Tuesday, April 16, 2024

जाँच अधिकारी की सशपथ स्वीकारोक्ति- भीमा कोरेगाँव हिंसा में एल्गार परिषद का हाथ नहीं

अधिकांश आतंकी गिरफ्तारियों के मामलों में 8-10-12-14 साल बाद तथा कथित आतंकी संगठनों के भरी जवानी में जेल भेजे गये कथित आतंकी पर्याप्त सबूत न होने के आधार पर अदालतों द्वारा बरी कर दिये जाते रहे है।अब अदालत तो नहीं बल्कि 1 जनवरी, 2018 को भीमा कोरेगांव में दलित समुदाय के सदस्यों पर जातीय हिंसा की जाँच कर रहे एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने सशपथ माना है कि एल्गार परिषद कार्यक्रम की हिंसा में कोई भूमिका नहीं थी यह जाँच अधिकारी उप-विभागीय पुलिस अधिकारी गणेश मोरे हैं। द वायर की रिपोर्ट के अनुसार मोरे ने यह बात हिंसा की जांच के लिए गठित दो सदस्यीय न्यायिक आयोग के सामने कबूल की है।

तो यक्ष प्रश्न यह है कि पिछले चार साल में सरकार से लेकर पुलिस और एनआईए तक दलितों, दलितों के लिए काम करने वाले एक्टिविस्टों और दूसरे सामाजिक कार्यकर्ता के पीछे किस आधार पर पड़ी हैं?गणेश मोरे की इस स्वीकारोक्ति के बाद क्या पुणे पुलिस और राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी एनआईए के दावों पर सवाल नहीं खड़े होते हैं?

 एनआईए का दावा है कि 16 एक्टिविस्टों ने भीमा कोरेगांव में अपने भाषणों से भीड़ को ‘भड़काने’ और भीमा कोरेगांव हिंसा भड़काने में सक्रिय भूमिका निभाई थी। इस मामले के तीन आरोपियों को जमानत पर रिहा कर दिया गया है, और एक व्यक्ति की हिरासत में मृत्यु हो गई, बाक़ी 12 मुंबई की जेलों में हैं।गणेश मोरे भीमा कोरेगांव हिंसा मामले से किस तरह जुड़े रहे हैं।

हर साल 1 जनवरी को पूरे देश से दलित भीमा कोरेगाँव पहुंचकर पेशवा के ख़िलाफ़ महारों की वीरता और शौर्य का जश्न मनाते हैं। भीमा कोरेगांव सदियों तक होने वाले दलितों के दमन के प्रतिशोध का प्रतीक बन गया है। 1 जनवरी, 1818 को अंग्रेजों की तरफ से लड़ते हुए महार रेजीमेंट के सैनिकों ने पेशवा बाजीराव द्वितीय की भारी-भरकम फौज को परास्त किया था। पुणे से महज 19 किलोमीटर दूर भीमा नदी के किनारे कोरेगांव में होने वाले इस युद्ध में शहीद हुए महारों सहित अनेक योद्धाओं के नाम इस शिला स्तंभ पर दर्ज हैं।

1 जनवरी 2018 को भीमा कोरेगाँव की लड़ाई के दो सौ साल हुए थे। बड़ी संख्या में दलित जुटे थे। दलितों का आरोप है कि इस आयोजन में विघ्न डालने के लिए संभाजी भिडे और मिलिंद एकबोटे इलाक़े में काफ़ी सक्रिय थे। क़रीब दो महीने से इनके संगठन के लोग स्थानीय स्तर पर लोगों का अभियान चला रहे थे। दलित कार्यकर्ता जैसे ही कोरेगाँव के लिए बढ़े, उन पर छतों से पत्थर की बौछार शुरू हो गई। दलितों की तरफ़ से भी जवाब दिया गया। भीमा कोरेगाँव हिंसा में एक आदमी की मौत हुई और सैकड़ों लोग घायल हुए। पुलिस ने 20 से ज़्यादा एफ़आईआर दर्ज़ कीं और 100 से ज़्यादा लोगों को गिरफ़्तार किया था।

हिंसा के बाद आरोप लगाया गया कि पुणे के शनिवारवाडा में एक दिन पहले यानी 31 दिसंबर 2017 को एल्ग़ार परिषद की जो कॉन्फ़्रेंस हुई थी उसमें भड़काऊ भाषण दिए गए। भाषण देने वालों में दलित नेता जिग्नेश मेवाणी और उमर ख़ालिद के नाम प्रमुखता से लिए गए। इन दोनों के खिलाफ केस भी दर्ज़ हुआ।

