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भारत एक बार फिर बन गया है विपन्नों का देश

(कल एक संघी-साथी ने ‘135 करोड़ लोगों के फ्री टीकाकरण और 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन’ देने की PM की महान घोषणा पर पूरे विश्व के पगलाये होने’ का जिक्र किया था। किसी असली/फर्जी वर्ल्ड फोरम पर तारीफों के पुल बांधे गये होंगे, जिन्हें मैंने नहीं देखा। हो सकता है कि हमारे संघी-साथी ने भी नहीं देखा हो और केवल IT cell या उसके किसी operative का फेसबुक पोस्ट forward भर किया हो। उन्होंने ‘गरीब देश की श्रेणी में खड़ा किये जा रहे भारत में पूर्णतया चरमराये Medical infrastructure की rebuilding, चीन और पाकिस्तान के खतरों के मद्देनजर हथियारों की आपूर्ति और अन्य जटिल तैयारियों के बीच PM के संकल्प को और भी महान उपलब्धि’ बताया, खासकर तब, जब यह सब ‘बिना अतिरिक्त ऋण लिये’ किया जा रहा हो।

संभव है उन्हें पता ही न हो, या यह जानने में उनकी दिलचस्पी भी न हो कि World Bank ने पिछले साल मार्च से जून के बीच ही कोरोना संकट को देखते हुये 20,400 करोड़ रुपये का ऋण मंजूर किया और उनमें से करीब 16,700 करोड़ रुपये का पिछले दिसम्बर में disbursement भी हो गया। इसके अलावा World Bank ने 3000 करोड़ रुपये का एक और ऋण देने की बात दिसम्बर 2020 में कही। मित्र ने तो खैर विशेषज्ञों की चेतावनियों के बाद भी Infrastructure की बदहाली के लिये किसी जवाबदेही का या Infrastructure rebuilding का कोई ब्यौरा भी नहीं दिया। तथ्यों में वैसे भी उनकी क्या दिलचस्पी!

अलबत्ता राम मंदिर ट्रस्ट में घपले और गाजियाबाद के अब्दुल समद जैसों की पिटाई के ‘सच्चे-झूठे मामलों पर मीडिया के अरण्य-रोदन से दर्शकों का समय खराब करने’ पर वह इतने कुपित थे कि उन्होंने ‘इस मीडिया के पूर्ण बहिष्कार तक को आवश्यक’ बता दिया। सोचा था कि मित्र हैं तो जवाब भी उन्हीं के पोस्ट पर चस्पां करुं। पर अनुभव बताता है कि वह तथ्यों को फिर अनदेखा करेंगे, फिर कोई जुमला उछालेंगे और ताली-थाली वाली एक जमात likes का, शोभन-अशोभन comments का अम्बार लगाने लगेंगी। सो उनके पोस्ट के reference से यह लम्बा उत्तर, यद्यपि स्वतंत्र तौर पर) :

पिछले 10 सालों में देश में गरीब आबादी का कोई official data तो है नहीं, 2011 के बाद इसका assessment हुआ ही नहीं, लेकिन नरेन्द्र मोदी ने 80 करोड़ लोगों को अगले कई महीनों तक मुफ्त राशन देने की घोषणा कर साफ कर दिया है कि गरीबों की संख्या कम से कम इतनी यानि कुल आबादी का 75 फीसदी तो है ही। यह मामूली उपलब्धि नहीं है कि करीब 45 साल बाद हम एक बार फिर ‘Country of mass poverty’ हैं, ऐसा देश जिसकी अधिकतर आबादी निर्धन है। आजादी के बाद 1951 से 1974 के बीच देश की कुल आबादी में गरीबों की संख्या 47 प्रतिशत से बढ़कर 56 प्रतिशत तक पहुंच गयी थी। लेकिन 70 के दशक में गरीबों की संख्या में कमी का जो सिलसिला शुरु हुआ, वह लगातार तेज ही होता गया। Global Multidimensional Poverty Index – 2019 तो कहती है कि 2006 से 10 सालों में poverty alleviation की यह गति इतनी तेज रही कि उस दशक में 27 करोड़ 10 लाख लोगों को गरीबी से निजात दिलाया जा सका।

Pandemic के इन 2 वर्षों की तो नहीं मालूम, लेकिन 2019 में भी United Nations ने भारत में गरीबों की कुल संख्या 36 करोड़ 40 लाख बतायी थी, यानि कुल आबादी का करीब 28 प्रतिशत। तब क्या पिछले दो साल में ही गरीबों की संख्या में 43 करोड़ 60 लाख का इजाफा हो गया है। पीएम की घोषणा कहती है कि आज 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन की जरुरत तो है, भले Demonetization की औचक घोषणा और बिना किसी तैयारी के GST के समारोही implementation की भी इसमें कोई भूमिका हो।

पर यह असंभव भी नहीं है, खासकर तब, जबकि 2017-18 में ही केन्द्र सरकार के Periodic Labor Force Survey – 2017 की एक leaked report के अनुसार बेरोजगारी की दर 45 साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गयी थी और 1st lockdown के बाद ही लगभग एक साल में 12.2 करोड़ लोगों की रोजी-रोटी छिन गयी, जिनमें 75 प्रतिशत छोटे-मंझोले कारोबारी और दिहाड़ी मजदूर थे। इसके अलावा Centre for Monitoring Indian Economy के एक top official ने हाल ही में एक interview में कहा कि 1st wave के नुकसान से उबरना तो दूर, 2nd wave में पिछले अप्रैल-मई में ही करीब 2 करोड़ लोगों को या तो नौकरी गंवानी पड़ी या उन्हें बगैर वेतन के स्थिति सुधरने का इंतजार करने को कह दिया गया है। सो इस बार देश पर गरीबी की इस भारी मार का एक बड़ा शिकार urban population भी है।

रही बात Free Vaccination की, तो आप करोड़ों मुंह से PM के कसीदे पढ़ते रहें, पूरे देश में लाखों पोस्टर भी लगवा दें, सब जानते हैं कि टीके खरीद की जवाबदेही राज्यों पर छोड़ने, केन्द्र और राज्यों के लिये टीके की अलग दरें तय करने और 45 से अधिक उम्र के लोगों को मुफ्त टीके मुहैया कराने के बाद 18 से अधिक वय के नागरिकों से टीके की कीमत वसूलने का rationale पूछे जाने और Vaccination Policy की पूरी file सुप्रीम कोर्ट में तलब कर लिये जाने के बाद PM ने आनन-फानन में राष्ट्र को संबोधित कर दयानतदारी बरसाने की मुद्रा अपनायी।

लेकिन दोस्त, तुम्हारा क्या! मैं जानता हूं कि तथ्य कष्टकर हैं और तुम्हारी जमात इन पर बात नहीं करेगी। जमात के पास और गोदी मीडिया के पास भी आई.टी.सेल का फर्जीवाड़ा फारवर्ड करने और ताली बजाने की ही जवाबदेही रह गयी है। बहिष्कार की बातें कर लो, लेकिन गोदी मीडिया का बहिष्कार करने की बात तुम्हारे साहिबान सोच भी नहीं सकते। वहीं तो है, साहिबान की जान! बहिष्कार करेंगे तो जियेंगे कैसे?

(राजेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

This post was last modified on June 24, 2021 9:36 pm

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