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Monday, September 27, 2021

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भूख सूचकांक: भारत की अंगोला, इथोपिया और कांगो से भी बदतर स्थिति

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16 अक्तूबर को ‘वैश्विक भूख सूचकांक-2020’ जारी कर दिया गया है। इस सूचकांक में 107 देशों की सूची में भारत 94वें स्थान पर है। पिछले साल 119 देशों की सूची में भारत 102वें स्थान पर था, जबकि 2018 की रिपोर्ट में 119 देशों में 103वें स्थान पर था। भारत फिर भूख की ‘गंभीर स्थिति’ वाले देशों की श्रेणी में रखा गया है।

यह सूची हर साल ‘कंसर्न वर्ल्डवाइड’ तथा ‘वेल्थहंगरहिल्फ’ मिलकर बनाती और प्रकाशित करती हैं। इस सूची में दुनिया में आम तौर पर भूख की स्थिति को ‘औसत दर्जे की’ बताया गया है, किंतु यह भी बताया गया है कि दुनिया भर में 69 करोड़ लोग कुपोषित हैं। यह सूचकांक चार तरह के आंकड़ों के आधार पर तैयार किया जाता है, 1- कुपोषण की स्थिति, जो आबादी में कुपोषित लोगों का अनुपात होती है, 2- बाल निर्बलता,  यानि क़द के अनुपात में बच्चों का कम वजन, जो वर्तमान और तात्कालिक कुपोषण का सूचक है, 3- बाल बौनापन, यानि उम्र के अनुपात में छोटा क़द, जो दीर्घकालिक कुपोषण का सूचक है और 4- 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में मृत्युदर।

इस सूची में 0 से लेकर 50 अंकों के बीच देशों को रखा जाता है। कम अंकों का मतलब बेहतर स्थिति और ज्यादा अंकों का मतलब बदतर स्थिति। 10 अंकों से कम वाले देशों की श्रेणी ‘कम भूख’ वाली, 10 से 20 के बीच ‘औसत भूख’ वाली, 20 से 35 के बीच ‘गंभीर भूख’ वाली, और 35 से 50 के बीच ‘खतरनाक भूख’ वाली श्रेणी है। अफ्रीकी देश सूडान के बराबर ही 27.2 अंक पाकर भारत इस सूचकांक में 94वें स्थान पर ‘गंभीर भूख’ वाले देशों में शामिल है। भारत के पड़ोसी देशों में केवल अफगानिस्तान है जो भारत से नीचे है। अफगानिस्तान 30.3 अंकों के साथ 99वें स्थान पर है। यहां तक कि पाकिस्तान भी 24.6 अंकों के साथ भारत से बेहतर स्थिति में 88वें स्थान पर है।

भारत के अन्य पड़ोसियों में म्यानमार 20.9 अंकों के साथ 78वें स्थान पर है जबकि बांग्लादेश 20.4 अंकों के साथ 75वें स्थान पर है। हमारा नन्हा पड़ोसी नेपाल तो न केवल 19.5 अंकों के साथ 73वें स्थान की बेहतर रैंकिंग पर है, बल्कि इंडोनेशिया (70वां स्थान) और श्रीलंका (64वां स्थान) के साथ ‘औसत भूख’ वाले देशों में शामिल है, जबकि भारत ‘गंभीर भूख’ वाली श्रेणी में है। अंगोला, इथियोपिया और कांगो जैसे अफ्रीकी देश भी इस सूचकांक में भारत से बेहतर स्थिति में हैं। जबकि दूसरी तरफ हमारा बड़ा पड़ोसी चीन क्यूबा तथा ब्राजील जैसे देशों के साथ, 5 से भी कम अंक पाकर भूख सूचकांक में सबसे ‘कम भूख’ वाले सबसे बेहतर देशों की श्रेणी में हैं।

