Tuesday, December 7, 2021

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फ़िल्म सरदार उधम का ऑस्कर नामांकन खारिज, ज्यूरी की मानें तो फ़िल्म घृणा फैलाती है !

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हाल ही में रिलीज हुयी फ़िल्म, सरदार उधम को, ऑस्कर पुरस्कारों के लिये भारतीय ज्यूरी ने भारत की प्रविष्टि के रूप में खारिज कर दिया है। खारिज करने के जो तर्क दिए हैं वे हैं, यह फ़िल्म अंग्रेजों के प्रति घृणा को दर्शाती है। जूरी के एक सदस्य ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि, “वैश्वीकरण के इस युग में, इस नफरत को थामे रखना उचित नहीं है।” एक भारतीय ज्यूरी ने तो, सरदार उधम को ऑस्कर 2022 के लिए देश की आधिकारिक प्रविष्टि के रूप में फिल्म “ब्रिटिशों के प्रति घृणा को प्रोजेक्ट्स” के रूप में कहा।”

सुजीत सरकार द्वारा निर्देशित यह फिल्म एक क्रांतिकारी आंदोलन के नायक और स्वाधीनता संग्राम सेनानी सरदार उधम सिंह के जीवन पर आधारित है। उधम सिंह को, अमृतसर में 13 अप्रैल, 1919 को हुए, जलियांवाला बाग नरसंहार का बदला लेने के लिए, लंदन में माइकल ओ’डायर की हत्या के लिए जाना जाता है। माइकल ओ’डायर 1913 और 1919 के बीच पंजाब, ब्रिटिश भारत के लेफ्टिनेंट गवर्नर थे।

ओ’डायर के कार्यकाल के दौरान ही जलियांवाला बाग नरसंहार हुआ था, जहां ब्रिटिश सैनिकों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर, अनायास और बिना किसी चेतावनी के, तब तक गोलियां चलाईं जब तक कि उनका गोला-बारूद समाप्त नहीं हो गया था। जलियांवाला बाग़ नरसंहार को व्यापक रूप से भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जाता है, जिसने “अंग्रेजी राज” के क्रूर और दमनकारी चेहरे के असल रंग को उजागर कर दिया। इतिहासकारों का मानना है कि इस घटना के बाद भारत पर शासन करने के लिए अंग्रेजों के “नैतिक” दावे का अंत हो गया। इस घटना ने सीधे तौर पर भारतीयों को आज़ादी के लिए प्रेरित किया, जिसका परिणाम आगे जाकर स्वाधीनता संग्राम पर पड़ा।

पंजाब को अंग्रेजी हुकूमत का गढ़ माना जाता था, जो इस बात पर गर्व करता था कि उसने राज्य में कॉलोनियों और रेलवे का विकास कर वहां समृद्धि लाई है। भारतीय सेना में यहां के लोगों का योगदान भी महत्वपूर्ण था। हालांकि इस विकास की आड़ में अंग्रेजी हुकूमत, उन सभी उठने वाली आवाज़ों को क्रूरता से कुचलना चाहती थी और यह 1857 के विद्रोह, 1870 के दशक के कूका आंदोलन और साथ ही 1914-15 के ग़दर आंदोन के दौरान देखने को मिला।

आयरलैंड की जमींदार पृष्ठभूमि से आने वाले ओडायर ब्रितानी औपनिवेश के अधिकारी वर्ग से जुड़े शिक्षित लोगों, व्यापारियों और साहूकारों के ख़िलाफ़ सोच रखते थे। और वो किसी भी राजनीतिक असंतोष को पहले ही अवसर में कुचल देते थे। जनरल ओ डायर को साल 1913 में पंजाब के लाला हरकिशन लाल के पीपुल्स बैंक की बर्बादी के लिए भी दोषी माना गया था। जिसके चलते लाहौर के व्यापारियों और ख़ासतौर पर शहरी इलाके में रहने वाले लोगों का सब कुछ लुट गया। साल 1917-1919 के दरम्यान क़ीमतो में भारी उछाल आया। प्रथम विश्वयुद्ध का असर देश की आर्थिक स्थिति पर पड़ने लगा था। मज़दूरी के मानकों में गिरावट आ गई थी। निचले पायदान पर खड़े मज़दूर और पीछे धकेल दिये गए और इसका परिणाम यह हुआ कि कामगार और कारीगर घोर तंगी में घिर गए।

साल 1919 के फरवरी के अंत में जब रॉलेट बिल आया तो, उसका व्यापक विरोध हुआ और पंजाब में आर्थिक दुरवस्था जन्य असंतोष तथा आक्रोश के कारण, पंजाब इस विरोध में सबसे आगे था। रॉलेट एक्ट के ख़िलाफ़ हुआ आंदोलन भारत का पहला अख़िल भारतीय आंदोलन था, और इसी आंदोलन ने महात्मा गांधी को एक राष्ट्रीय नेता के रूप में, स्थापित कर दिया। इसके बाद ही महात्मा गांधी ने एक सत्याग्रह सभा का गठन किया और अपने असहयोग आंदोलन की तैयारी में, ख़ुद पूरे देश के दौरे पर निकल गए ताकि लोगों को वे एकजुट कर सकें।

