90 दिन में 90 नहीं 600 गुना बढ़ गया है कोविड संक्रमण

देश के समक्ष दो मुद्दे तो इतने विकराल रूप में लगातार मुह बाए खड़े हो चुके हैं, कि पल भर की फुर्सत शायद ही किसी के पास हो इनके अलावा अगल-बगल झाँक पाने की।

जी हाँ, आपने सही अनुमान लगाया। कोरोना वायरस और लद्दाख क्षेत्र में चीनी घुसपैठ की। या यूँ कहें कि पिछले दो दिनों से हालत ये हो चुकी है कि भारत-चीन विवाद में लद्दाख के गलवान वाले निर्जन क्षेत्र में जिस प्रकार की झड़प सुनने को मिली है, वह अकल्पनीय है। और उसी का नतीजा है कि महाराष्ट्र और दिल्ली में कोरोना वायरस से मारे जाने वाले लोगों की संख्या में अचानक हुए सैकड़ों के इजाफे पर शायद ही किसी ने ध्यान दिया हो। 

कोरोना के ट्रैकर को लगाकर जो लोग इस इंतजार में थे कि 17 जून को भारत में 10,000 मौतों पर बड़ी बहस होगी, कम्यूनिटी स्प्रेड के जो सायास प्रयास लॉकडाउन में करोड़ों प्रवासी मजदूरों, रेहड़ी पटरी वालों, झोपड़ पट्टी में रहकर ऊँची-ऊँची अट्टालिकाओं को बनाने वाले बेनाम भारतीय, वे लाखों बाई, आया, कपड़े इस्त्री करने वाले लोग, माली, घरों सोसाइटी में आपकी छोटी-मोटी सैकड़ों सुविधाओं को चटपट पूरा करने वाले जो आपको दिख भी सकते हैं, और बिलकुल दिख कर भी कई सालों से न दिखे होंगे।

ये करोड़ों लोग जो आपकी जिन्दगी को थोड़ा और आरामदेह बनाने के लिए ही इस धरती पर जन्मे थे, वे दो दिन में ही समझ गये थे कि अगर जिन्दा रहना है तो इस बेगाने राष्ट्र से निकल कर अपने देस में जाना ही होगा। तो यह था  सरकार की ओर से पहला सायास प्रयास देश में कोरोना को कम्यूनिटी प्रसार की दिशा में ले जाने का। 

क्योंकि सरकार यदि अपनी जिम्मेदारी फैक्ट्री, दुकान मालिक, मकान मालिक के मत्थे फोड़ देगी तो ऐसी सरकार की यह भोली भाली प्रजा क्या इतनी ही बेवकूफ है कि मार्च ही नहीं बल्कि अप्रैल, मई और जून तक की तनख्वाह लॉकडाउन में देती रहेगी, मकान मालिक जो आज तक खुद तो सस्ती यूनिट की बिजली खाते रहे हैं, और सबसे ऊँचे स्लैब के हिसाब से किरायेदारों से बिजली का बिल वसूलते रहे हैं, वे उन्हें मुफ्त में रहने के लिए घर, बिजली, पानी देंगे? निश्चित तौर पर 90% व्यवसायियों, फैक्ट्री मालिकों और मकान मालिकों ने वही किया, जो सरकार खुद कर रही थी।

दुनिया में ऐसा उदाहरण हमें पड़ोसी पाकिस्तान में भी नहीं देखने को मिला। यूरोपियन यूनियन, अमेरिका, कनाडा, न्यूजीलैंड सहित पचीसियों देशों में सरकारों ने लॉकडाउन लागू करने से पहले देश के साथ लम्बा संवाद चलाया, बजट में प्रावधान किये, सरकार ने भारी बोझ वहन किये हैं और चूँकि वे जनता के प्रति अपनी जवाबदेही समझते थे, इसलिए न सिर्फ अगले 1 या दो महीने के लॉकडाउन अवधि में लोगों को न्यूनतम क्षतिपूर्ति कैसे होगी, उत्पादन को कैसे सुनिश्चित किया जा सकेगा, भोजन की आपूर्ति कैसे होती रहेगी, अर्थव्यवस्था को इस लॉकडाउन से लगने वाले झटके के लिए क्या आर्थिक उपाय अपनाए जाने हैं। इन सब मसलों पर विचार-विमर्श कर फैसले लिए।

लेकिन इन सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न तो यह था कि आखिर लॉकडाउन किसलिए?