भारत की सन 2000 में 38.9 अंकों के साथ काफी खराब रैंकिंग थी। लेकिन 2012 तक के 12 वर्षों में भारत ने अच्छी प्रगति करते हुए 29.3 अंकों तक की यात्रा करके अपनी स्थिति काफी सुधारी, परंतु पिछले 8 सालों में 29.3 अंकों से 27.2 अंकों तक का सफर बहुत ही धीमा और असंतोषजनक है। 2020 के सूचकांक के मुताबिक भारत की 14% आबादी अल्पपोषित है। अन्य सभी क्षेत्रों की तुलना में दक्षिण एशिया में बच्चों की निर्बलता सबसे ज्यादा है। 2010 से 1014 के बीच बाल निर्बलता भारत में 15.1% ही थी, जो अब बढ़कर 17.3% हो गई है। भारत में इस समय दुनिया में सर्वाधिक बच्चे निर्बलता का शिकार हैं। 

बच्चों का बौनापन यानि नाटापन भी दक्षिण एशिया, और खास करके भारत में बहुत ज्यादा है। बच्चों में नाटेपन का अर्थ उनकी उम्र के अनुपात में लंबाई का कम होना है। यह समस्या कुपोषण के लंबे अरसे से मौजूदगी की ओर इंगित करती है। भारत के 37.4% बच्चों में नाटापन है जो अनेक तरह की वंचना के शिकार परिवारों में, जहां भोजन में विभिन्न तरह के खाद्य पदार्थ नहीं शामिल हो पाते हैं, जहां माताओं की शिक्षा कम है और जिन परिवारों में गरीबी ज्यादा है, वहां बच्चों में निर्बलता और नाटापन काफी अधिक है। हालांकि भारत में पिछले दो दशकों में बौनापन में कमी आई है, लेकिन इसी दौर में बाल निर्बलता में कोई कमी नहीं आई है।

2019 के मानव विकास सूचकांक में भी हम 189 देशों की सूची में 129वें स्थान पर थे। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र जनवरी 2020 में जारी वैश्विक लोकतंत्र सूचकांक में नागरिक स्वतंत्रताओं के हनन के आरोपों के साथ पिछले साल से दस स्थान नीचे खिसक कर 51वें स्थान पर चला गया है। ये आंकड़े हमारे लिए शर्मनाक हैं। हम पश्चिमी देशों या दुनिया के अन्य हिस्सों से तुलना अगर इस आधार पर न भी करें कि गुलामी से एक जर्जर अर्थव्यवस्था हमें विरासत में मिली थी, और सारी चीजें हमें शून्य से शुरू करनी पड़ी थीं, तब भी हमारे पड़ोसी देशों का इतिहास और विरासत तो लगभग हमारे ही जैसी रही है। 

हम इतनी बड़ी अर्थव्यवस्था लेकर उनकी भी बराबरी क्यों नहीं कर पा रहे हैं? हमारा नेतृत्व हमें विश्वगुरु बनने के सपने दिखाता है, हमें 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के सपने दिखाता है, लेकिन हमारी हालत सूडान और अंगोला के समकक्ष है। हमें अपने शेखी बघारने वाले गपोड़ी नेतृत्व द्वारा दिखाए जा रहे हसीन सपनों से बाहर निकल कर अपनी हास्यास्पद और दयनीय हकीकत को समझना चाहिए और सोचना चाहिए कि आखिर हम से गलतियां कहां हुईं? 

मैं केवल वर्तमान नेतृत्व की बात नहीं कर रहा। निश्चित रूप से वर्तमान सरकार गरीबी, भूख और मानव विकास सूचकांक में भारत की स्थिति को बेहतर करने में असफल रही है, बल्कि इसने अपने मूर्खतापूर्ण फैसलों से हालात को और बदतर ही किया है, और जिन रास्तों पर देश को तेजी से ले जाया जा रहा है, वे धन के संकेंद्रण को अधिकाधिक बढ़ाते जाएंगे और उसी अनुपात में आबादी का बड़ा हिस्सा हाशिये पर चला जाएगा। 

