Saturday, January 22, 2022

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क्या भारत को इंतजार है लोकतंत्र की बड़ी लड़ाई का?

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इस बार संसद के शीतकालीन सत्र के नहीं होने के आसार हैं। सत्र के स्थगित होने जैसे मुद्दे को मीडिया और राजनीतिक पार्टियों ने जरूरी गंभीरता से नहीं लिया है। अगर गौर से देखें तो लोकतंत्र की नींव हिलाने का प्रोजेक्ट पूरी तैयारी से चालू है। संस्थाएं, जांच एंजेंसियां, अदालतें तथा सिवलि सेवा- डरे मेमनों की तरह काम कर रही हैं और गुपकार गठबंधन तथा कथित लव जिहाद जैसे मुद्दे आरएसएस तथा भाजपा की ओर से बहस में लाए जा रहे हैं। सभी को इसी प्रोजेक्ट के हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए।

क्या यह दिलचस्प नहीं है कि कोरोना महामारी के सबसे बुरे दौर में भाजपा ने मध्य प्रदेश की सरकार गिराई? यहां तक कि फिर से कुर्सी पर बैठ गए शिवराज सिंह चैहान कोरोना से पीड़ित हो गए। कोराना के दौर में प्रधानमंत्री मोदी ने राम जन्म भूमि पूजन और योगी आदित्यनाथ ने साढ़े पांच लाख दीप जैसे गिनीज बुक्स ऑफ रिकार्ड में नाम दर्ज कराने वाला कार्यक्रम किया। कोरोना काल में ही बिहार के चुनाव हुए और प्रधानमंत्री मोदी, जेपी नड्डा तथा मोदी मंत्रिमंडल के सदस्यों, राजनाथ सिंह तथा रविशंकर प्रसाद आदि ने जमकर रैलियां कीं। चुनाव स्थगित करने की विपक्ष की मांग चुनाव आयोग ने नहीं मानी, लेकिन सोशल डिस्टेंसिंग तथा सुरक्षा की पर्याप्त व्यवस्था होने के बावजूद संसद सत्र स्थगित करने के पीछे एक ही बात हो सकती है कि सरकार अर्थव्यस्था तथा दूसरे मुद्दों पर आंखें चुराना चाहती है।

अचरज की बात यह है कि विपक्षी पार्टियों ने इसे मुद्दा नहीं बनाया। यह लोकतंत्र की सेहत के लिए ठीक नहीं है। कोरोना जैसी महामारी का मुकाबला सरकार ने किस तरह किया है और इससे इतने लोग क्यों मर गए, बेरोजगार तथा बेघर क्यों हो गए और आगे सरकार क्या करेगी,  संसद के सामने समय पर यह सब आना चाहिए।

कोरोना काल में राष्ट्रवादी होने का दावा करने वाली सरकार ने कई फैसले लिए हैं जो घोटाले जैसे दिखाई देते हैं। सबसे बड़ा घोटाला तो कोरोना से निपटने के लिए घोषित हुआ 20 लाख करोड़ का पैकेज है। इसकी जांच होनी चाहिए कि वास्तव में सरकार ने कितना पैसा खर्च किया? इसमें से कितना पैसा गरीबों पर खर्च हुआ और कितना कॉरपोरेट को दे दिया गया? ऐसा ही घोटाला आर्थिक सुधारों को लेकर हुआ है।

किसानों के बारे में लाए गए बिल के खिलाफ तो लड़ाई चल रही है, लेकिन सरकारी कंपनियों को बेचने, रेलवे के निजीकरण जैसे जनता की संपत्ति को लुटाने के फैसलों के खिलाफ ज्यादा कुछ नहीं हो रहा है। इसकी भी जांच होनी चाहिए कि कोरोना काल में  राष्ट्रवादियों ने किन-किन विदेशी कंपनियों को फायदा पहुंचाया और मंदी में भी किन पूंजीपतियों ने मुनाफे कमाए। राष्ट्र की संपत्ति हथियाने वालों की सूची जारी होनी चाहिए। ये मांगें संसद में ही ठीक से हो सकती हैं। 

अभी भाजपा नेताओं ने कथित लव जिहाद और गुपकार गठबंधन (कश्मीर की राजनीतिक पाटियों का गठबंधन) के विरोध का अभियान चलाया हुआ है। भाजपा की राज्य सरकारों ने लव जिहाद के खिलाफ कानून बनाने की घोषणा की है। देश में दबाव या लालच में धर्मांतरण के खिलाफ पहले से कानून बने हैं। इसी तरह दबाव में की जाने वाली शादी को निरस्त करने तथा दोषियों को पर्याप्त सजा देने के प्रावधान हैं। जाहिर है कि नया कानून लाने के पीछे का उद्देश्य खुद पति चुनने के संवैधानिक अधिकार से औरतों को वंचित करना है।

गुपकार गठबंधन फारूख अब्दुल्ला के श्रीनगर के गुपकार रोड वाले आवास पर धारा 370 हटाने के एक दिन पहले यानि चार अगस्त, 2019 को हुई राजनीतिक दलों की बैठक में अस्तित्व में आया। अर्धसैनिक बलों की तैनाती देख कर यह बैठक हुई थी। यह गठबंधन धारा 370 हटाने तथा जम्मू-कश्मीर की स्वायत्तता बहाल करने की मांग कर रहा है। इसे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह गुपकार गैंग के नाम से पुकार रहे हैं। आरएसएस की पत्र-पत्रिकाओं ने यह नाम ढूंढा है।