गौरतलब बात यह है कि एल्ग़ार परिषद की बैठक सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज और प्रेस काउंसिल के पूर्व चेयरमैन जस्टिस पी. बी. सावंत ने बुलाई थी। स्थानीय एनजीओ कबीर कला मंच इस आयोजन में बराबर का साझीदार था। पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि कबीर कला मंच के सदस्यों और सुधीर धावले ने आपत्तिजनक गाने पेश किए, राष्ट्रविरोधी भाषण दिए गए और समाज को बाँटने की कोशिश की गई। इसकी वजह से भीमा कोरेगाँव में हिंसा हुई। जस्टिस सावंत ने इससे साफ़ इनकार किया है, लेकिन पुलिस अपनी ही थ्योरी पर क़ायम रही।

इस मामले की जाँच अधिकारी रहे और हाल ही में सेवानिवृत्त हुए मोरे ने इस साल अप्रैल में शुरू हुए एक बयान में स्वीकार किया कि अत्याचार के नौ मामले उनके अधिकार क्षेत्र में दायर किए गए और उनके द्वारा जांच की गई। उन्होंने जाँच में कहा है कि हिंसा में एल्गार परिषद के आयोजन की कोई भूमिका नहीं दिखाई दी।

मोरे ने एक गवाह की ओर से पेश वकील राहुल मखारे के सवाल के जवाब में कहा है कि मुझे यह दिखाने के लिए कोई जानकारी या सामग्री नहीं मिली कि 1 जनवरी 2018 को हुई दंगों की घटना 31 दिसंबर 2017 को पुणे के शनिवारवाडा में एल्गार परिषद के आयोजन की वजह से हुई थी।यह शायद पहली बार है जब किसी राज्य के प्रतिनिधि ने स्वीकार किया है कि एल्गार परिषद की घटना की हिंसा में कोई भूमिका नहीं थी।

रिपोर्ट के अनुसार राहुल मखारे कहते हैं, ‘हम सभी ने सबूतों की ओर इशारा किया है जो हिंसा में मिलिंद एकबोटे और मनोहर कुलकर्णी उर्फ संभाजी भिडे की प्रत्यक्ष भूमिका को साफ़ तौर पर दर्शाता है। पीड़ितों द्वारा दर्ज कराई गई प्राथमिकी भी उनकी भूमिका और भीमा कोरेगांव क्षेत्र में कई वर्षों से काम कर रहे उनके संगठन से जुड़े लोगों की ओर इशारा करती है। लेकिन इस सबूत को राज्य ने दबा दिया है।

दरअसल एफआईआर के बाद एकबोटे और भिडे पर दलितों पर हिंसा भड़काने और इसमें उनकी सीधी भूमिका के लिए मामला दर्ज किया गया था। एकबोटे को तो 2018 में कुछ दिनों के लिए गिरफ्तार भी किया गया था, लेकिन भिडे बचे रहे। भिडे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रचारक रहे हैं और एकबोटे भारतीय जनता पार्टी के नेता और विधायक का चुनाव लड़ चुके हैं।लेकिन पुलिस ने बाद में जो कार्रवाई की वह एल्गार परिषद से जुड़े लोगों के ईर्द-गिर्द ही रही।

पुलिस ने दलितों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता वरवर राव, सुधा भारद्वाज, अरुण फ़रेरा, गौतम नवलखा, वरनो गोन्जाल्विस, स्टैन स्वामी जैसे एक्टिविस्टों पर कार्रवाई की। पहले तो उन पर हिंसा भड़काने के आरोप लगे थे, लेकिन बाद में उन्हें ‘अर्बन नक्सल’ कहा गया।उनमें से अधिकतर पर माओवादियों से संबंध होने का आरोप लगाया गया। एनआईए ने जाँच में उनमें से कई पर कश्मीरी अलगाववादियों से संबंध होने के आरोप लगाए। कुछ पर प्रधानमंत्री की हत्या की साज़िश रचने का आरोप भी लगाया गया। 