यह नीयत का मामला ही नहीं है। पार्टियों और नेतृत्व का फर्क तो पड़ता है, मगर वह मात्रात्मक होता है, गुणात्मक नहीं। दरअसल देश में विकास का जो मॉडल चुना गया वही दोषपूर्ण था। पूंजीवाद का ‘ट्रिकल डाउन’ (रिसाव) सिद्धांत पूरी दुनिया में मृगमरीचिका साबित हुआ है। पूरी दुनिया में इसने वंचना का महासागर, और उसमें समृद्धि के चंद टापू तैयार किये हैं। इसने बहुसंख्यक आबादी को इतना अकिंचन बना दिया है कि अपने ही श्रम का मूल्य नहीं, बल्कि उसके क़तरों को हासिल करने के लिए गिड़गिड़ाना पड़ता है। यह पूरी व्यवस्था श्रम की संगठित लूट का तंत्र बनी हुई है। 1990 में लागू की गई नई आर्थिक नीति ने गरीब और कमजोर तबके के लिए बनाए गए संरक्षणों के ढीले-ढाले ढांचे को भी उखाड़ फेंका और उन्हें बेरहम बाजार के हवाले कर दिया। इस दौर में देश में आर्थिक गतिविधियों में तो बेहिसाब तेजी आई, किंतु कुछ ही हाथों में धन का संकेंद्रण भी अकल्पनीय पैमाने पर हुआ। 

लूट का नया तंत्र कितना ताकतवर है, इसे एक हालिया उदाहरण में हम स्पष्ट तौर पर देख सकते हैं। नोटबंदी और जीएसटी के संयुक्त प्रभावों के तहत भारतीय अर्थव्यवस्था पिछले कई वर्षों से घिसट रही है। बेरोजगारी तो महामारी के पहले से ही पिछले 45 वर्षों का रिकॉर्ड तोड़ चुकी थी। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर तबाह हो चुका था, छोटे व्यवसायी निराशा के गर्त में थे। इस बीच महामारी ने कोढ़ में खाज का काम किया। इस बीच तानाशाहीपूर्ण तरीक़े से लॉकडाउन लगाकर करोड़ों लोगों को अमानवीय हालात में फेंक दिया गया। लेकिन जिस दौर में देश में करोड़ों लोग भयंकर पीड़ा झेलते हुए दाने-दाने के लिए मोहताज थे और देश की जीडीपी ने रिकॉर्ड 23.9% की गिरावट दर्ज किया, उसी दौर में देश के एक पूंजीपति मुकेश अंबानी की परिसंपत्तियों में मात्र एक साल में 22 अरब डॉलर की बढ़ोत्तरी हुई। क्या इस तथ्य का भूख सूचकांक के आंकड़ों से कोई रिश्ता नहीं है?

ऑक्सफेम की पिछले साल की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में असमानता के बढ़ने के मामले में रूस के बाद दूसरे नंबर पर भारत है। भारत की 77% संपदा पर 10% ऊपरी आबादी का कब्जा है। केवल 2017 में पैदा हुई कुल संपदा का 73% हिस्सा केवल 1% धनी लोगों के हाथों में गया, जबकि 6.7 करोड़ गरीब लोगों के हाथों में मात्र 1% संपदा आई। लगभग 80 अरब रूपये संपत्ति रखने वालों की संख्या भारत में 119 हो चुकी है और 2018 से 2022 के चार वर्षों के भीतर इस क्लब में 70 और लोग शामिल हो जाएंगे। क्या इन प्रवृत्तियों का कोविड के खिलाफ भारत के संघर्ष में पिछड़ने, अस्पतालों, बेडों, वेंटिलेटरों, डॉक्टरों, नर्सों व अन्य चिकित्साकर्मियों की भारी कमी से कोई रिश्ता नहीं है?

क्या देश में गरीबी की हताशा से तंग आकर हर साल होने वाली लाखों आत्महत्याओं, अस्पतालों और डॉक्टरों की कमी के कारण होने वाली जच्चा-बच्चा की मौतों, कुपोषण के कारण करोड़ों बच्चों के अवरुद्ध विकास तथा शारीरिक और मानसिक विकलांगता के कारण अल्पवय में ही जिंदगी की दौड़ में उनके हमेशा-हमेशा के लिए पिछड़ जाने का कारण यह पूंजीवादी व्यवस्था ही नहीं है?

जब तक हम मूल कारण के खात्मे की कोशिश न करके इस विराट विषवृक्ष की टहनियां और पत्तियां नोचते रहेंगे तब तक हम अपने देश से भूख के संकट का खात्मा नहीं कर पाएंगे।

(शैलेश लेखक और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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