Thursday, October 21, 2021

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आजमगढ़ में सवर्णों के आगे न झुकने पर दलित प्रधान की हत्या, पुलिस की गाड़ी से कुचलकर बच्चे की भी मौत

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यूपी के आजमगढ़ में एक दलित प्रधान को सम्मान से जीने की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। 42 साल के प्रधान सत्येमव जयते दलितों के सम्मान के लिए संघर्ष कर रहे थे। सवर्ण जाति के लोग उनसे इस बात के लिए नाराज थे कि वह उनके आने पर खड़े क्यों नहीं होते हैं। हत्या वाले दिन एक बच्चा भी गाड़ी से कुचल कर मर गया। घर वालों का आरोप है कि पुलिस की गाड़ी से कुचलने की वजह से बच्चे की मौत हुई है।

आजमगढ़ जिले के बांसगांव में दलितों की आबादी सवर्णों की तुलना में ज्यादा है। इसके बावजूद गांव में सवर्णों का ही वर्चस्व है। बांसगांव में लगभग 300 अनुसूचित जाति के परिवार हैं। इसके विपरीत ठाकुरों और ब्राह्मणों के लगभग 30 परिवार रहते हैं। छोटी संख्या होने की वजह से यहां पिछले कई साल से सवर्ण जाति का प्रधान नहीं बन सका है। इस वजह से भी सवर्ण जाति के लोग चिढ़े हुए थे।

प्रधान के भतीजे लिंकन का कहना है कि उनके परिवार ने कड़ी मेहनत की है और आज परिवार के कई लोग शिक्षित हैं। परिवार के पास गांव में लगभग 15 बीघा जमीन है। इस वजह से भी सवर्ण सत्यमेव को पसंद नहीं करते थे।

उनके परिवार का कहना है कि 42 साल के प्रधान को बहुत सोच-विचार के बाद ‘सत्यमेव जयते’ नाम दिया गया था। सत्यमेव गांव के दलित परिवारों के लिए एक ढाल की तरह थे। वह उनके सम्मान और सुरक्षा की लगातार कोशिश कर रहे थे। प्रधान के एक भतीजे को अमेरिकी राष्ट्रपति के नाम पर ‘लिंकन’ कहा जाता है। परिवार के लोगों ने बताया कि यह नाम इसलिए रखा गया, क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने देश से गुलामी खत्म कर दी थी।

भतीजे लिंकन ने बताया कि सत्यमेव गांव में बहुत लोकप्रिय थे। इसकी वजह से सवर्ण उनसे चिढ़ते थे। गांव के सवर्ण चाहते थे कि सत्यमेव उनके सामने सर झुका कर चलें। सवर्णों का कहना था कि उन्हें देखकर सत्यमेव सम्मान में खड़े नहीं होते हैं।

परिवार के अन्य सदस्य रामू राम कहते हैं, “गांव के कई दलित अब शिक्षित हो गए हैं और अच्छी नौकरियां करते हैं। इससे उच्च जाति के लोगों की नाराजगी बढ़ गई है।” रामू राम खुद कोलकाता में भारतीय मानव विज्ञान सर्वेक्षण के साथ काम करते हैं।

बता दें कि आजमगढ़ जिले के बांसगांव में शुक्रवार की शाम पहली बार प्रधान बने सत्यमेव की सवर्णों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। गांव में भारी पुलिस बल मौजूद है और तमाम सवर्ण अपने घरों में ताला बंद कर फरार हो गए हैं। इस हत्या के बाद से दलितों में दहशत है।

लिंकन का कहना है कि हत्या के बाद, चारों आरोपी सत्यमेव की मां के पास गए और जातिसूचक गालियों का इस्तेमाल करते हुए उनके साथ दुर्व्यवहार किया। हत्यारों ने उन्हें बताया कि उन्होंने सत्यमेव को मार डाला है।

लिंकन ने विशेष रूप से सूर्यांश कुमार दुबे को दोषी ठहराते हुए कहा कि वह चाचा सत्यमेव पर दबाव डाल रहे थे कि वह उन्हें एक पत्र दें ताकि वह गांव में रह सकें। दुबे इस मामले में पिछले कुछ हफ्तों में तीन बार चाचा से मिलने आए थे। सत्येमव ने पत्र देने से मना कर दिया था। उन्होंने बताया कि चाचा ने समझा था कि मामला खत्म हो गया है। लिंकन ने कहा, “ठाकुरों को इस बात से नफरत थी कि वह दलितों की आवाज हैं और सत्यमेव उनके लिए खड़े होते हैं। यह हत्या हमें हमारी जगह दिखाने के लिए की गई है।”

परिवार के रामू राम का दावा है कि एक महीने पहले गप्पू नाम के चार आरोपियों में से एक के साथ जमीन को लेकर भी विवाद हुआ था। उन्होंने अपने निजी तालाब के लिए सार्वजनिक उपयोग के लिए एक सड़क की शुरुआत की थी। समझौता होने के बावजूद गप्पू ने वह जमीन नहीं छोड़ी थी।