सारी दुनिया में लॉकडाउन अपने-अपने देशों में थोपने के पीछे की स्पष्ट वजह सिर्फ एक थी, वह थी कोरोनावायरस से लड़ने के लिए समय उधार लेना। ताकि अपने अपने देश में स्वास्थ्य सुविधाओं में जो भी कमी है, उसे तत्काल दूर किया जा सके। पीपीई किट, मास्क से लेकर वेंटिलेटर, ऑक्सीजन, मेडिकल कर्मी वो सब कुछ जिसे एक बार लॉकडाउन खोलते ही देश कोरोनावायरस से दो-दो हाथ लड़ने और उसका गला घोंटने के लिए फिर पूरी तरह से सक्षम हो सके।

भारत में क्या हुआ?

बेहद शर्मनाक हुआ जो भी हुआ। मजे की बात ये है कि उसे गर्व से खूब चलाया भी जाता है और हम अपने 5 किलों के सर को हिला भी लेते हैं, लेकिन उसके अंदर रखे भेजे को कभी नहीं हिला पाते? 

  1. क्या लॉकडाउन हमने इसलिए देश में लगने दिया ताकि इससे सिर्फ कोरोना को रोक दिया जाए?
  2. क्या कोरोना या किसी भी अन्य वायरस को मात्र अपने पास आने से रोक देने से वह खत्म हो जायेगा, जबकि लाखों लोग सड़कों पर पैदल चल रहे हों, पीटे जा रहे हों और उन्हें बेहद विषम परिस्थितियों में बिना किसी देह की दूरी के किसी ट्रक में या कंटेनर के अंदर गुत्थमगुत्था होकर सफर पर निकलना हो? इससे कोरोना खत्म होता?

हमें इस बात को इतिहास के पन्नों पर हमेशा-हमेशा के लिए टांक देना चाहिये कि लॉकडाउन जिस दिन देश पर थोपा गया, उस दिन कोरोना से संक्रमित लोगों की संख्या 600 भी नहीं थी। 24 मार्च 2020 को रात 8 बजे प्रधानमंत्री मोदी के संदेश शुरू होने और खत्म होने के साथ लॉकडाउन शुरू होने में देश की 130 करोड़ आबादी को 240 मिनट का ही वक्त दिया गया। 

मानो बचना हो तो बच लो भारत वासियों, तुमने पाप किये थे जो यहाँ पैदा हुए। गरीब ही नहीं मुंबई, दिल्ली में मध्य वर्ग टी शर्ट और बरमूडा पहने हाथों में बटुआ और कार्ड लिए हजारों की संख्या में सैकड़ों मीटर लम्बी लाइन लगाये सुपर मार्केट के सामने कतारबद्ध था। इसे देखकर पैशाचिक आनन्द सिर्फ उसको ही आ सकता है, जिसे पता हो कि क्या होने जा रहा है। और हमारा मध्य वर्ग भी किसी बेपेंदी के लोटे की तरह सिर्फ इधर से उधर लुढ़क ही सकता है, और जैसे-जैसे घटनाक्रम उसकी आँखों के सामने से गुजरता जाता है, वह सिर्फ उस पर हां, हूं से अधिक नहीं सोच सकता और फिर एक लम्बी उबासी फेंकते हुए, आंखों को दोनों हाथों से मींचते हुए कह उठेगा, कल ऑफिस नहीं जाना है तो क्या हुआ, हमें उसका अभ्यास तो करना ही पड़ेगा। न जाने कब लॉकडाउन खुल जाए और जाने की आदत छूट जाए तो?

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चीजों को संक्षेप में रखते हुए सिर्फ बिन्दुवार रखने की कोशिश करता हूँ:

