Sunday, May 22, 2022

चुनाव से बात नहीं बनी, तो जनता को संभालना होगा मोर्चा

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पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, गोवा और मणिपुर राज्यों के विधान सभा चुनावों के बीच में अब ध्यान 10 मार्च की ओर खिंच रहा है कि वह तारीख हमारे लिए क्या भविष्य लेकर आएगी।

इन चुनावों को बेहद अहम माना जा रहा है – न केवल राजनीतिक दलों व व्यक्तिगत प्रत्याशियों के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए, जिसे इस समय एक ज्वालामुखी के मुहाने पर धकेला जा चुका है। साथ ही, यह पहला चुनाव है जब से ऐतिहासिक किसान आंदोलन स्थगित हुआ, और जिसमें पंजाब, हरियाणा व उत्तर प्रदेश (और कुछ हद तक उत्तराखण्ड के) किसानों की मुख्य भूमिका रही। यह उत्तर प्रदेश का भी पहला विधानसभा चुनाव है जब से वह बाकायदा हिंदू राष्ट्र के निर्माण की अघोषित प्रयोगशाला बना और जिसके मुख्यमंत्री ने हमारे राजनीतिक शब्दकोष को एक नया शब्द दिया – ठोकतंत्र! जिसे अब उनका दल, राज्य व देश में कानून व्यवस्था के तमगे की तरह प्रचारित कर रहा है।

सो जब 10 मार्च को इन चुनावों के परिणाम घोषित होंगे तो स्वतः ही सवाल उठता है कि उसके बाद का परिदृश्य कैसा होगा? किस-किस तरह की संभावनाएं बनती हैं? हम भविष्य से क्या आशा रख सकते हैं?

इन सवालों के जवाब में, कोई राजनीतिक विश्लेषण करने का इरादा नहीं है कि इन पांच राज्यों में किस दल की सरकार बनने की उम्मीद है, क्या जोड़-तोड़ रहेगा, कहां-कहां क्या खरीद-फरोख्त होने वाली है, आदि। फिलहाल तो यही उम्मीद कर सकते हैं कि चुनाव निष्पक्ष गुजर जाएं, हालांकि यह कुछ ज्यादा ही उम्मीद करने जैसा है – चुनाव आयोग, सरकारी तंत्र, समानांतर आईटी सेक्टर, गोदी मीडिया, भक्तगण और ईवीएम की परिस्थितियों को देखते हुए।

दरअसल सवाल कुछ गहरे स्तर पर देखने का है कि इन चुनावों के परिणामों का क्या असर होगा लोक पर – व्यक्ति, समुदाय, समाज, देश के तौर पर। अतः फिलहाल दो ही परिणामों पर विचार किया जा रहा है – भाजपा की जीत अथवा मौजूदा विपक्ष की जीत।

अगर भाजपा जीतती है, तो मामला खासा सीधा-साधा ही है, माने वही क्रम जो अभी चला आ रहा है। यहां किन्हीं सार्थक पहलों व कार्यक्रमों के क्रम की बात नहीं हो रही, बल्कि संस्थानों, कार्यपालिकाओं-न्यायपालिकाओं व सामाजिक ताने-बाने के विध्वंस की हो रही है, जिसे हम कुछ सालों से देख ही रहे हैं। हां, रफ्तार जरूर बढ़ा दी जाएगी और कार्यान्वयन अधिक तत्काल व निर्लज्ज।

