कोरोना के ख़िलाफ़ लड़ाई से ज्यादा राजनीतिक एजेंडे पर जोर

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कोविड-19 को एक ओर विश्व के नए संगठक के रूप में देखा जा रहा लेकिन देश की सरकार इसे अपने एजेन्डे को लागू करने के अवसर की तरह देख रही है। यह प्रश्न अब बहुत पीछे छूट गया है कि सरकार ने समय रहते इस महामारी से लड़ने की तैयारी क्यों नहीं की, और वह तैयारी के समय एनआरसी नाम पर देश को बांटने वाले कार्यों में या फिर ट्रम्प के नमस्ते इंडिया वाले प्रहसन में क्यों उलझी थी।

अब चूंकि बाजी हाथ से निकल गई है तो फिर मौजूदा हालात से ही अपना एजेन्डा साधने के प्रयास आरम्भ हो गए हैं। संविधान में केन्द्र और राज्यों के अधिकारों में स्वास्थ्य का विषय केन्द्र और राज्य, दोनों के हिस्से में है, मोटा-मोटी बात अभी तक यह रही कि नीतिगत मामले स्वाभाविक रूप से केन्द्र सरकार के पास रहें और क्रियान्वयन सम्बंधी जिम्मेदारी राज्य संभाले।

लेकिन जब से बेजेपी सरकार सत्ता में आई है तब से राज्यों को और अधिक कमजोर करके केन्द्र के हाथ में और अधिकार देने की की नीति मजबूती से चल रही है। स्वास्थ्य मामलों में बेवजह दखलंदाजी जनता की स्वास्थ्य समस्याओं को सुलझाने के बजाए उलझाने का काम करेगी, लेकिन इस नीति का इससे भी घातक परिणाम यह होगा कि राज्य सरकारें बेजान और गैर जरूरी होती जाएंगी। और तब बीजेपी को संसदीय गणतंत्र को बदलना आसान हो जाएगा, एक निशान एक राष्ट्र और राज्यों के गणतंत्र को समाप्त करके बिना विपक्ष के एकछत्र तानाशाही।  जिसे करने की संघ की पुरानी इच्छा है।

कोरोना वायरस काल में जिस तरह से केन्द्र सरकार राज्यों के साथ व्यवहार कर रही है उसको देखकर तथा प्रधानमंत्री राहत कोष के गठन व उसके संचालन के तौर तरीके से यह आशंका और बलवती होती जा रही है। कैरोना महामारी से निपटने के लिए केन्द्र सरकार ने ऐसा कुछ नहीं किया कि उसे किसी बात का क्रेडिट दिया जाए। न पर्याप्त जीवन रक्षक उपकरणों की उपलब्धता रही और ना साधारण से मास्क ही।

राज्यों ने जब अपने स्तर से इस महामारी से निपटने के लिए जरूरी सामान/उपकरण खरीदने आरम्भ किए तो केन्द्र सरकार ने उन पर ऐसी खरीदारी करने पर बैन लगा दिया, जो कि सरासर राज्यों के अधिकारों में सीधा हस्तक्षेप है। इसका परिणाम घटिया सामान की केन्द्रित सप्लाई के रूप में सामने आ रहा है। अब सरकार इससे भी घातक काम करने को उद्धत हो रही है। राज्यों को धमकाकर अपना राजनीतिक एजेन्डा पूरा करने का।

ऐसे समय जब महामारी पूरे देश में फैल रही है और सरकार स्वयं एकजुट होकर महामारी से लड़ने का आह्वान कर रही है, ठीक उसी समय केन्द्र सरकार राज्यों के मामले में दोगलापन करके इस राष्ट्र राज के लिए घातक संदेश दे रही है।

