राहुल गांधी के बहाने मोदी तानाशाही के संकेत दे रहे हैं?

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इतिहास में कुछ ऐसे क्षण होते हैं जिनका अर्थ कुछ समय बाद समझ में आता है। लोकसभा में शुक्रवार को सांसदों का माइक बंद हो जाना ऐसे ही क्षणों में से एक है। कांग्रेस ने राहुल गांधी को बोलने देने की मांग जैसे ही शुरू की तो माइक बंद हो गए और अध्यक्ष मुस्कुरा कर इसे देखते रहे। यह संयोग नहीं संकेत है। 

भारत में लोकतंत्र खत्म करने की जो बात कांग्रेस नेता राहुल गांधी भारत के गांवों से लेकर सुदूर इंग्लैंड तक कर रहे रहे थे, मोदी सरकार ने उस पर अंतिम मुहर लगा दी है। इस संकेत को अगर देश नहीं समझ पा रहा है तो इसके पीछे गोदी मीडिया और सरकार का मजबूत प्रचार-तंत्र है।

उनकी भूमिका का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उसने इसे एक तकनीकी खराबी बता कर झट से ढंक दिया। क्या देश कोे संचालित करने वाली सर्वोच्च संस्था का एक महत्वपूर्ण क्षण पर मौन हो जाना गुस्सा का सबब नहीं होना चाहिए? यह भी उस समय होता है जब सरकार विपक्ष के एक प्रमुख नेता पर देशद्रोह का आरोप लगा रही है और वह अपना जवाब देना चाहता है।

यह किसी भी तरह से एक मामूली घटना नहीं है। दिलचस्प यह है कि घटना के पीछे तकनीकी खराबी होने की खबर भी सूत्रों के हवाले से आई है। प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया। इतनी बड़ी चूक के लिए किसी ने माफी नहीं मांगी। क्या इससे यह पता नहीं चलता कि सरकार को विपक्ष या संसद की कितनी परवाह है?

माइक के बंद होने के संकेत का अर्थ उद्घाटित करना आवश्यक है। अगर हम थोड़ी देर को यह मान भी लेें कि विदेशी धरती पर राहुल के बयान देश के खिलाफ थे तो क्या उनका पक्ष सुने बगैर उन्हें सजा दे दी जाए? लोगोें ने सत्ता प़क्ष की चालाकी को नहीं देखा कि मोदी सरकार के मंत्रियों ने राहुल के खिलाफ किसी कानूनी लड़ाई के बदले मीडिया और संसद में मोर्चा खोला है।

दोनों जगह फैसले उसके हाथ में हैं। मीडिया में मतदान की जरूरत नहीं है और फैसला पहले से उसके पक्ष में है। संसद में फैसला उसके पक्ष में ही होना है क्योंकि बहुमत उसके पास है। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि संसद की कार्यवाही की समीक्षा अदालत में नहीं हो सकती है और संसद को अपने अपमान के खिलाफ कार्रवाई का अधिकार है।

लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने इस मामले में शुरू से यही तरीका अपनाया है कि राहुल गांधी को संसद में उनका पक्ष रखने नहीं दिया जाए। भाजपा के सांसद और मंत्री संसद में हंगामा करते हैं और विपक्ष को अपनी बात रखने का मौका आने के पहले ही सदन की कार्यवाही स्थगित हो जाती है। सत्ता पक्ष यह सुनियोजित ढंग से कर रहा है। 

हमें यह समझना चाहिए कि यह एक तात्कालिक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा नहीं है। भाजपा का आचरण प्राकृतिक न्याय के उस बुनियादी सि़द्धांत के खिलाफ है जो आरोपी को अपना पक्ष रखने का अधिकार देता है। माइक बंद करने की कार्रवाई आरोपी को आरोप सिद्ध होनेे के पहले ही दोषी करार देने की कार्रवाई का हिस्सा है। 

जब सत्ता पक्ष प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत पर चलने से मना कर दे तो यह समझ लेना चाहिए कि तानाशाही की खुली घोषणा हो चुकी है। इसलिए देश मेें लोकतंत्र चाहने वालों को संसद का माइक बंद करने की कार्रवाई को तानाशाही की घोषणा के रूप में लेना चाहिए।

तानाशाही की इस खुली घोषणा के बाद मीडिया में चल रही इस बहस का कोई अर्थ नहीं रह जाता कि राहुल ने लंदन में क्या कहा। इस बहस में सिर्फ भाजपा ही नहीं, मुख्यधारा माने जाने वाली पूरी मीडिया झूठ का सहारा ले रही है। उन्होंने कही नहीं कहा कि भारत का लोकतंत्र बचाने के लिए बाहरी लोग हस्तक्षेप करें। उन्होंने यह भी नहीं कहा है कि भारत में लोकतंत्र खत्म हो चुका है।