प्रधानमंत्री ने लोकसभा व राज्यसभा में हाल के अपने भाषणों में उसके पर्याप्त संकेत दे दिए हैं। उनसे स्पष्ट है कि न सिर्फ संसद का भवन गिराया जाना है बल्कि उसकी आत्मा का भी मटियामेट करना है। वार्षिक बजट की जगह एक 25 साल का झालर हवा में फहराना, उस दिशा में पहला कदम है। आपको याद है न कि वार्षिक रेल बजट का खात्मा, अंततः उसके निजीकरण की दिशा की तैयारी में एक कदम साबित हो रहा है। अब उसमें नौकरियों की संभावना नही रहेगी, चाहे उनके लिए परीक्षाएं करवाने व फिर रद्द करने का सीरियल ही अभी कुछ और क्यों न चलाना पड़े। वही हाल अन्य सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों का भी शुरू हो चुका है और जिनका नहीं हुआ है, उनका होना  भी अवश्यंभावी है। देखा जाए तो 25 वर्ष का स्वप्न दिखाना कितना सहूलियत भरा है न! भला तब तक जवाबदेही के लिए इसके कर्ता होंगे कहां? यह अब साफ है कि यह सरकार न जनता, न संविधान के प्रति जवाबदेह होना चाहती है और न होगी। संविधान की अवमानना की घटनाएं तो काफी हो ही चुकी हैं लेकिन अब उसके आमूलचूल परिवर्तन या संघीकरण की संभावना तीव्रतर होती जाएगी। आगे-पीछे, तिरंगा भी निशाने पर रहेगा ही।

अगर ये विधानसभा चुनाव भाजपा जीतती है तो सबसे पहले जो होगा, वह यह कि राष्ट्रपति भवन का अगला निवासी एक और कठपुलती होगा, जो शायद सरकार की अहम मांग ‘‘एक देश-एक चुनाव’’ और आगे जा कर ‘‘एक देश-एक वोट’’ को फलीभूत करेगा। इसका प्रभाव होगा कि देश का वर्तमान संघीय ढांचा बदल कर अमरीका सरीखा राष्ट्रपति के शासन का स्वरूप ले सकता है। और हो सकता है कि वह कुछ ही कदमों के बाद, ‘‘एक देश-एक आजन्म राष्ट्रपति’’ का देश बन जाए। दुनिया और इतिहास में इसके अनेक उदाहरण हैं, जिनसे यह सरकार व आरएसएस प्रेरणा लेती ही आयी है। और इन सब बदलावों के उत्सव में शहरों, जिलों, स्टेडियमों, संस्थानों, पार्कों, दीवारों और क्या-क्या नहीं के नये नामकरण किये जाएंगे। चौराहे-चौराहे, दांए-बांए पोस्टर और हाथ हिलाती मूर्तियां होंगी। वास्तव में जैसे अंग्रेजी में कथन है, बड़ा भाई देख रहा है!

‘‘मन की बात’’, मासिक से पाक्षिक या साप्ताहिक हो सकती है। और उसके बिंदु रोज सुबह व्हाट्सएप्प पर ‘सुप्रभात’ के संदेशों की तरह भी आ सकते हैं – अर्थात् आप नाश्ते के साथ फूहड़ ज्ञान, झूठ, कल्पित शिकायतें और पुनः गढ़ा इतिहास का सेवन कर सकते हैं। क्या विश्वविद्यालयों में ‘‘इतिहास व परिकथाएं’’ जैसे कुछ नये विभाग खोले जाएंगे?

उमर खालिद, आनंद तेलतुम्बड़े, गौतम नवलखा व उन जैसे कितने ही कैदियों के खुली हवा में सांस लेने की उम्मीदें जल्द पूरी होने के आसार कम ही हैं।

प्रधानमंत्री की आँखों का तारा अडानी तो अब अंबानी को पीछे छोड़ देश का सबसे अमीर व्यक्ति हो ही गया है। क्या उसके बाद अब जय शाह का नंबर होगा?

और…. और…. और…. सूची लंबी है और उसमें बहुत कुछ है जिससे हम परिचित हैं ही, लेकिन बहुत कुछ ऐसा भी हो सकता है जिसका हम अभी अंदाजा नहीं लगा सकते।

तो चुनाव परिणाम की विपरीत संभावना पर नजर डालते हैं। अगर इन विधानसभा चुनावों में विपक्ष की जीत होती है तो किस तरह की परिस्थितियां उभर सकती हैं? क्या जिन भय व आशंकाओं का वर्णन ऊपर किया गया है, क्या उन सब का उलट होगा?

