Saturday, October 16, 2021

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‘अगर ये कानून वापस नहीं लेगा तो हम यहीं ख़त्म हो जाएंगे, यहीं मर जाएंगे, घर नहीं जाएंगे’

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पंजाब के ज़िला पटियाला के रहने वाले 70 साल के हरदीप सिंह दिल्ली की दिलदारी के क़ायल हो गए हैं। ये वही बुजुर्ग हैं, जिन्होंने देश की रक्षा करने के लिए बनाए गए सुरक्षा बलों के डंडों को झेला। वो इन्हीं की तस्वीर थी, जो मोदी सरकार की बेरहमी की गवाह बनी और भाजपा के ‘झूठ उड़ाऊ सेल’ के चीफ अमित मालवीय ने जिसे प्रोपगंडा करार दिया था।

8 दिसंबर को किसानों के भारत बंद का एलान होते ही गोदी मीडिया ने दिल्ली वासियों को डराना शुरू कर दिया। ब्लैकमेल करने के जुर्म में जमानत पर छूटे गुलाम पत्रकार ख़बर भी ब्लैकमेलिंग के अंदाज़ में ही उगलते हैं, ‘‘आप नोट करके रख लीजिए 8 दिसंबर को किसानों ने भारत बंद का एलान कर दिया है। यानि आपका वीकेंड और आने वाला पूरा हफ्ता इस आंदोलन की भेट चढ़ सकता है। चाहे आप दिल्ली में रहते हैं, या भारत के किसी और शहर-राज्य में रहते हैं तो भी।’’

सुधीर चौधरी एंड पार्टी के सौजन्य से किसान दो प्रकार के होते हैं। एक- छोटे किसान, जिन्हें इनकी ज़ुबान से अन्नदाता कहलाने का नसीब हासिल है। और दूसरे- बड़े किसान जो खेती से भारी-भरकम कमाई करके टैक्स नहीं देते और मोदी जिस ब्लैकमनी को लाने वाले थे, उससे भी ज़्यादा देश में ही इन्होंने कालाधन इकट्ठा कर रखा है और इन्हें मोदी-अंबानी-अडानी के ये चेले-चमचे बा-हक़ पानी पी-पी कर कोस रहे हैं। इतनी फरमाबरदारी देखकर लगता है कि पानी का ब्रेक भी हराम है इनके लिए। 

अब सवाल है कि इनकी इतनी मेहनत का दिल्ली और देश की जनता क्या इनाम दे रही है? सफे़द दाढ़ी वाले हाथ में लंबे डंडे की सफाई वाली झाड़t थामे 70 साल के हरदीप सिंह पर मैंने जब भारत बंद, बार्डर बंद से दिल्ली-देश को परेशान करने का मोदी मीडिया का इल्ज़ाम लगाया तो उनके जवाब में पाया कि दिल्ली-देश की जनता-जनार्दन मोदी मीडिया को करारा तमाचा जड़ रही है।

हरदीप सिंह कहते हैं कि हरियाणा के हमारे भाई-बहन जितना साथ दे रहे हैं हम कैसे वापस देंगे उन्हें। हरियाणा पहले पंजाब का छोटा भाई था अब बड़ा भाई हो गया है।

दिल्ली की सुनिए। हरदीप जी का ग्रुप खीर बना कर लोगों को परोस रहा है। वो बताते हैं कि जब हम खीर का सामान लेने दिल्ली गए तो सामान वाले ने पूछा कि आपको कहां ले जाना है। मैंने बताया कि सिंघू बार्डर पर, तो उसने टैंपू भी खुद के पैसों से किया और 10 हज़ार रुपये के सामान का एक भी पैसा नहीं लिया। आगे के लिए भी फ्री देने के लिए अपना कार्ड दिया। कहा, फोन कर देना सामान वहीं पहुंच जाएगा। दिल्ली की दिलदारी को तफ़सील से बयान करते हुए  हरदीप सिंह कहते हैं, “हम दिल्ली की जनता का नी देण दे सकते। मदद करते हैं साथ में ये भी कहते हैं, सरदार जी जइयो ना, जे आज की गेम हिलगी ना, फेर ये (मोदी) कुछ नी देगा। आज तुम्हारे से बेच रहा है, कल हमारे से भी बेचेगा। ऐसी-ऐसी बात कर रे हैं दिल्ली के आदमी हमारे साथ। दिल्ली वाले तो हमारे बहुत साथ हैं।”

ये वही व्यापारी तबका है, जो हमेशा बीजेपी का रहा है। सच ये भी है कि जीएसटी, नोटबंदी ने इनकी भी कमर बुरी तरह तोड़ डाली है। तो इस दर्द का एहसास इन्हें अब बीजेपी-मोदी की वफादारी के अलावा ज़िम्मेदार नागरिक बनने को भी मजबूर कर रहा है। अंबानी-अडानी ने भाग्य लिखने वाले को अपने घर मुलाज़िम रख लिया तो मोदी क्या करे?