उन्होंने सिर्फ इतना बताया कि भारत का लोकतंत्र दबाव में है और इसे मिटाने वाले काम हो रहे हैं। उन्होंने इंग्लैड में अपने श्रोताओं को लोकतंत्र पर विश्व भर में हो रहे हमलों का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि उन्हें सोचना चाहिए कि वे अपने मुल्क में इसके लिए क्या करना चाहिए। साथ ही, उन्होंने अपने श्रोताओं को भारत में हो रहे परिवर्तनों की जानकारी रखने के लिए कहा। 

राहुल की राय में यह इसलिए जरूरी है कि लोकतंत्र के साये में रहने वाली कुल आबादी का आधा हिस्सा भारत में निवास करता है। सच तो यह है कि राहुल ने लंदन में साफ-साफ कहा कि भारत में जो समस्याएं हैं वे आंतरिक हैं और इसका हल भी देश के भीतर से ही निकलेगा।

संसद में बोलने से रोके जाने के बाद उन्होंने विदेश मंत्रालय की संसदीय सलाहकार समिति में अपनी बात रखने की कोशिश की तो विदेश मंत्री जयशंकर समेत सता पक्ष के अन्य सदस्यों ने उन्हें अपनी बात रखने से रोका। लेकिन उन्होंने अपनी बात रख दी कि उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा।

राहुल को प्राकृतिक न्याय से वंचित करने के अलावा इस घटना का दूसरा अर्थ भी है। यह संसदीय परंपरा के ह्रास का उदाहरण है। यह पहली बार हो रहा है कि सत्ता पक्ष संसद की कार्यवाही को ठप कर रहा है। संसद में कार्य रोक कर किसी अन्य विषय पर चर्चा कराने का काम विपक्ष का होता है। 

लोकतंत्र के स्वास्थ्य का यह एक बहुत बड़ा पैमाना है कि सत्ता पक्ष बहस की विपक्ष की मांग को कितना स्वीकार करता है और सदन के सभापति ऐसे कितने निर्देश देते हैं। सत्ता पक्ष कोई आधिकारिक बयान ससंद में कभी भी दे सकता है। इसके बावजूद सत्ता पक्ष ससंद की कार्यवाही नहीं चलने दे रहा है।

इसका सीधा अर्थ यही है कि संसद में विपक्ष की उपस्थिति को सत्ता पक्ष खारिज कर रहा है। यह एक गंभीर बात है। इसे मोदी सरकार के आम रवैए के साथ जोड़ कर देखना चाहिए। प्रधानमंत्री विपक्ष से कभी बात नहीं करते हैं। संसद के साथ भी उनका रवैया वैसा ही है। उन्होंने नीतिगत संबंधी कोई घोषणा संसद में नहीं की है।

नोटबंदी हो या लॉकडाउन, वह सारी घोषणाएं संसद से बाहर करते रहे हैं। ये घोषणाएं वह प्रेस के सामने भी नहीं करते हैं और न ही ऐसी घोषणाओं में कैबिनेट के सदस्यों की कोई हिस्सेदारी होती है। मीडिया ने भले ही क्लीन चिट दे रखी हो उनसे यह सवाल तो होना ही चाहिए कि उन्होंने नौ साल के अपने कार्यकाल में कोई प्रेस कांफ्रेंस क्यों नहीं किया है। 

भले ही, जवाब नहीं देने की उनकी प्रवृति कोई सामान्य बात नहीं है। यह तानाशाहों की कार्यशैली है। राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव के समय भी उन्होंने केवल अडानी को लेकर उठाए गए राहुल के ही सवालों का जवाब नहीं दिया बल्कि प्रस्ताव पर बोलने वाले किसी सांसद की बात का कोई नोटिस नहीं लिया। संसद में विपक्ष के किसी सवाल का उन्होंने कभी जवाब नहीं दिया है।

संसद को नजरअंदाज करना उनकी उस राजनीतिक प्रवृत्ति का हिस्सा है जिसे हम तानाशाही के रूप में जानते हैं। उनका एक अकेला सब पर भारी वाला डॉयलाग भी संसद को खुली चुनौती है। लोकतंत्र में कोई भी संसद से भारी नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कांग्रेस-मुक्त भारत और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा क्षेत्रीय दलों की समाप्ति का नारा दे चुके हैं।

किसी भी लोकतंत्र में क्या ऐसी कामना कोई नेता कर सकता है वह भी प्रधानमंत्री के पद पर बैठ कर? लेकिन मोदी ऐसा प्रस्ताव बार बार रख चुके हैं। लोकतंत्र की समाप्ति के ऐसे साफ संकेतों को मीडिया या भारत का बौद्धिक वर्ग समझने से मना कर रहा है तो यही मानना चाहिए कि इसमें उसकी भागीदारी है।

(अनिल सिन्हा वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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