आनंद मोहन के हाथों क़त्ल किए गए आईएएस अफसर की पत्नी ने कहा- फैसले के खिलाफ जा सकती हूं सुप्रीम कोर्ट

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नई दिल्ली। “हत्या के दोषी के एक शख्स को रिहा कर नीतीश कुमार एक खतरनाक सिद्धांत स्थापित कर रहे हैं। यह फैसला अपराधियों को सरकारी कर्मचारियों पर इस लिए हमले के लिए प्रेरित करेगा क्योंकि उन्हें पता होगा कि वो आसानी से जेल से छूट जाएंगे।

केवल एक राजपूत वोट के लिए उन्होंने एक ऐसा निर्णय लिया है जिसका खामियाजा आम आदमी को भुगतना पड़ेगा। राजपूत समुदाय को इस बारे में सोचना चाहिए कि अपनी राजनीति का प्रतिनिधित्व करने के लिए क्या उन्हें आनंद मोहन जैसा एक अपराधी ही चाहिए”।

यह बात इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए आनंद मोहन के हाथों मारे गए दलित आईएएस अफसर जी कृष्णैया की पत्नी जी उमा कृष्णैया ने कही है।

आपको बता दें कि बिहार के जेल कानून में परिवर्तन कर नीतीश सरकार ने आनंद मोहन समेत 27 कैदियों को रिहा कर दिया है।

तीन दशक पूर्व हुई अपने पति की हत्या के बारे में बोलते हुए 60 वर्षीय उमा कृष्णैया की आंखों से आंसू बहने लगे। उन्होंने कहा कि “यहां तक कि मैं उनकी रिहाई के बारे में भी नहीं जानती, सोसाइटी में किसी ने मुझको बताया और इस खबर ने मेरा दिल तोड़ दिया और उसने मेरी शांति भी छीन ली।” उन्होंने आगे कहा कि “यह केवल मेरे बारे में नहीं है। मैंने तो अपनी जिंदगी जी ली। अगर स्वास्थ्य साथ देता है तो मैं कुछ साल और जिंदा रहूंगी।

लेकिन यह मामला सभी नागरिक सेवकों, सरकारी अधिकारियों और आम लोगों से जुड़ा है। क्योंकि अपराधियों का सामना उनको करना पड़ेगा। अपराधी ऐसा ही करेंगे जो उन्हें अच्छा लगेगा क्योंकि उन्हें बहुत ज्यादा समय तक दबाव का डर नहीं लगेगा। यह केवल गुंडों और ठगों को कानून अपने हाथ में लेने के लिए प्रोत्साहित करेगा। यही कारण है कि बिहार में माफियाओं का राज है। यही पहले भी था और यही आज भी है।”

उमा कृष्णैया

उन्होंने एक्सप्रेस से कहा कि “मुझे लगता है कि पीएम मोदी को इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए और उन्हें नीतीश कुमार पर दबाव बनाकर फैसले को वापस कराना चाहिए। मेरे पति एक आईएएस अफसर थे। और न्याय हो इसे सुनिश्चित करना केंद्र की जिम्मेदारी है। जब उन्हें मौत के बजाय आजीवन कारावास की सजा दी गयी थी तो भी मैं खुश नहीं थी।

अब हमें इस बात से संतोष करना पड़ेगा कि उनके हत्यारे अपनी सजा पूरी किए बगैर ही जेल से छोड़ दिए जा रहे हैं। नीतीश कुमार कुछ सीटें भी जीत सकते हैं और यहां तक कि सरकार का गठन भी कर सकते हैं। लेकिन क्या लोग इस तरह के राज नेताओं और इस तरह की सरकार में भरोसा करेंगे?”

उमा उस समय 30 साल की थीं जब 5 दिसंबर, 1994 को उनके पति की हत्या कर दी गयी थी। हत्या के दो दिन बाद ही वह हैदराबाद चली गयी थीं जहां उन्हें बेगमपेट स्थित आफिसर्स ट्रांजिट होस्टल में एक फ्लैट आवंटित कर दिया गया था। वह याद करते हुए बताती हैं कि “मेरी दो बेटियां उस समय सात और पांच साल की थीं और हम बेहद डरे हुए थे।”

आनंंद मोहन।

उसके बाद फरवरी, 1995 में उनकी बेगमपेट में स्थित महिलाओं के गवर्नमेंट डिग्री कालेज में लेक्चरर पद पर नियुक्ति हो गयी। वह 2017 में यहां से रिटायर हो गयीं। इस बीच जुबली हिल्स में उनको एक प्लाट आवंटित कर दिया गया था जहां उन्होंने अपना एक मकान बना लिया है। इस समय उनकी बड़ी बेटी निहारिका एक बैंक मैनेजर है और छोटी बेटी पद्मा एक साफ्टवेयर इंजीनियर।

उन्होंने बताया कि “मैं नहीं जानती कि एक बार फिर से कानूनी प्रक्रिया में जाने का मुझमें कितना धैर्य है। मेरे पति के साथी 1985 बैच के अफसर मेरे संपर्क में हैं और वो मुझसे पूछ रहे हैं कि क्या हमें बिहार सरकार के फैसले के खिलाफ पटना हाईकोर्ट या फिर सुप्रीम कोर्ट में जाना चाहिए। हम इसके बारे में विचार-विमर्श कर रहे हैं। मैं उनको जेल से बाहर नहीं आने देना चाहती। उन्हें जीवन भर जेल में रहना चाहिए”।

(जनचौक की रिपोर्ट।)

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