वैसे चरम मूर्ख मीडिया काम पर है। मिथ्या तीर बता रहा है कि सरकार के साथ तीसरे दौर की महत्वपूर्ण बैठक के नतीजे से पहले ही किसानों ने 8 दिसंबर के भारत बंद का एलान कर दिया। खै़र, जिन्हें ये भड़काना चाह रहे हैं वो अभी भड़क नहीं रहे हैं और तीसरी सरकारी तथाकथित महत्वपूर्ण बैठक भी पहली दो की तरह ही सिफर रही। सो शांतिपूर्ण भारत बंद तय है। आखि़र इन सिलसिलेवार बेनतीजा बैठकों का मकसद क्या है? क्या सरकार एक तरफ बेमतलब की बातों में उलझाकर दूसरी तरफ़ षड़यंत्र रच रही है आंदोलन को बदनाम करने, कुचलने का? इसमें गोदी मीडिया के खालिस्तानी और विदेशी हाथ, प्रधामंत्री की जान को ख़तरा आदि के अलाप के अलावा सिंघू बार्डर की 10 दिन की आंदोलन बस्ती में घिनौनी-बेशर्म चालों के ज़हरीले मानवमास तीर छोड़े जा रहे हैं।

आंदोलन बस्ती के बाशिंदों के मुताबिक कुछ लड़कियों को रात में जान-बूझ कर यहां घुमाया जा रहा है, ताकि आंदोलन में आए मर्दों-नौजवानों पर इल्ज़ाम लगाए जा सकें। लोगों को यहां तक लगता है कि हो सकता है ये पुलिस की ही लड़कियां हों। इनके साथ सपोर्ट के लिए आदमी भी होते हैं। कईयों को हमने पकड़ा पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। हम चाहते हैं, देश के लोग ये जानें कि कैसी-कैसी चालें चली जा रही हैं। पर हम अपने इस आंदोलन का हश्र हरियाणा के जाट आंदोलन जैसा नहीं होने देंगे। हम हर तरह से चौकस हैं।

5 दिसंबर के बाद बातचीत 9 दिसंबर प-र टाल दी गई है। सिंघू बार्डर पर पुलिस, सुरक्षा बलों की बढ़ती संख्या देखकर लगा कि टालना पहले से तय था। क्या खालिस्तानियों के नाम पर, मोदी की जान को ख़तरे के के नाम पर कोरोना या कुछ और के बहाने आंदोलन पर कहर बरपाया जाएगा? जिस तरह ठंड के दिनों में बातचीत के नाम पर फालतू की बक-बक करके दिन पर दिन बिताए जा रहे हैं और साथ ही आंदोलन को बदनाम करने की कोशिश हो रही है उससे सरकार के इरादे नेक तो नहीं लगते।

हरदीप सिंह जी कहते हैं, “मोदी कहता है, मैं जो बात कहता हूं वापस नहीं लेता। जो काम कर दिया तो कर दिया। अगर ये कानून वापस नहीं लेगा तो हम यहीं ख़त्म हो जाएंगे, यहीं मर जाएंगे। घर नहीं जाएंगे। घर जाकर क्या करना है, जब घर रहना ही नहीं है। साल-छः महीने बाद सड़कों पर आना ही है तो आज ही आ जाओ।”

मैंने कहा, आप काला धन जमा करने वाले अमीर किसान हो जो ग़रीब किसान को अपने फायदे के लिए बहका रहे हैं। गोदी मीडिया ने बताया है हमें। हरदीप सिंह सिर हिलाकर मुझसे सवाल करते हैं, “अच्छा, मुझे बताओ, जो गले में रस्सी डालता है वो दुखी होकर डालता है या खुशी में डालता है? कोई मंत्री मरा है आज तक फांसी लेके? कोई दवाई खाकर मरा है? किसान मर रहा है न। तकलीफ है तभी मर रहे हैं न। क्या हमारा सड़कों पर सोने को जी करता है? झाड़ू लगाने को जी करता है?”

