Saturday, April 1, 2023

पश्चिम बंगाल में ममता और भाजपा ही नहीं लेफ्ट और कांग्रेस भी हैं!

जेपी सिंह
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गोदी मीडिया में ऐसा नैरेटिव गढ़ा जा रहा है कि पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का सीधा मुकाबला भाजपा से है और लेफ्ट या कांग्रेस का अस्तित्व ही नहीं है। जबकि लेफ्ट और कांग्रेस अब की बार विधानसभा चुनाव मिलकर लड़ने जा रहे हैं। पश्चिम बंगाल में इस बार त्रिकोणीय मुकाबला होने जा रहा है। चुनाव पूर्व तृणमूल से भगदड़ जैसी स्थिति है और भाजपा इस बार दूसरे दलों से आये दागियों पर निर्भर है। इसलिए जो मतदाता तृणमूल से असंतुष्ट हैं और भाजपा को वोट नहीं देना चाहते उनके लिए लेफ्ट और कांग्रेस का गठबंधन स्वीकार्य हो सकता है। फिलवक्त भाजपा के पक्ष में जिस तरह की हाईप चल रही है उसके विपरीत यदि लेफ्ट और कांग्रेस के गठबंधन ने अप्रत्याशित उलटफेर किया और त्रिशंकु विधानसभा में किंगमेकर बन कर उभरे तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।             

राजनितिक प्रेक्षक तृणमूल कांग्रेस और भाजपा को लोकसभा चुनाव 2019 में मिले मत प्रतिशत को आधार मानकर भविष्यवाणी कर रहे हैं कि 2021 के विधानसभा चुनावों में दोनों दलों के बीच सीधी लड़ाई हो सकती है। तृणमूल के लिए चुनौती है कि जिस प्रकार वह लोकसभा चुनाव में अपने वोट बैंक को मजबूती से अपने साथ बांधे रही, क्या वैसा ही वह विधानसभा चुनावों में भी कर पाएगी। दूसरे, भाजपा के लिए दोहरी चुनौती होगी। एक वह तृणमूल के मतों में सेंध लगाए और दूसरे लोकसभा चुनाव में वामदलों एवं कांग्रेस के जिस वोट बैंक में उसने सेंध लगाई थी , वह वापस इन दलों के पास न जाने पाए। जबकि ऐसा होता दिख नहीं रहा है। 

लोकसभा चुनाव लेफ्ट और कांग्रेस ने अलग-अलग लड़ा था जबकि इस बार साथ साथ लड़ रहे हैं। फिर लोकसभा चुनाव में ईवीएम पर भी प्रश्नचिन्ह लगा है जिसका निराकरण आज तक नहीं हो पाया। लोकसभा चुनावों में पश्चिम बंगाल में अपनी 12 सीटें खोने के बावजूद ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस अपने वोट बैंक को बचाने में काफी हद तक कामयाब रही है। लेकिन भाजपा का वोट प्रतिशत बढ़ा था। पश्चिम बंगाल में भाजपा ने अपनी सीटें दो से बढ़ाकर 18 कर ली थी । उसका वोट प्रतिशत करीब 22 फीसदी बढ़ा था। लेकिन मतों के आंकड़े बताते हैं कि तृणमूल का अपने वोट बैंक पर कब्जा न सिर्फ बरकरार रहा बल्कि उसमें करीब साढ़े तीन फीसदी का इजाफा हुआ है। भाजपा वामदलों और कांग्रेस के वोट को ही काट पाने में सफल हो सकी। 2014 केलोकसभा चुनाव में वामदलों को करीब 29 फीसदी वोट मिले थे जो 2019 में घटकर आठ-नौ फीसदी रह गया। कांग्रेस के नौ फीसदी से घटकर चारफीसदी रह गए। भाजपा को 2014 में करीब 18 फीसदी वोट मिले थे और 2019 में 22 फीसद का इजाफा हुआ और 40.25 फीसद वोट मिले। 

तृणमूल कांग्रेस को 2014लोकसभा चुनाव में 39 फीसदी वोट मिले थे जो 2019 साढ़े तीन फीसदी बढ़कर 43.28 फीसदी हो गए। लेकिन उसकी सीटें 34 से घटकर 22 रह गईं। जबकि अकेले सीपीएम के14 फीसदी और कांग्रेस के चार फीसदी और अन्य दलों के करीब पांच फीसदी वोट घटे थे जो अधिकांश भाजपा की झोली में गए थे। 

