट्र को भी अमेरिका व इटली जैसे विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में ला दूंगा।

           आप अपने प्रधानमंत्री के जनता कर्फ्यू के आह्वान पर रविवार को घरों से बाहर नहीं निकले तो मैं डर गया था। चिंतित रहा कि इंसान नहीं मिले तो मैं जिन्दा कैसे रहूंगा? वही तो मेरी अनंत यात्रा का एकमात्र साधन है। कल कुछ राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने लॉक डाउन की घोषणा करके मुझे डरा दिया था। निर्भया के दरिंदों की भांति मैं भी रात भर नहीं सो पाया। सारी रात चिंता की चटाई पर करवटें बदलते निकल गई। सोचता रहा कि अगर भारत के लोग तालों में ही मुंदे रहे तो फिर कैसे जीवित रह पाऊंगा। मैं दैत्य हूं, मगर अत्यंत सूक्ष्म हूं। मेरे पैर नहीं हैं। नवजात शिशु की मानिंद मुझे भी गोदी की आवश्यकता है। आपके सहयोग से ही मैं वुहान से यत्र-तत्र-सर्वत्र पहुंचा हूं। 

           मुझे पीड़ा होती है, जब मैं इंसानों को मारता हूं। आप मेरे मित्र हैं। पालक और संवाहक हैं। आपके बिना मेरा कोई अस्तित्व नहीं हैं। मगर क्या करुं? मैं विवश हूं। क्योंकि मैं दैत्य हूं। राक्षसी धर्म निभाना मेरी विवशता है। 

हां तो बात चल रही थी, रविवार रात की। मैं सच बता रहा हूं कि कयामत की रात मानकर मैं पूरी रात नहीं सो पाया। मन और मष्तिष्क में चिंताओं के ज्वारभाटे बुरी तरह उथल मचाते रहे। जनता कर्फ्यू का मंजर देखने के बाद दूसरे दिन लॉकडाउन की कल्पना मात्र से मेरी रूह बुरी तरह कांप उठती थी। जनता कर्फ्यू के पूरे दिन भूखा रहा। भारत आने की बात पर पछतावा भी हुआ। मन में सोचा कि इससे अच्छे तो अमेरिका, इटली, ईरान और फ्रांस जैसे देश हैं, जिन्होंने मुझे भूखा तो नहीं रखा। 

          खैर, दूसरे दिन लॉकडाउन में जलने वाली क्षुधाग्नि को लेकर सारी रात नहीं सोया लेकिन सूर्य की किरणें धरती पर पड़ते ही मेरी बांछें खिल गईं। सारी चिन्ताएं जाती रहीं। मानव-मित्र मेरे सहयोग के लिए तत्पर थे। सरकारी लॉकडाउन छोटे कस्बों से लेकर महानगरों की सड़कों तक खुद ही औंधे मुंह पड़ा दिखा। लोग बेफ्रिक होकर आवाजाही करते दिखे। सरकारें जितनी चिन्तित थीं और मुझे चिन्ता की इन्हीं आड़ी-तिरछी लकीरों में अपने कल्याण का मार्ग स्पष्ट दिखाई दे रहा था। लेकिन दोपहर होते-होते पहले पंजाब और फिर महाराष्ट्र ने कर्फ्यू का ब्रम्हास्त्र चलाकर मुझे फिर से चिंता की चिता में धकेल दिया है।

           मैं जानता हूं कि हरेक युग और काल में शासक क्रूर रहे हैं लेकिन नागरिक तो हमेशा ही भोले होते हैं। इसीलिए मुझे धर्मपरायण भारत के नागरिकों पर पूरा भरोसा है कि वे अतिथि देवो भव: की शाश्वत परम्परा का निर्वाह करते हुए मुझे कदापि भूखा नहीं रखेंगे। 

          चाहे सरकार कितना भी लॉकडाउन कर ले। कर्फ्यू लगा दे। मैं जानता हूं कि हिन्दुस्तानी लोग जांबाज हैं। मैं क्या, मेरे बाप-दादे या फिर सारे पूर्वज ही निगलने क्यों ना आ जाएं, वे घरों में कैद रह ही नहीं सकते। उन्हें पता है कि विदेश से आया एक अबोध बच्चा सड़क पर गोदी के लिए निरंतर रो रहा है।

(मदन कोथुनियां वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आप आजकल जयपुर में रहते हैं।)

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