Wednesday, October 27, 2021

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संविधान के बुनियादी सिंद्धातों के खिलाफ है शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में धार्मिक ग्रंथों का शामिल किया जाना

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मध्यप्रदेश सरकार ने प्रदेश के महाविद्यालयों में धार्मिक ग्रंथों रामचरितमानस तथा महाभारत के कुछ अंशों को पढ़ाने का फैसला किया है। हमारे देश की  धर्म,संस्कृतिभाषा और वेशभूषा के क्षेत्र में कई विशेषताएं हैं जो दुनिया के किसी भी अन्य देश में नहीं हैं। यूरोप के अनेक देशों के नाम उन देशों में बोली जाने वाली भाषाओं पर रखे गए हैं। जैसे फ्रांस का नाम फ्रांस इसलिए है क्योंकि उस देश की मुख्य भाषा,शायद एकमात्र भाषा, फ्रेंच है। यही स्थिति इटली,जर्मनी,इंग्लैंड आदि देशों की है। इसी तरह दुनिया के बहुसंख्यक देश ऐसे हैं जहां मुख्य रूप से एक ही धर्म के मानने वाले रहते हैं या जहां के सभी रहने वालों का धर्म एक ही है। 

परंतु भारत में स्थिति इसके विपरीत है। वैसे,हमारे देश के अधिकांश नागरिक हिन्दू या सनातन धर्म मानते हैं पर इसके अतिरिक्त अन्य धर्मों को मानने वाले भी अच्छी-खासी संख्या में हैं। बात यहीं तक सीमित नहीं है। हमारे देश में प्रचलित अनेक धर्मों की शुरूआत हमारे देश में ही हुई है और ये सभी धर्म अपने आप में विशाल हैं। सनातन धर्म के अतिरिक्त हमारे देश में बौद्ध,जैन और सिख धर्म विकसित हुए। इसके अतिरिक्त अनेक अन्य पंथ भी यहीं उत्पन्न हुए। 

इन्हीं कारणों से हमारे संविधान निर्माताओं ने यह निर्णय किया कि हमारा देश धर्म से संचालित नहीं होगा और उसका चरित्र धर्मनिरपेक्ष होगा। धर्मनिरपेक्षता का यह अर्थ कतई नहीं है कि राज्य सत्ता धर्म विरोधी होगी। परंतु यह तय किया गया कि हमारे देश की सत्ता सरकारी कोष का उपयोग किसी विशेष धर्म का प्रचार-प्रसार करने में नहीं करेगी। सेक्युलर स्टेट को परिभाषित करते हुए डॉ अम्बेडकर ने कहा था “A secular state does not mean that we shall not take into consideration the religious sentiments of the people. All that a secular state means is that this Parliament shall not be competent to impose any particular religion upon the rest of the people. This is the only limitation that the Constitution recognises”.

शिक्षा के बारे में जो प्रावधान संविधान में किया गया है वह भी स्पष्ट है: 

“Article 28 prohibits religious instructions in any such educational institution which are wholly maintained out of state funds. No person attending any educational institution recognised or aided by the state can be compelled to take part in any religious instructions without the consent of such person or if minor without the consent of his guardian. 

(संविधान के अनुच्छेद 28 के अंतर्गत ऐसे शिक्षण संस्थानों में धार्मिक शिक्षा की पूरी तरह मुमानियत है जो पूर्णतः सरकारी कोष से संचालित होते हैं। इसी तरह जो व्यक्ति ऐसी संस्था में अध्ययनरत हैं जो सरकारी सहायता से संचालित हैं या सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त हैंउसे बिना उसकी स्वीकृति के और यदि वह अवयस्क है तो उसके अभिभावकों की स्वीकृति के बिना धार्मिक शिक्षा लेने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता)।

इस तरह मध्यप्रदेश सरकार का यह निर्णय जहां तक सरकार द्वारा संचालित शिक्षण संस्थाओं का संबंध हैपूरी तरह से असंवैधानिक है। सरकारी मान्यता प्राप्त और सरकारी सहायता प्राप्त संस्थाओं में भी इसे लागू करना कठिन है। इसके अतिरिक्त हमारे देश में जहां अनेक धर्मों के मानने वाले शिक्षण संस्थाओं में पढ़ते हैं उनमें सिर्फ एक धर्म की शिक्षा देना पूरी तरह से विभाजनकारी निर्णय होगा और देश की सेक्युलर नींव को कमजोर करेगा।

(एल एस हरदेनिया लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आजकल भोपाल में रहते हैं।)

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