कई मीडिया रिपोर्टों में अब यह दावा किया गया है कि अमेरिकी फोरेंसिक फर्म ने पाया है कि एक्टिविस्ट स्टैन स्वामी, रोना विल्सन और सुरेंद्र गाडलिंग के कम्प्यूटर में सबूत डालने के सबूत मिले हैं। अमेरिका का प्रतिष्ठित अख़बार वाशिंगटन पोस्ट ने ख़बर दी है,जिसमें कहा गया है कि अब मैसाचुसेट्स स्थित डिजिटल फोरेंसिक फर्म, आर्सेनल कंसल्टिंग ने उनके कंप्यूटर की एक इलेक्ट्रॉनिक कॉपी की जाँच की है। कंपनी की नई रिपोर्ट के अनुसार, इसका निष्कर्ष है कि एक हैकर ने उनके डिवाइस में घुसपैठ की और साक्ष्य प्लांट किए।

हिंसा की जाँच के लिए न्यायिक आयोग गठित हुआ। दो सदस्यीय न्यायिक आयोग की अध्यक्षता कलकत्ता उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जे.एन. पटेल ने की। सदस्य के रूप में महाराष्ट्र के पूर्व मुख्य सचिव सुमित मलिक थे। उन्होंने 2018 की शुरुआत में इसकी सुनवाई शुरू की। तब से आयोग ने कई एक्सटेंशन मांगे हैं। पीड़ितों के साथ-साथ पुलिस और खुफिया इकाई सहित राज्य मशीनरी ने अपने हलफनामे दाखिल किए हैं।

इधर, एल्ग़ार परिषद की बैठक बुलाने वाले सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज और प्रेस काउंसिल के पूर्व चेयरमैन जस्टिस पी. बी. सावंत ने क़रीब तीन साल पहले हफ़िंगटन पोस्ट को एक इंटरव्यू दिया था। उसमें उन्होंने पुलिस की थ्योरी को ग़लत बताया था। उन्होंने साफ़ कहा था कि एल्ग़ार परिषद के लोगों का माओवादियों से कोई लेना-देना नहीं है, इसलिए यह कहना कि एल्ग़ार परिषद को माओवादियों ने फ़ंड किया था और आयोजन के असली कर्ता-धर्ता वही थे, ग़लत है। जस्टिस सावंत का आरोप है कि भिड़े और एकबोटे ने हिंसा कराई।

उप-विभागीय पुलिस अधिकारी गणेश मोरे द्वारा हिंसा की जांच कर रहे दो-व्यक्ति न्यायिक आयोग के सामने की गई यह महत्वपूर्ण स्वीकारोक्ति पुणे पुलिस और बाद में राष्ट्रीय जांच एजेंसी द्वारा एक अलग मामले में हिरासत में लिए गए 16 मानवाधिकार अधिवक्ताओं के खिलाफ लगाए गए आरोपों को ध्वस्त कर देती है।

दो सदस्यीय न्यायिक आयोग, जिसका नेतृत्व कलकत्ता उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जेएन पटेल कर रहे हैं और जिसमें महाराष्ट्र के पूर्व मुख्य सचिव सुमित मलिक शामिल हैं, ने 2018 की शुरुआत में सुनवाई शुरू की थी। तब से, आयोग ने कई एक्सटेंशन का अनुरोध किया है और पुणे और मुंबई में नियमित सुनवाई की है।पीड़ितों के साथ-साथ पुलिस और खुफिया इकाई सहित राज्य तंत्र ने भी हलफनामे दाखिल किए हैं।

पुणे पुलिस ने दावा किया था कि इस मामले को एनआईए को स्थानांतरित करने से पहले माओवादियों द्वारा कॉन्क्लेव का समर्थन किया गया था।

सुधीर धवले, एक लेखक और मुंबई स्थित दलित अधिकार कार्यकर्ता, और महेश राउत, गढ़चिरौली के एक युवा कार्यकर्ता, जिन्होंने विस्थापन पर काम किया, नागपुर विश्वविद्यालय के अंग्रेजी साहित्य विभाग के पूर्व प्रमुख शोमा सेन, अधिवक्ता अरुण फरेरा और सुधा भारद्वाज, कार्यकर्ता-लेखक वरवारा राव, एक्टिविस्ट वर्नोन गोंजाल्विस, कैदियों के अधिकार कार्यकर्ता रोना विल्सन, सुरेंद्र गाडलिंग, एक यूएपीए विशेषज्ञ और नागपुर के वकील, आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता दिवंगत फादर स्टेन स्वामी, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हनी बाबू, विद्वान और कार्यकर्ता आनंद तेलतुंबडे, नागरिक स्वतंत्रता कार्यकर्ता गौतम नवलखा कबीर कला मंच के सदस्य सागर गोरखे, रमेश घिचोर और ज्योति जगताप मामले में गिरफ्तार किए गए सोलह सदस्य हैं।