  1. लॉकडाउन को बिना किसी बैकअप के लगाने से उसका टूटना अवश्यम्भावी था, इसे यदि आप नहीं जानते तो कोई बात नहीं। लेकिन इस देश के चुनाव बाज पार्टी और नेता अच्छे से जानते हैं। उन्होंने 500 रुपये और 1 बोतल शराब में कई कई बार इस देश की किस्मत खरीदी है जनाब। इसलिए वे महल में रहते हुए भी 5 साल में एक बार गटर जैसी हालात में रह रहे लोगों के घरों तक में अवश्य झांकते हैं। इसलिए किसी बुद्धिजीवी से अधिक उन्हें इस देश की हकीकत हमेशा पता होती है, लेकिन उनके शातिरपने से कैसे जीत सकते हो आप? लिहाजा सबसे पहले वे गरीब लोग-अपने अपने अस्थाई बिलों से निकल भागे जो हाल के दिनों में ही इन महानगरों में आये थे, जवान थे, और अभी भी गुलामी की अच्छे से आदत नहीं पड़ी थी, और बार-बार गाँव देहात के मस्ती के दिन याद आते रहते थे। ये लोग पहले लॉकडाउन के समय ही मार खाते, गिरते पड़ते आख़िरकार अपने घर पहुँच ही गए। कुछ मारे भी गए सड़क दुर्घटनाओं में। लेकिन फिर भी कह सकते हैं कि मार्च अप्रैल में इतना शानदार मौसम दशकों बाद आया था, और वे जवान भी थे, उनके शरीर कई दिनों के भूखे नहीं थे, जैसा कि 2 महीने बाद घर को निकलने वालों के साथ हुआ।
  2. पहली बार जब लोग घरों के लिए निकले थे, तो देश में वे उस मात्रा में जाहिरा तौर पर संक्रमण नहीं ले जा सके। क्योंकि तब तक कोरोना बड़े-बड़े लोगों के यहाँ से आम लोगों के बीच इस कदर नहीं प्रसारित हो सका था। लेकिन 21 दिन की तपस्या के बाद अगले 14 दिन के लॉकडाउन और उसके बाद फिर एक बार 14 दिन ने बाकी के बचे हाशिये पर पड़े शहरी गरीबों को लगभग निचोड़ कर रख दिया था। ये लोग शहरों में अपेक्षाकृत लम्बे समय से रह रहे थे, कइयों ने झुग्गी बना ली थी, और बाल बच्चों के साथ रह रहे थे। इनके पास जेब में कुछ बचत थी, और उन्हें उम्मीद थी कि 21 दिन बाद यदि हालात नहीं सुधरे तो सरकार उन्हें उनके देस जाने देगी। लेकिन समय के गुजरते जाने के साथ-साथ शहरों में मौजूद स्वयंसेवी समूहों के द्वारा भारी उत्साह से शुरू किये गए भोजन वितरण में सहयोग की भी हवा करीब करीब 80% से अधिक 21 दिन के बाद निकल गई। जीना दूभर होने लगा, गर्मी बढ़ने लगी, मकान मालिक की ओर से दबाव हर जगह बढ़ने लगा, अच्छे दिनों की आस में जुटे व्यवसायियों और फैक्ट्री मालिकों ने भी देख लिया कि सरकार के पास सिर्फ लाठी का ही ईलाज है, उसके पास देने के लिए कुछ नहीं तो उसने भी मार्च के बाद ही अप्रैल के लिए तालाबंदी, छंटनी, आधी सैलरी से लेकर जब हालात सुधरेंगे तबसे आ जाना और तब तक अपना इंतजाम देख लें, कह के ठीक उसी तरह हाथ जोड़ लिए, जैसे सरकार ने हाथ जोड़ लिए थे। शहरों से कोरोना को सही मायने में सुपर स्प्रेडर की भूमिका भला मई के इस मौसम में अपने बिलों से निकलने को मजबूर लोगों से अच्छा कौन निभा सकता था।
  3. इसके बाद तो जो हुआ वह कल्पनातीत था। सरकार को खुद नहीं पता चला कि लॉकडाउन का असर सिर्फ उन करोड़ों गरीब भारतवासियों, मध्य वर्ग और खेतीबाड़ी से जुड़े लोगों से लेकर उद्यमियों तक ही नहीं पड़ने जा रहा है, बल्कि पिरामिड के सबसे ऊँचे पाए पर टैक्स से खींच खींच कर मक्खन चाभने वाले उस सरकारी तंत्र के भी सूखने के दिन खुद उसने अपने हाथों निर्मित कर दिए।

इसकी झलक शराब बंदी पर लगी रोक को खत्म करने से पूरी तरह खुलकर सामने आ गई। जो इतने दिनों से व्याकुल थे शराब के लिए और जिन लोगों ने करीब करीब अब मद्यपान छोड़ने की कसम खा ली थी। उनके लिए सरकार ने आगे बढ़कर इसे खोल दिया। एक्साइज और सेल्स टैक्स में केंद्र और राज्य सरकार दोनों को जैसे रुकी हुई उनकी पेंशन मिल गई। उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों में यदि सरकार के बजट में ही झाँक लें तो वे भले ही खुद को देव भूमि के तौर पर गंगा जमुना का उद्गम स्थल बताने के जरिये वाह वाह करा लें, लेकिन अपने प्रत्येक नागरिक को रोज बगैर मदिरा चखाए वे इस नौटंकी को दो दिन भी आगे नहीं खींच सकते।