हालांकि गांधी कभी भी पंजाब का दौरा नहीं कर सके। वे पंजाब प्रांत में प्रवेश करने ही जा रहे थे कि, इसके ठीक पहले नौ अप्रैल को उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया और दिल्ली वापस भेज दिया गया। वर्ष 1919 के फरवरी महीने की शुरुआत में भी अमृतसर और लाहौर शहरों में सरकार विरोधी सभाएं हुई थीं। लेकिन ये सभाएं स्थानीय मुद्दों को लेकर थीं। इनमें रॉलेट एक्ट के बारे में कोई विशेष चर्चा नहीं की गई थी।

देश के अधिकांश शहरों में 30 मार्च और 6 अप्रैल को देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया गया था। हालांकि इस हड़ताल का सबसे ज़्यादा असर पंजाब के ही अमृतसर, लाहौर, गुजरांवाला और जालंधर शहर में देखने को मिला। 9 अप्रैल को राम नवमी के दिन लोगों ने एक मार्च निकाला। राम नवमी के मौक़े पर निकले इस मार्च में हिंदू तो थे ही, मुस्लिम भी शामिल हुए। मुस्लिमों ने तुर्की सैनिकों जैसे लिबास पहन रखे थे। बड़ी संख्या में लोग तो जमा हुए ही थे, लेकिन जनरल डायर और उसके प्रशासन को सबसे अधिक चिंता हिंदू-मुस्लिम एकता देखकर हुई।

किसी भी विरोध को कुचलने के लिए हमेशा आतुर रहने वाले पंजाब के गवर्नर डायर ने उसी दिन अमृतसर के लोकप्रिय नेताओं डॉ. सत्यपाल और सैफ़ुद्दीन को अमृतसर से निर्वासित करने का फ़ैसला किया और ठीक उसी दिन गांधी जी को भी पंजाब में घुसने नहीं दिया गया और पलवल वापस भेज दिया गया।

अपने नेताओं के निर्वासन की ख़बर ने अमृतसर के लोगों को गुस्से से भर दिया। क़रीब पचास हज़ार की संख्या में लोग जुटे और दस अप्रैल को अपने नेताओं की रिहाई की मांग करते हुए उन्होंने, सिविल लाइन्स तक मार्च निकाला। इस मार्च के दौरान सैनिकों से उनकी मुठभेड़ भी हुई। पथराव और गोलीबारी हुई जिसमें कई लोगों की मौत भी हो गई। गुस्साई भीड़ शहर वापस तो आ गई लेकिन उनके अंदर हलचल मची हुई थी। उन्होंने ब्रिटिश राज से संबद्ध प्रतीकों मसलन बैंक, रेलवे स्टेशन और चर्च में तोड़फोड़ शुरू कर दी। पांच गोरे जिनमें से तीन बैंक कर्मचारी थे और एक रेलवे गार्ड था, मारे भी गए। इस हिंसक आंदोलन का नेतृत्व मुख्य तौर पर हिंदू, सिख खत्री और कश्मीरी मुसलमान कर रहे थे।

ठीक उसी दिन जालंधर के ब्रिगेडियर जनरल रेगिनाल्ड डायर को आदेश दिया गया कि वो इन हिंसक घटनाओं को संभालने के लिए फ़ौरन अमृतसर पहुंचें। नागरिक प्रशासन ढह चुका था और ऐसे में संभवत: डायर को परिस्थितियों को नियंत्रित करने के लिए बुलाया गया था। 13 अप्रैल 1919, बैसाखी के दिन, लगभग शाम के साढ़े चार बज रहे थे। जलियांवाला बाग में सभा चल रही थी। जनरल डायर ने बाग में मौजूद क़रीब 25 से 30 हज़ार लोगों पर, बिना किसी चेतावनी या बिना वहां से निकलने का कोई मौका दिये, निहत्थी जनता पर, गोलियां बरसाने का आदेश दे दिया। गोलीबारी क़रीब दस मिनट तक बिना रुके होती रही। जनरल डायर के आदेश के बाद सैनिकों ने क़रीब 1650 राउंड गोलियां चलाईं। सरकारी आंकड़ों में कुल मृत्यु, 379 बताई जाती है पर गैर सरकारी आंकड़ों के अनुसार, मरने वालों की संख्या हज़ार से अधिक बतायी जाती है।

डायर का जन्म भारत में ही हुआ था और उसके पिता शराब बनाने का काम करते थे। डायर को उर्दू और हिंदुस्तानी दोनों ही भाषाएं बहुत अच्छे से आती थीं। डायर के वरिष्ठ अधिकारियों की नज़र में उसकी कोई बहुत अच्छी साख नहीं थी। इतिहास में डायर का नाम अमृतसर के कसाई के तौर पर है। द बुचर ऑफ अमृतसर नाम से, निचेल कोलेट ने उसकी एक बायोग्राफी भी लिखी है, जो 2006 में प्रकाशित हुयी है।

