Thursday, December 1, 2022

हिंदुत्व के मठ में राजा सुहेलदेव का पाठ

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(यूपी में बीजेपी केवल सत्ता नहीं चला रही है। बल्कि वह धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक स्तर पर भी सक्रिय है। बात यहीं तक सीमित रहती तो भी कोई बात नहीं थी बल्कि अपने आधार को बढ़ाने तथा भविष्य में उसे और पुख्ता करने के लिए वह कई प्रयोगों को भी अंजाम दे रही है। इसमें प्रमुख प्रयोग है जातियों का पुनर्गठन। तथा अपनी दीर्घकालीन जरूरतों के मुताबिक उसका इतिहास लेखन और पुनर्पाठ। इसी कड़ी में उसने राजभर जाति के साथ प्रयोग किया है। इस जाति को न केवल क्षत्रिय घोषित किया बल्कि उसमें तमाम दूसरी जातियों को भी उसने शामिल कर दिया है। इसको और वैचारिक तौर पर संस्थाबद्ध और संगठित करने के लिए उनके प्रतीक पुरुष राजा सुहेलदेव की मुस्लिम सेनानायक सालार मसूद से लड़ाई दिखा दी गयी है। इस तरह से सूबे में धर्म की चासनी में जाति का तड़का लगाकर हिंदुत्व की नई खीर तैयार की जा रही है। पेश है इसी मसले पर जयंत कुमार का लेख-संपादक) 

राजभर राजपूत। उत्तर-प्रदेश के पूर्वी हिस्सों में यह नई शब्दावली नहीं है। लेकिन, आजकल यह जोर पकड़ रहा है। भाजपा के सहयोग से राजभर जाति की एक नई गोलबंदी मजबूत बनने की ओर बढ़ रही है। यह मजबूती उसके ‘यादों’ और इतिहास के पुनर्पाठ के माध्यम से दिया जा रहा है। पिछले दिनों इसे ठोस रूप देने के लिए बहराईच में 40 फुट ऊंची यादगार स्मारक के उद्घाटन की शक्ल में आया है। इसके लिए खुद प्रधानमंत्री उपस्थित हुए। 

राजभर राजपूतों को उसके नायक राजा सुहेलदेव की याद दिलाई गई। यह बताया जा रहा है राजा सुहेलदेव श्रावस्ती के राजा थे और उनकी लड़ाई भारत की संप्रभुता और हिंदुत्व को बचाने के लिए थी। उन्होंने महमूद गजनी के सेनानायक सालार मसूद के खिलाफ जंग किया और उसे हरा दिया। इस तरह वह आज के समय में हिंदुओं के नायक हैं और राजभर राजपूतों के महान गौरव भी। 

राजा सुहेलदेव, ग्रंथों में उल्लेखित संदर्भों में राजा मोरध्वज के पुत्र पर मिथकों पर आधारित किताब लिखने वाले आशीष त्रिपाठी ने ‘एनिमी ऑफ आर्यावर्त एण्ड लीजेंड ऑफ सुहेलदेव’ लिखा है। यह पुस्तक अंग्रेजी में है। मिथक पर आधारित पुस्तक को ठोस रूप राजा सुहेलदेव भारत के मध्यकाल के उस दौर से जोड़कर दिया जा रहा है जिसका असर एक धर्म और समुदाय के संदर्भ में राजभर राजपूतों को पुनर्गठित होने और ‘गौरवशाली’ दिनों को वापस लाने के ‘प्रयासों’ में बदल रहा है। इसके लिए बाकायदा राजनीति और बौद्धिक प्रयास चल रहा है और राजभर राजपूतों के बीच से नेतृत्व को उभारा जा रहा है। यह ‘इतिहास निर्माण’ की प्रक्रिया है और दावा है कि यह ‘सही इतिहास की रचना’ है।

हिंदुत्व आधारित संगठनों ने राजा सुहेलदेव की जीत को ‘हिंदू विजय उत्सव’ घोषित किया। और, जिस सालार मसूद को मार डाला गया था उसके दरगाह को एक हिंदू ऋषि के समाधिस्थल होने का दावा भी पेश कर दिया गया। देश की एकता और अखंडता की रक्षा के लिए राजा सुहेलदेव के नायकत्व की परिभाषा में राजभर समुदाय द्वारा हिंदू समाज व्यवस्था में ‘राजपूत’ होने के दावे को मजबूत करना भी है। जो निश्चय ही भारतीय जाति व्यवस्था में लगातार बनते रहने वाली जाति का ही हिस्सा है। यहां यह जरूर याद कर लेना चाहिए कि राजभर राजपूत का जिक्र मध्यकाल तक सीमित नहीं है। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इस समुदाय को प्राचीन ग्रंथों के आधार पर ‘आभीर क्षत्रिय’ के नाम से याद किया है और प्राचीन ग्रंथों में इनका उल्लेख मिलता रहा है।

राजभर राजपूत समुदाय उत्तर प्रदेश में ‘अन्य पिछड़ा वर्ग समुदाय’ में आते हैं। इंडियन एक्सप्रेस में मौलश्री सेठ के लेख ‘द लिजेंड ऑफ राजा सुहेलदेव, एण्ड रीयल्टी ऑफ राजभर वोट इन यूपी’ के अनुसार उत्तर-प्रदेश में 18 प्रतिशत है। उत्तर-प्रदेश की राजनीति में राजपूत होने का दावा पहली बार नहीं हो रहा है। मौर्या या मौर्य समुदाय के लोगों को प्राचीन कालीन राजा और धर्म से जोड़कर उनके गौरवशाली अतीत और वर्तमान में बदहाली के मध्ययुगीन कारणों से जोड़ा गया। लोध राजपूत, जाट और गुर्जर समुदायों को भी प्राचीन और मध्यकाल की यादों से वर्तमान में दावों के आधार पर एकजुट किया गया। यादव समुदाय का उत्थान भी इसी तरह के प्रयासों से जुड़ा हुआ है।

