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Thursday, August 5, 2021

हवाला कांड में कड़ी कानूनी कार्रवाई हो जाती तो राजनीतिक भ्रष्टाचार पर अंकुश लग जाता

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वर्ष 1996 में देश के राजनीतिक गलियारों में तूफान लाने वाले जैन हवाला का जिक्र कर एक बार फिर ममता बनर्जी ने चिराग में बंद जैन हवाला केस के जिन्न  को बाहर निकाल दिया है। ममता बनर्जी ने गवर्नर जगदीप धनखड़ का नाम जैन हवाला केस की चार्जशीट में होने का आरोप लगाया है। राजनितिक क्षेत्रों में कहा जाता है कि हवाला कांड में कड़ी कानूनी कार्रवाई हो जाती तो देश की राजनीति में क्रांतिकारी परिवर्तन होता। इस कांड में किसी कम्युनिस्ट नेता का नाम नहीं आया था।   

जैन हवाला कांड में जिन नेताओं पर पैसे लेने का आरोप लगा था, उनमें पूर्व प्रधानमंत्री, पूर्व और वर्तमान केंद्रीय मंत्री, पूर्व मुख्यमंत्री और अन्य बड़े नेता शामिल थे। अफसरों में सचिव और कैबिनेट सचिव स्तर के अफसर थे। यदि हवाला कांड में कड़ी कानूनी कार्रवाई हो जाती तो देश के विभिन्न दलों के तत्कालीन 67 बड़े नेता टाडा में गिरफ्तार होते। टाडा इसलिए क्योंकि ऐसे विदेशी स्रोत से नेताओं ने पैसे लिए थे जो कश्मीर के आतंकियों को पैसे पहुंचाते थे।

सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड चीफ जस्टिस जेएस वर्मा, जिन्होंने हवाला मामले को सुना था और जाँच में लीपापोती के लिए सीबीआई को कई बार लताड़ लगाई थी ने बाद में कहा था कि इस मामले की तो सीबीआई ने ठीक से जांच ही नहीं की। उस कांड की फिर से जांच होनी चाहिए। जब जस्टिस वर्मा इस मामले की सुनवाई कर रहे थे तो उन्होंने अदालत में ही कह दिया था इस केस को लेकर मुझ पर बहुत दबाव पड़ रहा है। वो एक असामान्य बात थी।

आखिर सीबीआई जांच करती भी तो कैसे करती? वो लगभग सर्वदलीय घोटाला कांड जो था! उसमें देश के दर्जनों शीर्ष नेताओं पर हवाला कारोबारियों से करोड़ों रुपए का काला धन स्वीकारने का आरोप था। 1988 से लेकर 1991 तक करीब 65 करोड़ रुपए इस देश के 67 बड़े नेताओं और 3 बड़े नौकरशाहों ने हवाला काराबारियों से लिए थे। वहीं हवाला कारोबारी कश्मीरी आंतकवादियों को भी विदेशी धन पहुंचा रहे थे। उन्हीं धंधेबाजों ने 1993 में मुंबई को दहलाने के लिए आंतकवादियों को विदेशी धन दिए थे।

हवाला कांड में सीबीआई ने संबंधित हवाला करोबारी जैन बंधुओं को अघोषित कारणों से टाडा के तहत गिरफ्तार नहीं किया। उसने भ्रष्टाचार से संबंधित पहलू की समय पर जांच तक शुरू नहीं की। सीबीआई ने मामले को ‘फेरा’ के तहत प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को नहीं सौंपा। सीबीआई ने मामले को आयकर विभाग को नहीं सौंपा। राष्ट्रीय स्तर के लगभग सर्वदलीय भ्रष्टाचार के मामले की जांच में सीबीआई के हाथ-पैर फूल गये थे। इस केस की जांच की सुप्रीम कोर्ट निगरानी कर रहा था।

पत्रकार विनीत नारायण और राजेंद्र पुरी की लोकहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस वर्मा ने सीबीआई के बारे में कहा था कि लगता है कि जैन परिवार की जांच उनके लिए खासी मुश्किल है।समझ में नहीं आता कि जो बात किसी थानेदार की भी समझ में आ जाती, वो इतनी बड़ी एजेंसी की समझ में क्यों नहीं आ रही?’

24 अगस्त, 1993 के संस्करण में जनसत्ता में प्रकाशित खबर में कहा गया था कि अप्रैल 1991 में जेएनयू का शोध छात्र शहाबुद्दीन टाडा में पकड़ा गया। वो जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) का यहां एजेंट है। हवाला के जरिए विदेशों से आया पैसा वो फ्रंट को पहुंचाता है। उसकी गिरफ्तारी से कई सुराग मिले। उस सुराग पर जेके जैन के यहां 3 मई, 1991 को तलाशी हुई। तलाशी में ब्यूरो के हाथ 58 लाख रुपए नकद आए। इसके अलावा ‘दो डायरियां और एक नोटबुक भी वहां से मिले। उनमें सनसनीखेज रहस्य थे । आम तौर पर जहां इतनी रकम वगैरह मिलती है, उसके मालिक को ‘कोफेसकोसा’ के तहत गिरफ्तार कर लिया जाता है। लेकिन जेके जैन को सीबीआई ने गिरफ्तार नहीं किया।