तेलतुंबडे, भारद्वाज और राव को जमानत पर रिहा कर दिया गया है, लेकिन स्वामी की पिछले साल कथित तौर पर राज्य की लापरवाही और पर्याप्त चिकित्सा देखभाल प्रदान करने में विफलता के परिणामस्वरूप मृत्यु हो गई।

राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने कहा कि ये 16 लोग भीमा कोरेगांव की लड़ाई की 200वीं वर्षगांठ पर अपने भाषणों से भीमा कोरेगांव में एकत्रित भीड़ को “भड़काने” और हिंसा भड़काने में सक्रिय रूप से शामिल थे। जबकि तीन लोगों को जमानत पर रिहा कर दिया गया है और एक व्यक्ति की हिरासत में मृत्यु हो गई है, शेष 12 मुंबई में कैद हैं।

उप-विभागीय पुलिस अधिकारी गणेश मोरे द्वारा हिंसा की जांच के लिए दो सदस्यीय न्यायिक आयोग के सामने किए गए इस महत्वपूर्ण खुलासे ने पुणे पुलिस और बाद में एक अलग मामले में गिरफ्तार किए गए 16 मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, वकीलों के खिलाफ राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) द्वारा किए गए दावों की पोल खोल दी है

यह रहस्योद्घाटन दो कारणों से महत्वपूर्ण है. जहां एक ओर यह एल्गार परिषद मामले में गिरफ्तार किए गए लोगों को वस्तुतः दोषमुक्त कर देता है, वहीं यह असल सवाल पर भी बात करता है: भीमा कोरेगांव में हिंसा के पीछे वास्तव में कौन था?

मखारे कहते हैं, ‘हम सभी ने उन सबूतों की ओर इशारा किया है जो हिंसा में मिलिंद एकबोटे और मनोहर कुलकर्णी उर्फ संभाजी भिड़े की प्रत्यक्ष भूमिका को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं। पीड़ितों द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर भी उनकी भूमिका और भीमा कोरेगांव क्षेत्र में कई वर्षों से काम कर रहे उनके संगठन से जुड़े लोगों की ओर इशारा करती है. लेकिन इस सबूत को सरकार ने दबा दिया

भीमा कोरेगांव से महज 3.5 किलोमीटर की दूरी पर वधू बुद्रुक गांव है. यह गांव अपने 17वीं शताब्दी के इतिहास के लिए प्रसिद्ध है, जब मुगल बादशाह औरंगजेब के डर से अन्य लोग आगे आने में विफल रहे थे, तब राजा संभाजी का अंतिम संस्कार एक दलित बाबा गोविंद गोपाल गायकवाड़ द्वारा किया गया था। यहां के ग्रामीणों ने भिड़े और एकबोटे पर माहौल खराब करने और गायकवाड़ की विरासत का भगवाकरण करने का आरोप लगाया है।

भले ही भीमा कोरेगांव में आंबेडकरवादी भीड़ इकट्ठी हुई थी, लेकिन भिड़े के लोग भगवा झंडे लिए गांव में इकट्ठा हुए थे और भिड़े द्वारा लिखा गया एक ‘प्रेरणा मंत्र’ सुना रहे थे, जिसमें ‘हिंदुओं को उनकी आस्था को चुनौती देने वालों के खिलाफ हथियार उठाने के लिए’ उकसाया गया था।

ग्रामीणों का दावा है कि ऐसा दलितों के खिलाफ कथित प्रभावशाली जातियों, विशेष रूप से मराठों को भड़काने के लिए किया गया था। हालांकि जब मोरे से उस कथित मंत्र और इसे गाने के इरादे के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने आयोग से कहा कि वह ‘नहीं बता सकते कि सामग्री आपत्तिजनक थी या नहीं

जातिगत हिंसा के बाद पीड़ितों द्वारा दर्ज करवाई गई करीब 25 एफआईआर में दक्षिणपंथी लोगों का नाम है, जो मुख्य रूप से एकबोटे की समस्त हिंदू अघाड़ी और भिड़े के शिवप्रतिष्ठान हिंदुस्तान से जुड़े हैं।गौरतलब है कि इनमें से किसी भी मामले में पीड़ितों ने एल्गार परिषद आयोजन पर हिंसा भड़काने का आरोप नहीं लगाया है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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