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Thursday, August 5, 2021

हत्यारे के महिमामंडन काल में सच्चाई की इबारत है ‘उसने गांधी को क्यों मारा’

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कुछ पुस्तकें ऐसी होती हैं जो विमर्श और सोच-समझ के नए आयाम प्रस्तुत करती हैं और बदलाव की वाहक बनती हैं। बदलाव लाने की यह शक्ति उन पुस्तकों में भी होती है जो कुछ नया तो नहीं प्रस्तुत करतीं किंतु सत्य पर चढ़ गए या चढ़ा दिए गए झूठ की अनेकानेक परतों को खुरचकर इस तरह साफ कर देती हैं कि हमारी सामूहिक चेतना को सत्य की रोशनी मिल जाती है। यह सत्य उजागर होना ही वर्तमान की बहुत सी विद्रूपताओं, समस्याओं, झूठ और प्रोपगेंडा के प्राण हरण के लिए पर्याप्त होता है। यह सत्य होता तो पहले से ही है, लेकिन नजरों से ओझल कर दिया गया होता है।

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की पूरी विरासत में एक केंद्रीय पात्र रहे और साथ ही संपूर्ण भारतीय मनीषा के प्रतिनिधि और वैचारिक- कर्मरत योद्धा महात्मा गांधी को लेकर भारत सहित पूरे विश्व में सम्मान और उत्सुकता दिखती है, लेकिन पिछले कुछ दशकों में ही नहीं बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भी गांधी जी को लेकर झूठ, प्रपंच और अंध विरोध की शक्तियां लगातार सक्रिय रही हैं। इन शक्तियों की ऊर्जा का केंद्र सांप्रदायिक-जातीय वर्चस्व की आकांक्षी संगठनों की राजनीति रही है। हालांकि इन शक्तियों को जनता के एक हिस्से से खुद को जोड़ने में सफलता मिलती रही है, लेकिन पिछले तीन दशकों में इसे जैसी स्वीकार्यता और प्रसार मिला है, वह हैरान करने वाली सामाजिक वस्तुस्थिति है।

इन संगठनों और शक्तियों की भूमिका राष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्ष में पूरी तरह से नकारात्मक और औपनिवेशिक शक्तियों से सांठगांठ और सहयोग की ही रही है, लेकिन आज वे स्वयं को राष्ट्रवाद के असली पुरोधा बताकर लोगों की नजरों में स्वयं को स्थापित करने में कामयाब भी हुए हैं, साथ ही सरकार और राज्य पर नियंत्रण भी कर चुके हैं। हालांकि आज भी उनकी सांप्रदायिक, जातीय, पूंजी केंद्रित, अभिजन वादी पक्ष स्पष्ट है।

ऐसे दौर में जब छद्म चेतना पर टिकी सांप्रदायिक शक्तियां उरूज पर हैं, जिन्होंने गांधीजी की हत्या की और अभी भी अपनी बांटने की नीति पर अडिग हैं, अशोक कुमार पांडेय जी की यह पुस्तक ‘उसने गांधी को क्यों मारा’ इन शक्तियों से सीधी मुठभेड़ करती हैं। सत्य ऐसा ही होता है जो किसी से नहीं डरता।

यह पुस्तक हर उस प्रश्न का तथ्यपरक और तार्किक उत्तर देती है जो गांधी विरोधी शक्तियों ने उन्हें बदनाम करने और उनकी हत्या को जायज ठहराने के लिए लोगों के मनों में डाल रखा है। ‘वह कौन थे’ का उत्तर देते हुए अशोक पांडेय स्थापित करते हैं कि उनकी सिर्फ यही पहचान है कि वे गांधीजी के हत्यारे थे। यह हत्या कोरी भावुकता या पागलपन में नहीं बल्कि वर्षों से पल रही नफरत और योजना का दुष्परिणाम थी, जो गांधी जी को मारने की अनेक कोशिशों में दिखती है। अपने जीवन काल में संदेह का लाभ पाकर बरी हो गए, लेकिन मृत्यु उपरांत कपूर आयोग द्वारा उनकी सीधी भूमिका को संबद्ध मानने का ‘सावरकर’ से जुड़ा प्रसंग किताब की इस प्रस्थापना को सिद्ध भी करता है।

55 करोड़ पाकिस्तान को दिए जाने की जिद का झूठ हो या विभाजन को लेकर गांधी जी को जिम्मेदार ठहराया जाने का प्रोपेगेंडा हो, भगत सिंह को बचाने को लेकर गांधी जी के प्रयासों पर प्रश्न उठाने की मनोवृति हो या फिर नाथूराम का स्वयं को क्रांतिकारी देश भक्त साबित करने का असफल और कायराना प्रयास, सभी को अशोक कुमार पांडे जी ने अपने तार्किक विश्लेषण और रोचक अंदाज से बेहतरीन रूप में प्रस्तुत किया है।

यह पुस्तक मात्र विद्यार्थियों या इतिहास प्रेमियों के लिए ही नहीं आज के दौर में सभी भारतीयों के लिए आवश्यक है, ऐसा मेरा मानना है। यह हमारे लोकतांत्रिक नागरिक बनने की प्रक्रिया का अभिन्न भाग है कि हम सत्यांवेषी रहें। यह पुस्तक इस सत्यान्वेषण में मील का पत्थर साबित होगी। अशोक जी को इस बेहतरीन पुस्तक के लिए शुभकामनाएं और बधाई। उम्मीद है हमें आगे भी ऐसी ही बेहतरीन पुस्तकें उनसे पढ़ने को मिलेंगी।

(आलोक कुमार मिश्रा राजधानी दिल्ली में रह कर अध्यापन का काम करते हैं।)

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