किसी ने कहा, “रात को आकर देखो यहां। हमें लाइट नहीं दे रहे हैं, पानी नहीं दे रहे हैं। आस-पास के लोग मदद कर रहे हैं। साफ-सफाई हम खुद कर रहे हैं। क्या ये सब सरकार को नहीं करना चाहिए?” झाड़ू लगाते हुए सर्दी में भी 70 साल के हरदीप जी का चेहरा पसीना-पसीना है। कहते हैं, “70 की उम्र में तो घर में बैठ कर रोटी खानी चाहिए, हम सड़कों पर सो रहे हैं। शर्म से मर नी जाना चाहिए ऐसे प्रधानमंत्री को?”

मैंने कहा, कोरोना का नाम लेकर उठा देंगे। हरदीप सिंह का जवाब था, “कोरोना हमारे से लगता ही नहीं। गरीब आदमी का कोरोना क्या करेगा। जो मक्खी होती है वो मीठे पर ही बैठती है। जब हमारे में कोई माड़ा-मोटा मीठा होगा तो ही तो मच्छर-मक्खी हमारे ऊपर आएंगी। हमारा तो खून ही सुखा दिया इसने। कहता है, मैंने छह हज़ार साल का देना है। 12 महीने में उससे क्या होगा। एक बार डाल कर वोट ले लिया फिर किसी को नहीं मिला।”

मैंने वाटर कैनन बंद करने वाले लड़के पर 304 का केस लगाने की बात उठाई तो एक किसान ने कहा, “अंबाला में हमारे जिस लड़के ने पानी बंद किया उस पर केस डाल दिया और हमारा 11 साल का लड़का ट्राली के अंदर था जिस पर टेंट फाड़कर आंसू गैस का गोला आकर गिरा। वो लड़का बेहोश हो गया। उसकी ज़िम्मेदार सरकार क्यों नहीं लेती है?”

मैंने पूछा देश के लोगों से क्या कहना है? हाथ जोड़कर एक किसान ने कहा, “हम देश के लोगों से हाथ जोड़कर कहते हैं कि किसानों का साथ दो। जो किसान खत्म हो गया तो सारा हिंदुस्तान खत्म हो जाएगा। आज बिहार का बीस कीले ज़मीन का मालिक पंजाब के दो कीले वाले के यहां दिहाड़ी करता है। जो ये कानून पास हो गया तो पंजाब वालों को भी यही करना पड़ेगा। जो ये कानून इतने ही अच्छे हैं तो बीस कीले वाले को बिहार में अमीर बना लेते फिर पंजाब-हरियाणा के दो कीले वाले के पास आते।” हरदीप सिंह ने कहा, “सवाल है बिहार वाले तो पंजाब आ जाते हैं हम कहां जाएंगे? क्या करें हम तो बहुत दुखी हो गए हैं। हम तो आर-पार की लड़ाई पर खड़े हैं। घर को कानून खत्म करवाकर जाएंगे।”

राज्य को तानाशाही करने की हिम्मत देने वाली ताकत आखि़र क्या है? आर-पार की लड़ाई में किसानों-मज़दूरों को कुचलने कौन भेजे जाएंगे? पुलिस-सुरक्षा बलों में मौजूद इनके अपने बेटे-भाई, रिश्तेदार। सेना में आगे बढ़कर लड़ने-मरने वाले और पुलिस में डंडा भांजने वाले अधिकतर इसी तबके से आते हैं। क्या हो अगर ये अपनों के क़ातिल बनने से इंकार कर दें तो?

अंबानी-अडानी की तिजोरियों में मौजूद देश से लूटा-नोचा रुपया मोदी और उसके प्रचार मीडिया का अविष्कार कर सकता है बस। धरती की जिंदा, उपजाऊ मज़दूर-किसान कौमों को हरा नहीं सकता। देख रहे हो कार्ल मार्क्स! अंबानियों-अडानियों आदि की पूंजी तुम्हारी पूंजी के आगे घुटने टेक रही है। ओह! क्या ये मूर्ख धनपशु, धरती खत्म करने के मंसूबों से पहले काबू में आ पाएंगे?

(वीना जनचौक की दिल्ली हेड हैं। इसके साथ ही वह व्यंग्यकार और डाक्यूमेंट्री निर्माता हैं।)

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