पहले की गलती दुरुस्त किए बग़ैर दूसरा लॉक डाउन शुरू

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लॉकडाउन टू यानी पहला फेल, दूसरा शुरू। पहला लॉक डाउन बगैर सोचे-समझे था, विपक्ष और राज्यों के मुख्यमंत्रियों से बातचीत किए बगैर था। मगर, दूसरा लॉकडाउन ऐसा नहीं है। सबकी सहमति है। मगर, यह बाल के 400वें हिस्से से छोटे कोरोना के सामने मानवीय व शासकीय बेबसी का प्रदर्शन है। लॉक डाउन चिकित्सकों की उस सोच के भी खिलाफ है जो कोरोना को परास्त करने का तरीक़ा हर्ड इम्यूनिटी को मानते हैं। मगर, क्या लॉक डाउन बिल्कुल कारगर नहीं है या कोरोना वायरस पर इससे फर्क नहीं पड़ेगा?

कोरोना वायरस को दो तरीकों से मारा या हराया जा सकता है- 

एक, इस वायरस को इंसान अपने शरीर में पनाह न दे जिससे वह अपनी मौत मरने को मजबूर हो जाए। 

दूसरा, इंसानी शरीर का इम्यून सिस्टम इस कोरोना से संघर्ष करे जिसमें चिकित्सा विज्ञान का सहयोग हो। तब कोरोना इंसान से लड़ता हुआ हार जाता है, इंसान नहीं हारता।

पहले तरीके पर अमल करता है लॉक डाउन। इसमें वायरस से दूरी बनायी जाती है। सोशल डिस्टेंसिंग होती है। कोरोना संक्रमित मरीजों का आइसोलेशन होता है। मगर, इस पूरी प्रक्रिया में हमने देखा है कि कोरोना मरीज का इलाज करने वाले 90 से ज्यादा डॉक्टर और मेडिकल स्टाफ खुद कोरोना की चपेट में आ गये। न लॉक डाउन सौ फीसदी सफल हो सकता है, न आइसोलेशन ही पूरी तरह कारगर हो पाता है। नतीजा यह है कि 24 मार्च को कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या 571 थी, वही 13 अप्रैल तक ऐसे मरीजों की संख्या 10 हजार पार कर गयी है।

पहला तरीका यानी लॉक डाउन कोरोना के संक्रमण के प्रभाव से कम खतरनाक नहीं है। कोरोना से उनको खतरा है जो संक्रमित होते हैं, उनको डर है जो संक्रमित हो सकते हैं। लेकिन, लॉकडाउन से उस देश की पूरी आबादी को खतरा है। सबसे ज्यादा गरीबों को, श्रमिकों को, युवकों को जिन पर बेरोजगारी और डूबती अर्थव्यवस्था का कहर बरपता है। कारोबारी और दौलतमंद भी लॉक डाउन से प्रभावित होते हैं। इंटरनेशनल श्रम संगठन ने जानकारी दी है कि भारत में कोरोना संकट के बाद से अब तक 10 करोड़ लोगों की नौकरी जा चुकी है। बेरोजगारी 30 प्रतिशत के करीब हो चुकी है।

दूसरा तरीका हर्ड इम्यूनिटी का है जो पहले तरीके के अस्तित्व में रहते हुए भी और इसके बगैर भी विकसित होता जाता है। हर्ड इम्यूनिटी का मतलब यह है कि शरीर में कोरोना से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो। यह या तो वैक्सिनेशन से हो सकता है या फिर एक बार कोरोना का संक्रमण होने के बाद उसे परास्त करने से संभव है।

दूसरे तरीके में अगर चिकित्सा विज्ञान का समर्थन नहीं मिलता है तो मौत ज्यादा होती है। वहीं शासकीय व्यवस्था अगर चिकित्सा विज्ञान का इस्तेमाल करते हुए कोरोना से लड़ने के तरीके विकसित करती है तो मौत भी कम हो सकती है और देश को लॉकडाउन के दुष्परिणामों से भी बचाया जा सकता है। 