ऐसा सोचना, कुछ ज्यादा ही उम्मीद लगा बैठना होगा। विपक्ष की जीत के बाद का परिदृष्य इतना सीधा व सपाट भी नहीं है जितना हम बैठे-बैठे सोचना चाहते हैं।

केन्द्र की सरकार के अभी दो साल तो हैं ही। यह सरकार साम-दाम-दंड-भेद के भरपूर उपयोग में विश्वास करती है। वह अपनी प्राथमिकताएं बदलेगी या अपना व्यवहार व विचार, ऐसी अपेक्षा हमें कत्तई नहीं करनी चाहिए। आपको क्या लगता है कि वह अपनी हार को पूरी नम्रता से स्वीकार कर लेगी? वह तो जब सिक्का उछालती है तो मानती है कि ‘‘पट्ट पड़ा तो मैं जीता, चित्त पड़ा तो तू हारा’’!

और, क्या लगता है, उत्तर  प्रदेश में गुण्डागर्दी फिर होने लगेगी? वैसे इस शासन में गुण्डागर्दी नहीं हुई है, यह अपने-आप में सबसे बड़ा झूठ है। लेकिन अगर मान भी लिया जाए और यह भी कि वर्तमान के विपक्ष के किसी दल के वहां शासन में गुण्डागर्दी लौट आएगी, तो वैसा होने की संभावना इसलिए ज्यादा होगी कि तब वहां भाजपा विपक्ष में होगी।

अतः परिवर्तन न तो आसान होगा, न जल्दी ही। हां, विपक्ष की जीत से इतना जरूर होगा कि उम्मीद की खिड़की हल्की सी खुलेगी। उस सुराग से आप आवाजें सुनने लगेंगे, जो अभी तक भय या अन्य कारणों से बंद थीं। खिड़की में वह सुराग कितना और खुल सकता है, ये अगली सरकारों व देश में विपक्षी दलों पर निर्भर करता है कि वे क्या करते हैं। लेकिन राजनेताओं की चमड़ी मोटी होती है और पुरानी आदतें आसानी से नही छूटती हैं।

पिछले कुछ सालों से देश की आर्थिक परिस्थितियों, और देश भर में चले नागरिक व अन्य विरोध प्रदर्शनों व खासकर किसान आंदोलन ने देश को एक नयी सोच, नया तरीका, एक नया मिजाज दिया है। क्या इन चुनावों में जीत का ऐतिहासिक महत्व विपक्ष देख-समझ पाएगा? क्या वह उस जीत में अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारी का वरण करेगा?

तो, जैसा इन चुनावों में होता दिख रहा है, अंततः बात लोगों पर आती है, कि हम कितनी स्पष्टता, कितनी दृढ़ता, कितनी एकता के साथ खड़े रहते हैं, कि हम कितना स्वीकार करते हैं कि जब हम देश की विफलताओं की बात करते हैं तो उसमें खुद से भी सवाल करना न भूलें, कि हम अपने गली-मोहल्ला, अपने जिला, अपने राज्य, अपने देश के मसलों के लिए अपने पर ज्यादा जिम्मेवारी लें व भागीदारी करें कि सब कुछ राजनीतिक दलों व उनके झंडाबरदारों पर न पूरी तरह न छोडे़ं।

किसान, उम्मीद है, अपनी बात को आगे बढ़ाएंगे और हम उनका साथ देंगे। मजदूर भी उनके साथ आएंगे। बैंक कर्मचारी भी एक बार फिर सड़क पर उतरने को तैयार हैं। हां, युवाओं, बेरोजगारों व महिलाओं में तो बेचैनी है ही। दलित व हाशिए पर पड़े समुदाय भी ज्यादा पीछे नहीं रहेंगे।लेकिन यह सब आसान नही होगा।

विपक्ष अगर जीतता है, तो लोगों के लिए वह अति महत्वपूर्ण व कठिन दौर होगा। लोगों को अपनी दोनों आंखें खुली रखनी होंगी – एक केन्द्र में सरकार पर, दूसरी राज्यों में नयी सरकारों पर।

अमेरिका के तीसरे राष्ट्रपति व दार्शनिक, थॉमस जैफरसन का कथन है, ‘‘सतत सतर्कता ही स्वतंत्रता की कीमत है।’’

( बीजू नेगी लेखक और पर्यावरणविद हैं और आजकल देहरादून में रहते हैं।)

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