कोरोना फैलने फैलाने के कनेक्शन के आरोप प्रत्यारोप से बचकर यह अवश्य कहा जा सकता है कि, कोरोना अपने फैलाव के लिऐ इंसानी बेवकूफी और गल्ती का पूरा इस्तेमाल कर रहा है, और सरकार अभी भी अपने राजनैतिक हित देखने से ऊपर नहीं उठ रही है। कोरोना महामारी की फील्ड लेबल पर भयावहता देखने व इसमें राज्य सरकारों द्वारा “की जा रही लापरवाहियों” की जांच के लिए व ‘उन्हें सुझाव’ देने के लिए केन्द्र सरकार ने 6 टीमों को भेजा है। उसमें महाराष्ट्र अपने महानगरीय चरित्र और सघनता के कारण शीर्ष पर है, वहां की स्थिति भयावह है।  लेकिन गुजरात का अहमदाबाद जो वर्ल्ड का बेस्ट स्मार्ट सिटी बताया जाता रहा है वह सम्मिलित नहीं है।

जो अपनी कम सघनता के बावजूद दूसरे नम्बर पर पहुंच गया है। वहां मरीजों का ग्राफ बहुत तेजी से बढ़ रहा है, अहमदाबाद के सिविल अस्पताल में मरीजों का धार्मिक विभाजन तो कर दिया गया था लेकिन वहां पर्याप्त बेड की व्यवस्था नहीं हो सकी। राज्य के दो हजार से अधिक केसों में से करीब 1300 अकेले अहमदाबाद के हैं। आने वाले दिनों में यह स्थिति और भयंकर न हो जाए इसकी चिन्ता सरकार को नहीं दिखती, चिन्ता यह दिख रही है कि यदि इस पर से पर्दा उठ गया तो नमस्ते इंडिया व गुजरात मॉडल का ढोल फट जाएगा।

इस बीच यह खबर/आरोपों की सूची हवा में तैराई जा रही है कि राज्य सरकारें मरीजों की संख्या कम बता रही हैं या वह अपने संसाधन इस तरह इस्तेमाल कर रही हैं जिससे मरीजों की वास्तविक संख्या का पता नहीं चल रही है। ऐसा ही आरोप चीन  पर भी लगा था कि वहां मरीजों व मृतकों की संख्या में हेरफेर किया गया है। 

यदि ऐसा काम हो रहा है तो शर्मनाक है। इस दृष्टि से केन्द्र सरकार द्वारा टारगेट किए गए पश्चिम बंगाल और उप्र के आंकड़ों की तुलना करें तो पाएंगे कि इसमें भी बड़ा झोल है। उप्र में एक आगरा ही पूरे पश्चिमी बंगाल पर भारी पड़ रहा। लेकिन चिन्ता वहां की नहीं है और न इस बात का भय है कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर इस आपदा का कितना कुप्रभाव भविष्य में पड़ेगा। वहां तीन निजी चिकित्सालयों से महामारी फैलती रही और सरकार जमाती वाले एजेन्डे में लगी रही। ऐसी जगह हालात न बिगड़ें यह चिन्ता सरकार की नहीं दिखती। वह किसी न किसी तरह कोविड-19 के बहाने पश्चिमी बंगाल सहित राज्य सरकारों पर शिकंजा कसने में लगी है। 

यहां यह बताना भी जरूरी है कि केन्द्र सरकार जिस समय अपने राजनीतिक ऐजेन्डे में डूबी हुई थी उस समय राजस्थान की सरकार ने अपनी प्रशासनिक चतुराई से भीलवाड़ा में कोरोना के आसन्न संकट को रोक लिया था, उस राजस्थान सरकार द्वारा की जाने वाली कथित लापरवाही को देखने के लिए भी एक टीम सरकार ने नियुक्त की है।

कोरोना जब जाएगा तब जाएगा लेकिन यह केन्द्र और राज्य के सम्बंधों पर गम्भीर प्रश्न छोड़ जाएगा।

(इस्लाम हुसैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और नैनीताल के काठगोदाम में रहते हैं।)

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