अपनी प्राथमिकी में, सत्यमेव की पत्नी मुन्नी देवी ने आरोप लगाया है कि विवेक सिंह शुक्रवार शाम पांच बजे उनके घर आया था। वह मेरे पति को मोटरसाइकिल पर ट्यूबवेल के पास ले गए। बाद में, विवेक सिंह, सूर्यवंश कुमार दुबे, बृजेंद्र सिंह और वसीम ने उन्हें वहां पर गोली मार दी।

सत्यमेव और मुन्नी के तीन बच्चे हैं। सबसे बड़ा बेटा 12 साल का है। दंपति एक बड़े संयुक्त परिवार में रहते थे। इसमें लगभग 30 सदस्य हैं।

पुलिस ने विवेक सिंह उर्फ भोलू, सूर्यांश कुमार दुबे, बृजेंद्र सिंह उर्फ गप्पू और वसीम के खिलाफ सत्यमेव की हत्या का मामला दर्ज किया है। इनमें से दुबे पुराना अपराधी है। उसके खिलाफ हत्या के प्रयास समेत पांच अन्य मामले दर्ज हैं।

आजमगढ़ रेंज के डीआईजी सुभाष चंद्र दुबे ने इसे गंभीर अपराध बताया है। सरोज के पुलिस वाहन के पहिए के नीचे आने के आरोप के बारे में उन्होंने कहा कि वे इस मामले की जांच करेंगे। उन्होंने बताया कि गांव में हालात काबू में हैं। आरोपियों के खिलाफ गैंगस्टर और राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लागू किया जाएगा। पुलिस ने आरोपियों पर 25 हजार रुपये का इनाम भी घोषित किया है। उन्होंने बताया कि आरोपियों के परिवार के सदस्यों को हिरासत में लिया गया है। जल्द ही चारों को गिरफ्तार कर लिया जाएगा।

परिवार अभी हत्या के इस झटके से उबर भी नहीं पाया था कि आठ साल का सरोज हत्या के बाद हो रहे विरोध-प्रदर्शन में एक वाहन से कुचल गया। परिवार का आरोप है कि सरोज पुलिस की गाड़ी से कुचला है।

सरोज के चचेरे भाई दीपक ने बताया कि जब यह हादसा हुआ, वह वहीं मौजूद थे। उन्होंने कहा, “प्रधान जी के मारे जाने के बाद लोगों में गुस्सा था। हमने मांग की कि पुलिस हत्यारों को गिरफ्तार करे, लेकिन उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की। भीड़ ने गुस्से में आकर आरोपियों के घर पर पथराव किया। जब वे पुलिस चौकी में मार्च कर रहे थे, तो पुलिस ने लाठीचार्ज शुरू कर दिया। इसी बीच सरोज पुलिस की गाड़ी के नीचे आ गया। गाड़ी पर सीओ यानी सर्कल ऑफिसर लिखा था।”

इस बीच बसपा मुखिया मायावती ने ट्वीट किया है कि स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर हुई दो मौतें बहुत दुखद हैं। पिछली सपा सरकार और वर्तमान भाजपा सरकार के बीच क्या अंतर है। अगर दलितों के साथ भेदभाव और हत्या की जाती है?

उधर, रिहाई मंच ने दलित ग्राम प्रधान की हत्या को बेखौफ सामंतों द्वारा अंजाम दी गई घटना बताया है। मंच ने इसकी कड़ी भर्त्सना की है। मंच का प्रतिनिधिमंडल गांव जाकर मृतकों के परिजनों से मुलाकात भी करेगा।

रिहाई मंच के महासचिव राजीव यादव ने कहा कि जिस प्रकार से बांसगांव के दलित प्रधान की हत्या करने के बाद हत्यारों ने उनके घर जाकर लाश उठाने और सामूहिक विलाप करने की बात कही, उससे आज़मगढ़ के तरवां-मेंहनगर क्षेत्र में सामंतों के बढ़े हुए हौसले का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि बांसगांव के दलित प्रधान की हत्या से पहले उस क्षेत्र में सामंतों ने मारपीट की कई घटनाएं अंजाम दीं। प्रशासन द्वारा कार्रवाई न होने की वजह से सामंती तत्वों के हौसले बढ़े, जिसका नतीजा दलित ग्राम प्रधान की हत्या के तौर पर सामने है।

राजीव यादव ने कहा कि योगी सरकार में दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों पर सामंती हमलों में वृद्धि हुई है। इससे पहले इसी क्षेत्र में ऐराकलां के माता सहदेई इंटर कालेज में घुसकर सामंती तत्वों ने मारपीट की थी। इसमें प्रबंधक रमाकांत यादव की पत्नी भी जख्मी हुईं, लेकिन नामजद एफआईआर होने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई।

राजीव ने कहा कि आज़मगढ़ के जिस क्षेत्र में यह घटनाएं अंजाम दी जा रही हैं वहां गुंडा राज को खत्म करने के नाम पर उसी क्षेत्र के कई दलितों और पिछड़ों की एनकाउंटर के नाम पर हत्या की जा चुकी है, और कई अन्य के पैरों में गोली मारी गई है। इनमें से कई मामले न्यायालय और मानवाधिकार आयोग में विचाराधीन हैं। क्षेत्र के कई लोगों का आरोप है कि उन एनकाउंटरों को सामंती तत्वों के इशारे पर अंजाम दिया गया था।

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