हंटर कमीशन, जो इस घटना की जांच के लिये गठित हुआ था, के सामने डायर ने माना था कि,” उसने, लोगों पर मशीन गन का इस्तेमाल किया और जलियांवाला बाग़ के लिए एक संकरा सा रास्ता था और सैनिकों को आदेश दिया गया कि वो जिस ओर ज़्यादा संख्या में लोगों को देखें उधर फ़ायर करें। जब फ़ायरिंग बंद हो गई तो वहां न घायलों के लिए मेडिकल की व्यवस्था थी और न लाशों के अंतिम संस्कार की।”
उसे, व्यापक रूप से “ब्रिटिश साम्राज्य के उद्धारकर्ता” के रूप में सम्मानित भी किया गया था।

भारत के स्वाधीनता संग्राम में, किसी ब्रिटिश अधिकारी द्वारा व्यक्तिगत तौर पर की गई यह निर्मम सामूहिक हत्या अपने आप में पहली घटना थी। हिंसा, क्रूरता और राजनीतिक दमन ब्रिटिश राज में पहली बार नहीं हुआ था, और न ही यह अपवाद था, लेकिन यह अपने आप में एक अलग तरह की वीभत्स क्रूरता थी।

‘सरदार उधम’ फिल्म का चयन, ऑस्कर के लिये क्यों नहीं किया गया, इस पर, भारतीय संगीतकार इंद्रदीप दासगुप्ता ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया, “सरदार उधम, फ़िल्म थोड़ी लंबी है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक गुमनाम नायक पर एक भव्य फिल्म बनाने का यह एक ईमानदार प्रयास है। लेकिन इस प्रक्रिया में, यह फ़िल्म, फिर से अंग्रेजों के प्रति हमारी नफरत को उभार सकता है। वैश्वीकरण के इस युग में, इस नफरत को बनाये रखना उचित नहीं है।”

भारतीय प्रोडक्शन डिजाइनर सुमित बसु ने कहा, “कई लोगों ने सरदार उधम को कैमरावर्क, संपादन, ध्वनि डिजाइन और अवधि के चित्रण सहित सिनेमाई गुणवत्ता के लिए प्यार किया है। मैंने सोचा था कि फिल्म की लंबाई एक मुद्दा थी। साथ ही, यह फ़िल्म क्लाइमेक्स पर धीमी हो जाती है। जलियांवाला बाग हत्याकांड के शहीदों के लिए होने वाले स्वाभाविक दर्द और भाव को, दर्शक तक जिस जुनूनी शिद्दत से पहुंचाया जाना चाहिए था, उतनी शिद्दत से इसका फिल्मांकन नहीं किया गया है।”

फ़िल्म की तकनीक, फिल्मांकन, स्क्रिप्ट, फ़ास्ट और स्लो के तर्क अपनी जगह हैं, पर यह तर्क कि यह फ़िल्म अंग्रेजों के प्रति घृणा को बढ़ाती है, अनुचित है। यह फिल्म साम्राज्यवाद के लिए भले ही नफरत दिखाती हो, लेकिन किसी नस्ल या देश विशेष के लिए कोई घृणाभाव उत्पन्न नहीं करती है। यह फिल्म आजादी के बारे में है। क्रांतिकारी आंदोलन के एक नायक के बारे में है। और यह आज़ादी पाने की ललक और जुनून को प्रदर्शित करती है। ऑस्कर नामांकन के लिए फिल्म को अस्वीकार करने के पीछे, घृणाभाव का तर्क आज भी साम्राज्यवादी मानसिकता से पीड़ित तर्क लगता है।

ज्यूरी साहबान को, यह समझना चाहिए कि, सरदार उधम सिंह जैसे हुतात्मा और स्वतंत्रता सेनानी हमारे, वे प्रतीक हैं, जो साम्राज्यवाद के खिलाफ खड़े होने के लिये हमें युगों युगों तक प्रेरणा देंगे। उन्होंने इस देश के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया। और आज ऑस्कर ज्यूरी, उन पर बनी फिल्म, इस विंदु पर खारिज कर दे रहे हैं कि, उन पर बनी ‘सरदार उधम’, फिल्म घृणा फैला रही है। यह अजीब दौर है, जब स्वाधीनता संग्राम के सारे नायक, स्वाधीनता संग्राम से जुड़ी महत्वपूर्ण जगहें, सब पर सवाल उठाए जा रहे हैं और उनका स्वरूप बिगाड़ा जा रहा है। हाल ही में जलियांवाला बाग के सुंदरीकरण के नाम पर अंग्रेजों के विद्र्प और क्रूर चेहरे को ढंकने की कोशिश की गयी है और अब नम्बर में महात्मा गांधी के साबरमती आश्रम का है। यह षड्यंत्र है, उनका, जिनकी स्वाधीनता संग्राम में शायद ही कोई भूमिका रही हो।

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

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