शराब का नशा लोगों पर किस कदर तारी था उसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि दिल्ली में 70% सेस लगाने के बाद भी बिक्री रुकने का नाम नहीं ले रही थी। बाकी राज्य भला कैसे पीछे रह सकते थे, आखिर गला तो सभी का सूखा हुआ था, प्यास तो सभी को लगी हुई थी। अब पहली बार जो काम गुजरात और बिहार में गैर क़ानूनी तौर पर घर-घर हर-हर शराब की सप्लाई होती थी, अब क़ानूनी तौर पर सप्लाई की व्यवस्था इसी राम राज्य में हो पाना संभव हो सका है। 

केंद्र के पास तो राज्यों के अलावा कई और भी चाभियाँ हैं, और पेट्रोल, डीजल और गैस इसमें उसके सोने के अंडे देने वाली मुर्गी हैं। दुनिया में तेल जितना सस्ता होता जा रहा है, हमारी केंद्र सरकार उसी अनुपात में एक्साइज बढ़ाकर भारत को इम्यून रखे हुए है, गोया भारतीय उपभोक्ता की आदत बिगड़ न जाए और उसे जो अपनी कार या स्कूटर रोजाना 30 किमी ही चलानी थी, वह सस्ते के चक्कर में रोज 200 किमी के सैर सपाटे में निकल जाए और देश को प्रदूषित करे। 

सभी देशवासियों से कहा गया कि अब आप 50 दिन में इतने समझदार तो हो ही गए कि कोरोना क्या है, इससे कैसे बचना है, हमने तरह-तरह के नमूनों के साथ मुह ढंकने और गले में लपेटने के लिए कपड़े गमछे का प्रचार कर लिया है, अब आप बेफिक्र होकर बिना सार्वजनिक वाहन के अपने अपने वाहनों से डीजल पेट्रोल की खपत को अधिक से अधिक बढ़ाकर ऑफिस फैक्ट्री के चक्कर काटिए। आपका काम चाहे हो या न हो, महीने के अंत में सैलरी आधी मिले या एक चौथाई लेकिन डीजल पेट्रोल बराबर भराते रहें, ताकि सरकार चल सके।

सरकार के 55 लाख केन्द्रीय कर्मचारी और 65 लाख पेंशनधारी लोग ही तो देश हैं। आपका क्या है, आप तो बेहद उच्च इम्यूनिटी वाले महापुरुष हैं, आपको कुछ नहीं होना। बाकी हम हैं न। देश भर में अस्पताल आपके लिए ही तो खोले गये हैं। काम पर अब जाइए, सावधानी बरतिए, दारु पीजिये, पेट्रोल अपनी गाड़ी को पिलाइए, कुछ कमाइए, कमाकर कुछ सब्जी चावल से अतिरिक्त भी खर्च करिए, आखिर जीएसटी माई के पेट पर लात क्यों मार रहे हो भाई?

कमाएगा इंडिया, तभी तो जीएसटी चुकाएगा इंडिया। और जब जीएसटी, एक्साइज भर-भर के देगा इंडिया तभी तो हम विकास योजनाओं का डायग्राम बना सकने लायक ऊर्जा रख सकेंगे। 

सिर्फ आज के आंकड़े के साथ कोरोना के विषय पर बात खत्म करना चाहूँगा। आज कुल संक्रमित लोगों की संख्या 3,67,264 है। अर्थात 24 मार्च से लगभग 600 गुना। अभी 90 दिन पूरे होने में 6 दिन बाकी हैं, लेकिन हम 90 गुना नहीं बल्कि 24 मार्च से 600 गुना अधिक संक्रमित हो चुके हैं। सरकारी आंकड़े बाजों के झांसे में अगर आप आना चाहते हैं, तो आपका स्वागत वहीं है। क्योंकि हो सकता है आप अपने बच्चों या बूढ़ों से प्यार नहीं करते हों।