‘लव-जिहाद’ और ‘गुपकार गैंग’ के मुद्दे राम जन्म भूमि, धारा 370 तथा तीन तलाक की जगह लेने वाले हैं। दोनों ही मुद्दे हिटलर के नाजीवादी तकनीक पर आधारित हैं। इनका लक्ष्य यहूदियों की तरह भारतीय मुसलमानों को निशाना बनाना है। कश्मीर में धारा 370 को बहाल करने की मांग देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन उसे राष्ट्र विरोधी बता कर संघ-परिवार इसका इस्तेमाल मुसलमानों को निशाना बनाने के लिए कर रहा है।

लव-जिहाद का मुद्दा भी मुसलमानों को बदनाम करने के लिए ही गढ़ा गया है। जर्मनी में भी यहूदियों पर भी जर्मन नस्ल को अशु़द्ध करने के लिए जर्मन औरतों को फंसाने तथा उनसे शादी करने का आरोप लगाया गया था और ऐसी शादियों पर कानूनी पाबंदी लगा दी गई थी।

हिटलर का असली इरादा तानाशाही स्थापित करना था। नस्लवाद का इस्तेमाल उसने पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए किया। वह मानवाधिकार तथा लोकतंत्र की बात करने वालों पर यहूदियों से मिले होने तथा गद्दार होने का आरोप लगाता था। उसने इस नाम पर अपने सभी राजनीतिक विरोधियों का सफाया किया।

ठीक यही तरीका भाजपा ने अपनाया है। वे राजनीतिक विरोधियों को गद्दार तथा पाकिस्तान से मिला साबित करने में लगी रहती है। देश को 1965 तथा 1971 के युद्धों में विजय दिलाने वाली कांग्रेस से यह सवाल करना कितना बचकाना है कि वह किधर है?

मोदी सरकार देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को नष्ट करने में लगी है। वह सीबीआई तथा ईडी का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों को ठिकाने लगाने में करती है। उधर, चुनाव आयोग से लेकर अदालतें अपनी विश्वसनीयता लगातार खोती जा रही हैं। 

सवाल उठता है कि लोकतंत्र को नष्ट करने की कोशिशों के खिलाफ विपक्ष की ओर से असरदार प्रतिरोध क्यों नहीं हो रहा है? कोरोना महामारी में लॉकडाउन करने से लेकर इसे खोलने तक के फैसले सरकार ने खुद ही ले लिए। फिर भी विपक्ष ने कोई प्रतिरोध नहीं किया। 

ऐसा नहीं है कि लोग प्रधानमंत्री मोदी का अंधा समर्थन कर रहे हैं। धनबल, प्रशासन के दुरुपयोग तथा जाति तथा मजहब के इस्तेमाल के बाद भी लोगों ने भाजपा को कई राज्यों में बहुमत नहीं दिया, लेकिन इसने पैसे के बल पर सरकारें गिराईं। अभी-अभी आया बिहार का चुनाव नतीजा भी बतलाता है कि काफी ताकत लगाने तथा मोदी के चेहरे पर वोट मांगने के बाद भी भाजपा दूसरे नंबर की पार्टी ही बन पाई।

लोगों के समर्थन के बाद भी सरकार टिकाने में कांग्रेस नाकाम रही और भाजपा के खिलाफ कोई असरदार संघर्ष खड़ा करने में भी। यही हाल बाकी विपक्षी पार्टियों का भी है। असलियत यही है कि लोकतंत्र के बुनियादी सवालों के लिए लड़ने से वे भाग रही हैं। कांग्रेस से जब अमित शाह ने पूछा कि गुपकार गैंग के वे साथ हैं या नहीं तो कांग्रेस ने गुपकार गैंग के खिलाफ ही बयान दे दिया। उसे साफ कहना चाहिए था कि राज्य में धारा 370 को बहाल करने की उनकी मांग का वह समर्थन करती है। भाजपा उसी महबूबा मुफ्ती पर हमले कर रही है, जिसके साथ उसने सरकार बनाई और जम्मू-कश्मीर की ऐसी स्थिति कर दी कि उसे केंद्र शासित प्रदेश बनाना पड़ा।

सुधा भारद्वाज समेत तमाम मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को राष्ट्र विरोधी बताने तथा विपक्ष को गद्दार बताने की हिम्मत भाजपा में इसलिए आ जाती कि विपक्ष तथा मीडिया की ओर से कमजोर प्रतिरोध है। मीडिया का क्या हाल है, यह इसी से समझा जा सकता है कि प्रधानमंत्री मोदी ने पद संभालने के बाद एक भी प्रेस कांफ्रेंस नहीं की है।

क्या लोकतंत्र को सुस्त विपक्ष और गोदी मीडिया के भरोसे छोड़ा जा सकता है? क्या भारत लोकतंत्र के लिए बड़ी लड़ाई का इंतजार कर रहा है?

(अनिल सिन्हा वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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