लोकसभा चुनाव के बाद अभी राजनीतिक स्थितियां काफी बदली हैं और भाजपा के पक्ष में माहौल नहीं है। किसान आन्दोलन से लेकर महंगाई बेरोजगारी, सरकारी कंपनियों की बिक्री, रेलवे का निजीकरण आदि तमाम मुद्दे हैं। फिर विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी के कद के सामने भाजपा का कोई स्थानीय प्रभावी चेहरा नहीं है ।2021 के चुनाव में तृणमूल के पास नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी के विरोध जैसा मुद्दा है। करीब 27 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले राज्य में उसके पास ध्रुवीकरण के लिए यह सबसे बड़ा हथियार साबित हो सकता है।

भाजपा इसी एजेंडे के खिलाफ तुष्टीकरण का आरोप लगाकर अपने लिए माहौल बनाने में जुटी हुई है। फिर भजपा के सदाबहार राजनीतिक मित्र ओवैसी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव लड़ने आ रहे हैं जबकि बंगाल में उनका संगठन जीरो है। बंगाल की लड़ाई में कांग्रेस-लेफ्ट गठबंधन और ओवैसी भी बड़े फैक्टर बन सकते हैं। लेकिन, यह दोनों ही फैक्टर किसका खेल बिगाड़ेंगे और किसकी स्थिति मजबूत करेंगे यह बहस का विषय हो सकता है। लेकिन, वोटों और स्थानीय चेहरा के मामले में तृणमूल अभी तक भाजपा पर भारी लग रही है।

पश्चिम बंगाल में अगले विधानसभा चुनावों में दो-तिहाई बहुमत के साथ सत्ता में आने का दावा करने वाली भाजपा के पास भी कोई बड़ा स्थनीय चेहरा नहीं है। भाजपा ने उन्हीं दाग़ी नेताओं पर भरोसा किया है जो पहले से ही भ्रष्टाचार और हत्या तक के आरोपों से जूझ रहे हैं। दो साल पहले तृणमूल से नाता तोड़ कर भाजपा के पाले में जाने वाले मुकुल राय हों या फिर अमित शाह के दौरे के समय शनिवार को अपने दल-बल के साथ भाजपा में शामिल शुभेंदु अधिकारी, सभी दागदार हैं।

सारदा चिटफंड घोटाले में भ्रष्टाचार के आरोप इन दोनों नेताओं पर हैं। इनमें से एक मुकुल राय पर तृणमूल कांग्रेस विधायक सत्यजीत विश्वास की हत्या तक के आरोप हैं। हत्या की जाँच करने वाली सीआईडी की टीम ने इस महीने की शुरुआत में अदालत में जो पूरक आरोपपत्र दायर किया है, उसमें राय का नाम शामिल है। इससे पहले टीएमसी में रहने के दौरान सीबीआई सारदा मामले में उनसे कई दिनों तक पूछताछ कर चुकी है। इसी तरह सारदा चिटफंड के मालिक सुदीप्त सेन ने बीते दिनों जेल से सीबीआई को भेजे पत्र में जिन पाँच नेताओं का ज़िक्र किया है, उनमें मुकुल राय और शुभेंदु अधिकारी के नाम भी शामिल हैं।

पश्चिम बंगाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने बीते लोकसभा चुनाव में तृणमूल के भ्रष्टाचार को ही सबसे बड़ा मुद्दा बनाया था। अमित शाह ने वर्तमान दौरे में भी तृणमूल सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाये हैं। पश्चिम बंगाल के दो दिनी दौरे पर पहुँचे अमित शाह ने भी एक बार फिर इसी मुद्दे को उठाया है। उनका कहना था कि माँ, माटी और मानुष के नारे के साथ सत्ता में आने वाली तृणमूल कांग्रेस ने अब इस नारे तोलाबाज़ी, तुष्टीकरण और भतीजावाद में बदल दिया है। मेदिनीपुर की अपनी रैली में शाह ने यह भी साफ़ कर दिया कि बंगाल में सत्ता हासिल करने के लिए बीजेपी दलबदलुओं पर ही निर्भर है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह का लेख।)

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