Thursday, October 28, 2021

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फाइनेंस कंपनियां देश के सबसे बड़े कर्जदारों में

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भारतीय अर्थव्यवस्था ध्वस्त होने के कगार पर है। इंडिया बुल्स और डीएचएफएल जैसी बड़ी एनबीएफसी कंपनियों के बारे में लगातार आपको आगाह कर रहा हूं। अब स्टैंडर्ड एंड पूअर्स ग्लोबल रेटिंग्स ने भी कहा है कि भारतीय वित्तीय क्षेत्र में संक्रामक छूत जैसी परिस्थिति पैदा हो गई है। जैसे ही कोई बड़ी फाइनेंस कंपनी विफल हो रही है, इसका प्रतिकूल प्रभाव आर्थिक विकास पर देखने को मिल रहा है।

‘भारत की फाइनेंस कंपनियां देश के सबसे बड़े कर्जदारों में से हैं। इनकी फंडिंग का एक बड़ा हिस्सा बैंकों से आता है। किसी भी बड़ी गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी या हाउसिंग फाइनेंस कंपनी की विफलता कर्जदाताओं को झटका दे सकती है।’

इंडिया बुल्स की बात करें तो सिटिजन व्हिसिल ब्लोवर फोरम ने दो दिन पहले दिल्ली हाईकोर्ट में अपना जवाब दाखिल कर दिया है। इस जवाब में याचिकाकर्ता ने इंडिया बुल्स के यस बैंक के साथ कारोबार पर सवाल उठाए हैं। इस जवाब में कहा गया है कि 2009 से 2019 तक यस बैंक ने इंडिया बुल्स को लोन दिया। इसके अलावा 14 कंपनियों को 5,698 करोड़ का लोन दिया गया। इनमें से कई कंपनियों की नेटवर्थ निगेटिव थी। कई कंपनियों का कोई कारोबार ही नहीं था। इसके साथा ही इंडिया बुल्स ने राणा कपूर और राणा कपूर के परिवार से जुड़ी सात कंपनियों को 2,034 करोड़ का लोन दिया। इन सात कंपनियों ने रिटर्न तक फाइल नहीं किया है।

ठीक ऐसी ही बल्कि इससे बुरी स्थिति डीएचएफएल की बताई जा रही है। यूनियन बैंक ऑफ इंडिया ने केपीएमजी को अप्रैल 2015 से मार्च 2019 तक की अवधि के लिए डीएचएफएल का स्पेशल रिव्यू करने को कहा था। मार्च के अंत में कंपनी के लोन और अडवांस का कुल आंकड़ा 97,977 करोड़ रुपये था।

केपीएमजी ने पाया कि डीएचएफएल ने करीब 25 ऐसी ग्रुप कंपनियों को 14,000 करोड़ रुपये का लोन दिया है, जिनका औसतन मुनाफा एक लाख रुपया ही रहा है। फॉरेंसिक ऑडिट से पता चला है कि उक्त 25 समूहों पर कंपनी का बकाया कर्ज करीब 13,000 करोड़ रुपये का है। इनमें से 15 कंपिनयों को दिया गया 7,000 करोड़ रुपये का लोन गैर निष्पादित परिसंपत्त‍ि (एनपीए) में नहीं बदला गया।

डीएचएफएल के ऊपर कुल कर्ज 83,873 करोड़ रुपये का था, जिसमें से 38,000 करोड़ रुपये उसे बैंकों को देने हैं। पीएमसी बैंक को डुबोने वाली एचडीआईएल और डीएचएफएल दोनों कंपनियों के मालिक सगे रिश्तेदार हैं। कंपनी की आर्थिक सेहत बिगड़ चुकी है। इसके शेयर की कीमत पिछले डेढ़ साल में 650 रुपये से गिरकर 19 रुपये के आसपास पहुंच गई है।

इंडिया बुल्स समूह में निजी और सरकारी बैंकों का करीब 27,580 करोड़ रुपये फंसा हुआ है। यह कर्ज और नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर के रूप में है। इंडिया बुल्स के प्रमोटर वित्तीय अनियमितता के आरोपों का सामना कर रहे हैं। सबसे ज्यादा पैसा भारतीय स्टेट बैंक का है। इसके 8,100 करोड़ रुपये दांव पर हैं। बैंक ऑफ बड़ौदा के (विजया बैंक और देना बैंक सहित)  6,460 करोड़ रुपये फंसे हुए हैं। संकट में चल रहे यस बैंक के भी इसमें 6,040 करोड़ रुपये दांव पर लगे हैं। यस बैंक के कुल नेटवर्थ का एक चौथाई इंडिया बुल्स समूह में फंसा हुआ है। एक साल में इंडिया बुल्स का शेयर 70 फीसदी तक गिर चुका है।

इन दोनों बड़ी कंपनियों का इस तरह का प्रर्दशन भारतीय बैंकिंग की कमर तोड़ देगा, क्योंकि इस डूबी हुई रकम को एनपीए तक नहीं दिखाया गया है। इतने बड़े डिफॉल्ट अभी हुए नही हैं, जिसमें लगभग 25-25 हज़ार करोड़ रुपये जैसी रकम इन्वॉल्व हो।

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