जनसत्ता की खबर के बाद 12 नवंबर, 1994 को निखिल चक्रवर्ती के संपादन में निकलने वाली पत्रिका ‘मेन स्ट्रीम’ में समाजवादी नेता मधु लिमये के हवाले से एसके जैन की डायरी में कथित तौर पर दर्ज नाम छापे गए  इसमें तीन कैबिनेट मंत्री सहित सरकार के सात मंत्रियों, कांग्रेस के कई बड़े नेताओं, दो राज्यपालों और नेता प्रतिपक्ष लालकृष्ण आडवाणी का नाम भी लिखे गए इस लिस्ट में 55 नेता, 15 बड़े ओहदे वाले सरकारी अफसर और एस.के. जैन के 22 सहयोगियों को मिलाकर कुल 92 नामों की पहचान की गई थी। शेष 23 नामों को पहचाना नहीं जा सका

22जून, 1993 को डॉ. सुब्रमण्यन स्वामी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थीतब वो नरसिम्हा राव सरकार में हुआ करते थे उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में आरोप लगाया था कि उनके पास पर्याप्त सबूत हैं, जिससे ये साबित हो सके कि लालकृष्ण आडवाणी ने हवाला कारोबारी एस.के. जैन से दो करोड़ रुपए लिए थे

23 अगस्त को जनसत्ता ने पहले पन्ने पर ये खबर नेताओं के नाम के साथ छापी इसने राजनीतिक गलियारों में हड़कंप मचा दियाइस कथित खुलासे में लालकृष्ण आडवाणी पर 60 लाख रुपए, बलराम जाखड़ पर 83 लाख, विद्याचरण शुक्ल पर 80 लाख, कमलनाथ पर 22 लाख, माधवराव सिंधिया पर 1 करोड़, राजीव गांधी पर 2 करोड़, शरद यादव पर 5 लाख, प्रणव मुखर्जी पर 10 लाख, एआर अंतुले पर 10 लाख, चिमन भाई पटेल पर 2 करोड़, एनडी तिवारी पर 25 लाख, राजेश पायलट पर 10 लाख और मदन लाल खुराना पर 3 लाख रुपए लेने के आरोप लगे मार्च 1989 से लेकर 1991 तक कुल 64 करोड़ रुपए बांटे जाने का ब्योरा दर्ज था

आखिरकार सीबीआई  ने इस मामले में कार्रवाई करते हुए मार्च 1995 में एस.के. जैन को गिरफ्तार कर लियाजैन ने इस मामले में अदालत के सामने जो लिखित बयान दिया, उसके खुलासे और अधिक चौंकाने वाले थेएस.के. जैन ने बताया कि 1991 में मार्च से मई के बीच राजीव गांधी को चार करोड़ रुपए पहुंचाए गएइसके अलावा दो करोड़ रुपए सीताराम केसरी को भी दिए गए, जो उस समय कांग्रेस के खजांची हुआ करते थे

इसी तरह जैन ने नरसिम्हा राव और चंद्रास्वामी को भी साढ़े तीन करोड़ रुपए देने का दावा किया जैन का आरोप था कि उन्होंने नरसिम्हा राव को 50 लाख, सतीश शर्मा को 50 लाख और चंद्रास्वामी को ढाई करोड़ रुपए दिए सीबीआई ने उस समय ये कहकर बयान को तवज्जो देने से इनकार कर दिया कि जैन द्वारा किए गए सभी दावे अपुष्ट हैं, और इन्हें सबूत के तौर पर पेश नहीं किया जा सकताराजीव गाँधी पर तब आरोप लगाये गये जब उनकी हत्या हो चुकी थी। गिरफ्तारी के 20 दिन बाद 23 मार्च को जैन को जमानत पर रिहा कर दिया गया

इस मामले में CBI जांच पर शुरुआत से ही संदेह जताया जाता रहा 3 मई 1991 के छापे अशफाक और शहाबुद्दीन गोरी की निशानदेही पर डाले गए थे, लेकिन चार्जशीट में इसका कोई जिक्र नहीं किया गया एसके जैन की डायरी पर सीबीआई  ने दो साल तक कुछ बड़ा नहीं किया मामले के सामने आने के लगभग चार साल बाद पहली बार एसके जैन की गिरफ्तारी की गई और पूछताछ हुईसुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश जेएस वर्मा ने सीबीआई को खूब फटकार लगाई, लेकिन नतीजा सिफर रहा अंत में उन्हें कहना पड़ा कि वो घोड़े को तालाब तक ले जा सकते हैं, उसे पानी पीने के लिए मजबूर नहीं कर सकते

 जैसे-तैसे करके 16 जनवरी, 1996 को इस मामले में चार्जशीट दायर की गयीसबसे पहले दो नेताओं का नाम इस चार्जशीट में आया पहले एल.के. आडवाणी और दूसरे विद्याचरण शुक्ला इसके बाद 25 नेता जांच के दायरे में आये जांच शुरू हुई8 अप्रैल, 1997 को हाईकोर्ट के जज मोहम्मद शमीम अपने फैसले में लालकृष्ण आडवाणी और वीसी शुक्ला को बाइज्जत बरी कर दिया  कोर्ट ने डायरी को बुक ऑफ़ अकाउंट मानने से ही इनकार कर दिया था कोर्ट ने इसे सबूत ही नहीं माना

मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का निर्णय बरकरार रखते हुए कहा कि सीबीआई डायरी में दर्ज नामों के अलावा कोई और सबूत नहीं पेश कर पाई दिलचस्प बात यह रही कि ये सब तब हुआ, जब इस मामले में आरोपी शरद यादव ने एक टीवी इंटरव्यू में खुद स्वीकार किया था कि उन्हें किसी जैन ने पांच लाख रुपए बतौर चंदे के दिए थे

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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