मेरा सवाल सिर्फ इतना सा है, यदि सरकार को कुल मिलाकर यही सब करना था तो

  1. इस लॉकडाउन को आखिर थोपने की जरूरत क्या थी?
  2. यह तो इम्यूनिटी वाली ही बात हो गई, जिसे स्वीडन ने अपनाया था, और दो महीने पहले यूरोप के देश भारत को आशा भरी निगाह से देख रहे थे कि चीन और भारत ही ऐसे देश हैं जो यदि इसे अपनाते हैं, तो दुनिया का भला हो सकता है। चीन ने तो अपनी इच्छा शक्ति से इसे आख़िरकार अपने यहाँ 3 महीने बाद समूल नष्ट कर दिया। वुहान में हाल ही में कुछ नए मामले नजर आये तो उसने समूची 110 लाख की आबादी को ही टेस्टिंग के लिए तैनात कर दिया और अगले दस दिन में कर भी दिया। जबकि हम इतने दिनों से सारे देश में इसका आधा भी नहीं कर सके हैं। क्या यह बिना बताये पश्चिमी देशों के लिए प्रयोग तो नहीं चल रहा?
  3. यदि लॉकडाउन की घोषणा 24 को होती और उसे लागू 1 अप्रैल से भी करते तो इस 1 हफ्ते में इस देश के 10 करोड़ लोग देश के किसी भी कोने में रेल, बस, टैक्सी, पैदल जा सकते थे। वे सरकार से पैसा भी न मांगते। उस समय उनके पास हजार दो हजार भी अवश्य रहा होता। तब मामले भी सिर्फ 600 ही थे, और जिनको वायरस का डर था भी, वे बस या पैदल जाने वाले लोगों को बिस्किट नहीं खिलाने जा रहे थे। इसलिए कह सकते हैं कि भारी संख्या में जनसंख्या इस कोरोना वायरस की चपेट में आने से बच सकती थी।
  4. एक आखिरी सवाल जिसका जवाब वैसे तो बेहद आसान है, लेकिन अच्छे अच्छों के भेजे में अभी भी नहीं घुसा होगा। जनवरी से सारी दुनिया को कोरोना के बारे में चीन और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बता दिया था, हमारे देश में भी रोजाना उसकी बुलेटिन आ रही थी, अच्छा ख़ासा WHO का स्टाफ भी है। हमारे सामने वुहान का मॉडल, दक्षिण कोरिया, ताईवान और अन्य देशों के मॉडल तो थे ही। इसी देश में केरल राज्य में कोरोना से लड़ने के लिए 20 हजार करोड़ के पैकेज को तैयार होते देखा जा सकता था। लेकिन नहीं देखा गया, क्योंकि शायद हमने मरकज की सीडी बना रखी थी, कि यही बेड़ा पार लगा देगा। खैर, मूल प्रश्न तो रह ही गया। ये 600 संक्रमित लोग कौन थे, जिनके संक्रमित होने की वजाह से सरकार इतना डर गई थी कि उसे डर था कि 130 करोड़ की सेवा में लगे सरकार चला रहे नेता, विपक्ष के बड़े नेता, मुंबई और चेन्नई वाले अभिनेता, न्यायपालिका, कार्यपालिका में बैठे ऊंचे-ऊंचे लोग इसके सीधे चपेट में आ सकते हैं। और यदि खुदा न खास्ता ये लोग संक्रमित हो गए और कुछ बुरा हो गया तो इन 130 गाय टाइप जनता को आखिर देखेगा कौन? आज चीन से मुकाबले में सैनिक कहाँ, बल्कि हमारे देश के राजनेता, टीवी पर बैठे एंकर और आधा मीटर लम्बी मूंछे पाले गेस्ट सेना के भूतपूर्व अफसर हैं।  मुझे लगता है मैंने सही पकड़ा है, वरना आज 600 गुना हो गए उन 600 केसों के, और आज सरकार कहती है घूमो, फिरो और ऐश करो, कुछ नहीं है। जबकि आज 12,262 लोग मारे जा चुके हैं, जो कि सिर्फ सरकारी आंकड़ा है। इसमें वे लोग शामिल नहीं जिन्हें बता दिया गया कि वे डायबीटीज इत्यादि से मरे, जबकि कोरोना ने उनकी मौत का मर्सिया कैटेलिस्ट बनकर पढ़ा था, इसके उदाहरण आपको अपनी ही गली मोहल्ले में देखने को मिल जायेंगे। 

(लेखक रविंद्र पटवाल स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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