Saturday, October 16, 2021

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तुर्की का हाया सोफिया म्यूजियम: अगर हिंदू राष्ट्र गलत है तो ख़िलाफत ए उस्मानिया भी सही नहीं हो सकता!

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8 जुलाई, 2020 को तुर्की के राष्ट्रपति तय्यप एर्दोगन ने चर्च से मस्जिद फिर मस्जिद से म्यूजियम बना दी गयी ऐतिहासिक इमारत हाया सोफिया को फिर से मस्जिद बनाने की घोषणा की। इसके बाद 10 जुलाई को वहां के सुप्रीम कोर्ट ने एर्दोगन के पक्ष में फैसला दिया। इस घटना के बाद दुनिया भर के मुसलमानों में खुशी की लहर दौड़ गयी और पस्ती में डूबी हुई क़ौम को एक विजय का अहसास हुआ। इस घटना के बाद मैं इंटरनेट पर मुसलमानों की प्रतिक्रिया का अध्ययन कर रहा था। 

मैं तलाश में था कि इस घटना के विरोध में इसकी मज़म्मत में मुस्लिमों की तरफ़ से कोई तो आवाज़ सुनाई देगी लेकिन जहां तक इंटरनेट पर मैं ढूंढ पाया एक भी आवाज़ विरोध की नहीं मिल पायी। जबकि समर्थन करती और खुशियां मनाती पोस्टें भरी पड़ी थीं। मेरी नज़र में यह घटना वैसी ही है जैसी बाबरी मस्जिद ढहने की है और वहां के सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी वैसा ही है जैसा नवम्बर 2019 में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद के संबंध में सुनाया। 

तुर्की में हाया सोफिया को ढहाया नहीं गया लेकिन सांकेतिक रूप से मानें तो यह ढहाने जैसा ही क़दम है। बाबरी मस्जिद, मंदिर तोड़कर बनाई गई अभी यह बात विवादित बनी हुई है लेकिन हाया सोफिया 1453 से पहले चर्च था यह ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित है। जब मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने मस्जिद बना दिये गए चर्च को 1934 में म्यूजियम में बदला तब विवाद को समाप्त करने का उनका बहुत ही समझदारी भरा क़दम था। मगर तुर्की राष्ट्रपति तय्यप एर्दोगन ने कमाल अतातुर्क के सारे किये कराए पर अपने निजी स्वार्थ में पानी फेर दिया और दुनिया भर में मुसलमानों की जो खराब छवि बना दी गयी है उसको और खराब कर दिया। उनके इस काम से मुसलमानों की जो बुनियादी समस्यायें हैं वो हल होने की जगह और बढ़ गईं।

उनका यह तरीक़ा वैसा ही है जैसा कि लोगों को रोज़गार देने उनकी गरीबी दूर करने की जगह किसी शहर का नाम बदल देना।

एर्दोगन अपनी नाकामयाबी छिपाने के लिये इस तरह की हरकतें कर रहे हैं और वो इस तरह की हरकतों से दुनिया भर के मुसलमानों के ख़लीफ़ा बनना चाहते है। उन्होंने वैसे ही मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क द्वारा बनाये गए धर्मनिरपेक्ष तुर्की को गैर धर्मनिरपेक्ष रास्ते पर डालकर बर्बादी में धकेल दिया है। वो समस्या ग्रस्त अपनी जनता को ख़िलाफ़त ए उस्मानिया की वापसी का ख्वाब दिखा रहे है उनका यह ख्वाब वैसा ही है जैसा भारत में हिन्दू राष्ट्र का दिखाया जा रहा है। 

अगर हिन्दू राष्ट्र का ख्वाब गलत है तो ख़िलाफ़त क़ायम करने का ख्वाब भी खारिज करने लायक़ है। यह नहीं हो सकता कि एक तरह के राज की आप हिमायत करें और दूसरे तरह की मुखालफत और ऐसे काम की मज़म्मत या विरोध न करना या खामोश रहना भी एर्दोगन के निहायत ही गलत और अहमकाना काम का समर्थन करना होगा। जब बाबरी मस्जिद तोड़ी गयी थी तब भी भारत ही नहीं दुनिया भर के धर्मनिरपेक्ष गैर मुस्लिम लोगों ने उसकी मुखालफत और मज़म्मत की थी। जबकि एरदुगान के इस नाजायज़ क़दम की मुसलमानों को मज़म्मत करनी चाहिये न कि समर्थन। कोई करे न करे लेकिन मेरी यह ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी बनती है कि मैं इस गैर जरूरी और अविवेकपूर्ण क़दम का विरोध और मज़म्मत करूं।

(लेखक मुशर्रफ अली जनवादी लेखक संघ से जुड़े हैं और आजकल मुरादाबाद में रहते हैं।)

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