जातियों का नामांकन और पुनर्गठन का काम ठोस रूप से मनुस्मृति के बाद अंग्रेजों ने ही किया। इसके पीछे अंग्रेजों की अपनी राजनीति थी लेकिन इसने भारतीय समाज की जाति व्यवस्था को इतना ठोस बना दिया जिसके बीच से निकलना मुश्किल हो गया। इस जाति व्यवस्था से निकलने का रास्ता एक नई जाति का बनना भी हो गया। जातिगत व्यवहार को चिन्हित किया गया और इन व्यवहारों से इतर व्यवहार को महान समाजशास्त्री एम. एन. श्रीनिवास ने ‘संस्कृतिकरण’ का नाम दे दिया। इस अवधारणा में यह बात निहित थी कि ‘संस्कृतिकरण के मूल्य’ ऊपर की जातियों में निहित हैं। इस तरह जातियों की दावेदारी अधिकतम ‘संस्कृतिकरण’ या नई जाति के बनने में बदलता रहा। इसमें दूसरा हिस्सा हासिल करने के लिए जरूरी था जाति के आधार पर नई गोलबंदी हो और सरकार के सामने दावेदारी पेश हो। भारत के आधुनिक इतिहास में अंग्रेजों के पहले और बाद के दौर में यह प्रक्रिया चलती रही है। संस्कृतिकरण और नई दावेदारी के खिलाफ वर्चस्वशाली जातियों ने इस कदर जकड़बंदी को बनाये रखा कि ये जातियां लगातार हाशिये पर बनी रहीं। आरक्षण का प्रावधान भी इनके सामने कारगर नहीं हो सका।

जातियों की यह गोलबंदी और दावेदारी भारतीय समाज व्यवस्था में एक बदलाव लाने का दावा था। यह बदलाव निश्चित ही सतही नहीं था। इसके पीछे एक गहरे बदलाव की चाह थी। न सिर्फ मनुस्मृति की व्यवस्था में बल्कि अंग्रेजों के समय बनाई और कानून, राजनीति, अर्थव्यवस्था और प्रशासनिक स्तर पर रूढ़ कर दी गई व्यवस्था में आमूल बदलाव की चाह को लगातार दबाया गया। इस गोलबंदी और दावेदारी का निश्चय ही भारतीय समाज में एक प्रगतिशील भूमिका थी। लेकिन, इसे नेतृत्व देने वाली राजनीतिक पार्टियों और नेतृत्वों ने इसे बीच भंवर में छोड़ दिया और सत्ता हासिल कर ‘भ्रष्ट’ होते चले गये। उत्तर-प्रदेश में दलित और ओबीसी राजनीति का हश्र हम देख रहे हैं।

भाजपा के नेतृत्व में जातियों की इस गोलबंदी और दावेदारी को पुनर्गठित करने के पीछे ‘संस्कृतिकरण’ की ही अवधारणा है। इस संस्कृतिकरण की प्रक्रिया हिंदुत्व के क्षत्रिय होने के दावे में निहित है और इसका गौरव हिंदुत्व का झंडा बुलंद करने में है। इस तरह, गोलबंदी और दावेदारी के लिए जिस जरूरी सामाजिक विभाजन का आधार चाहिए उसे भारत की जाति व्यवस्था से बाहर ले जाकर धार्मिक विभाजन में अवस्थित किया जा रहा है। इस तरह न सिर्फ हिंदू जाति व्यवस्था बनाये रखने या यूं कहें कि हिंदुत्व की एकता को बनाये रखना आसान हो जाता है, साथ ही समाज के भीतर ही धार्मिक दुश्मन पैदा कर इस गोलबंदी और दावेदारी को हिंसक बनाना भी आसान हो जाता है। लेकिन, कोई भी जाति या समाज गोलबंद होने के लिए जिन मिथकों, यादों, इतिहासों का सहारा लेता है उसके पीछे मूल कारण वर्तमान की आर्थिक और राजनीतिक चुनौतियां होती हैं। ‘राष्ट्र’ की अवधारणा जितनी सांस्कृतिक होती है उससे हजार गुना आर्थिक और राजनीतिक होती है। भारत की जातियों द्वारा ‘सांस्कृतिक’ दावेदारी को चाहे जितना भी ‘राष्ट्रवाद’ से जोड़ दिया जाय उसकी आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक बदलाव की अदम्य इच्छा को ढंका नहीं जा सकता। 

इतिहास की इन पुनर्रचनाओं की इन ठोस स्थितियों में क्या भाजपा के यह प्रयास स्वतः असफल हो जायेंगे। शायद, इतिहास की अपनी गति में एक मोड़ पर असफल हो जायेंगे। लेकिन, इतिहास की इस गति की समयावधि क्या होगी? और, किन किन रास्तों से गुजरेगी? क्या क्या नुकसान होंगे?….इन सब बातों का वर्तमान हालात से सिर्फ हम अनुमान लगा सकते हैं। लेकिन, अनुमान और इंतजार इतिहास नहीं बनाते। वे असीम क्रूरताओं के जंगलों में लेकर जाते हैं। जिससे निकलने का रास्ता साफ साफ नहीं दिखता है। इतिहास की पुनर्रचनाओं के लिए खुद उतरना होता है। कहते हैंः ‘इतिहास पढ़ना अच्छी बात है। उससे भी अच्छा होता है इतिहास लिखना। लेकिन, इन सबसे हजार गुना अच्छा होता है इतिहास का निर्माण करना।’ 

(जयंत कुमार स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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