ह़ॉटस्पॉट थ्योरी यही है। यह पहले और दूसरे तरीके का समन्वय है। इसमें प्रभावित इलाके के लिए लॉक डाउन और सोशल डिस्टेंसिंग भी है और सेनिटाइजेशन के साथ-साथ मरीजों का आइसोलेशन भी। दवा के बगैर भी यह मरीज को संक्रमण से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने का अवसर देता है। हाइड्रोक्लोरोक्वीन जैसी दवा के क्लीनिकल ट्रायल का भी यह मौका बनाता है। भीलवाड़ा में यह थ्योरी सफल हुई है। इसे बाकी जगहों पर भी अपनाना चाहिए।

देश में 465 जिले ऐसे हैं जहां कोरोना का संक्रमण बिल्कुल नहीं है। इन जिलों में लॉकडाउन क्यों होना चाहिए? क्यों लोग अपनी मेहनत से तैयार की गयी फसल न काटें? क्यों यहां के मजदूर तबके को खेतों में काम करने से रोका जाए? क्यों यहां सारे कारोबार पर ताले लगें? सीमित नियंत्रण के साथ इन जिलों में कारोबार चलने चाहिए।

देश की राजनीति कोरोना के सामने भीगी बिल्ली बन गयी है। सही फैसले लेने से डर रही है। राज्यों के मुख्यमंत्री आगे बढ़कर लॉक डाउन का फैसला ले रहे हैं। वे बस संकट को टालना चाहते हैं। कोरोना संक्रमण बढ़ने की स्थिति में लापरवाही का आरोप न लगे, इससे बचने के लिए लॉक डाउन का सहारा ले रहे हैं। वास्तव में वे कोरोना से निपटने का साहस नहीं दिखा रहे हैं। राष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री ने भी यही किया। दूसरे लॉक डाउन की ओर बढ़ने से पहले मुख्यमंत्रियों और राजनीतिक दलों के साथ चर्चा का मकसद भी राजनीतिक जोखिम को कम करना है न कि कोरोना से लड़ना।

कमजोर राजनीतिक इच्छा शक्ति का दुष्परिणाम होने वाला है लंबा कोरोना संकट। जब दूसरे देश इस संकट से निकलकर अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहे होंगे, हम इसी संकट से जूझ रहे होंगे और हमारी अर्थव्यवस्था कमजोर हो रही होगी। अर्थव्यवस्था ज़िन्दगी की गाड़ी होती है। इसे रोकना ज़िन्दगी को रोकना है। यह कोरोना के दानवी मकसद को ही आगे बढ़ाता है। 

लॉकडाउन ने देश में हताशा को बढ़ाया है। कोरोना को इतना बड़ा संकट बनाकर पेश किया गया है कि एक बार किसी को कोरोना हो जाए, तो न सिर्फ वह निराश हो जाता है बल्कि उसका परिवार, पड़ोसी और आस-पास के लोग दहशत में आ जाते हैं। नतीजा है कोरोना संक्रमित लोगों से नफरत की घटनाएं, कोरोना मरीजों की आत्महत्याएं, कोरोना वॉरियर्स डॉक्टर और नर्सों पर हमले। इतना ही नहीं सड़क पर पुलिस पर भी हमले तेज हो गये हैं। कोरोना संक्रमण की शिकायत करने पर पड़ोसी जान ले रहे हैं। अलग-अलग परिस्थितियों और कारणों के बीच इंसान ही इंसान का दुश्मन बना है और वजह है कोरोना। वास्तव में कोरोना तो निमित्त है, माध्यम है। इसने इंसान के श्रेष्ठ होने के दावे को तमाम उदाहरणों में धराशायी कर दिखाया है।

(प्रेम कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल विभिन्न चैनलों पर बहस करते देखा जा सकता है।)

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