Saturday, January 22, 2022

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नगालैंड फ़ायरिंग आत्मरक्षा नहीं, हत्या के समान है:जस्टिस मदन लोकुर

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नगालैंड फायरिंग मामले में सेना ने बयान जारी कर कहा है कि भीड़ में शामिल लोगों ने सैनिकों पर हमला किया। सैनिकों ने आत्मरक्षा में गोली चलाई जबकि उच्चतम न्यायालय के रिटायर्ड जज जस्टिस मदन लोकुर ने नगालैंड फ़ायरिंग को ‘हत्या के समान’ माना है और कहा है कि यह ‘आत्मरक्षा के लिए की गई कार्रवाई’ बिल्कुल नहीं है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि अफ़्सपा का मतलब यह कतई नहीं है कि सुरक्षा बल किसी की हत्या कर दे।

दरअसल शनिवार को नगालैंड के मोन ज़िले में केंद्रीय सुरक्षा बलों ने एक गाड़ी में लौट रहे लोगों पर गोलियाँ चला दीं। इसमें छह लोग मारे गए। इसके बाद हथियारों से लैस स्थानीय लोगों ने जवानों को घेर लिया तो सुरक्षा बलों ने फिर गोलीबारी कर दी। कुल मिला कर एक सैनिक समेत 16 लोग मारे गए। केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा है कि गलत पहचान से यह गोलीबारी हुई। मणिपुर में अफ़्सपा था और सेना व पुलिस ने कुछ नागरिकों की ग़ैरक़ानूनी हत्या कर दी थी, जो उच्चतम न्यायालय ने 2017 में इस मामले की सीबीआई जाँच का आदेश दिया था। जस्टिस लोकुर उस पीठ के सदस्य थे। 

जस्टिस मदन लोकुर ने कहा कि आर्म्ड फोर्सेज़ स्पेशल प्रोविज़न एक्ट (अफ़्सपा) का मतलब यह कतई नहीं है कि सुरक्षा बलों के जवान किसी की हत्या कर दें। उन्होंने यह भी कहा कि अफ़्सपा को ग़लत ढंग से लागू किया गया है, जिसके तहत सुरक्षा बलों को यह हक़ दे दिया गया है कि वे कहीं भी कार्रवाई कर सकते हैं और किसी को भी कभी भी बग़ैर वारंट के गिरफ़्तार कर सकते हैं। जस्टिस लोकुर ने पुलिस जाँच से भी असहमति जताई। उन्होंने कहा, “मशहूर लोगों द्वारा इस मामले की स्वतंत्र व निष्पक्ष जाँच की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि इसकी काफी गुंजाइश है कि सुरक्षा बल खुद जाँच करें तो इस मामले को किसी तरह रफ़ादफ़ा कर दें”।

नगालैंड पुलिस की प्राथमिक रिपोर्ट में कहा गया है कि गाँव के लोगों ने 21 वें पैरा सिक्योरिटी फ़ोर्स के कमान्डो को शवों को तिरपाल में लपेट कर ले जाते हुए देखा था और उसका विरोध किया था।

गृह मंत्री ने लोकसभा में इस पर सरकार का पक्ष रखते हुए कहा, “4 दिसंबर की शाम को 21 पैरा कमांडो का एक दस्ता संदिग्ध क्षेत्र में तैनात था। इस दौरान एक वाहन उस जगह पहुंचा, इस वाहन को रुकने का इशारा किया गया। लेकिन यह वाहन रुकने के बजाय तेज़ी से निकल गया। इस आशंका पर कि वाहन में संदिग्ध विद्रोही जा रहे थे, वाहन पर गोली चलाई गई जिससे वाहन में सवार 8 में से 6 लोगों की मौत हो गई, बाद में यह ग़लत पहचान का मामला पाया गया, जो 2 लोग घायल हुए थे, उन्हें सेना ने स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया।”

इस बीच राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने शनिवार को नगालैंड में आम नागरिकों पर हुई फायरिंग का स्वत: संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार को नोटिस दिया है और छह हफ़्ते के अंदर इस वारदात पर विस्तृत रिपोर्ट देने को कहा है। आयोग ने केंद्रीय रक्षा सचिव, केंद्रीय गृह सचिव, नगालैंड के मुख्य सचिव और डीजीपी को नोटिस भेजा है।

इस घटना के बाद विभिन्न छात्र संगठनों और राजनीतिक दलों ने सेना को विशेष अधिकार देने वाले आफ़स्पा को हटाने की मांग की है। मेघालय के मुख्यमंत्री कॉनराड के. संगमा ने कहा है आफ़स्पा निरस्त किया जाना चाहिए। पहले ही कई नागरिक संगठन और इलाके के राजनेता वर्षों से अधिनियम की आड़ में सुरक्षा बलों पर ज्यादती का आरोप लगाते हुए इस कानून को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। नागरिक समूह, मानवाधिकार कार्यकर्ता और पूर्वोत्तर क्षेत्र के नेता वर्षों से इस ‘कठोर’ कानून को वापस लेने की मांग कर रहे हैं और इस कानून की आड़ में सुरक्षा बलों पर ज्यादती करने का आरोप लगाते हैं।

आफस्पा अशांत क्षेत्र बताए गए इलाकों में सशस्त्र बलों को विशेष शक्तियां प्रदान करता है। आफस्पा ‘अशांत क्षेत्रों’ में तैनात सेना और केंद्रीय बलों को कानून के खिलाफ काम करने वाले किसी भी व्यक्ति को मारने, गिरफ्तारी और बिना वारंट के किसी भी परिसर की तलाशी लेने का अधिकार देता है। साथ ही केंद्र की मंजूरी के बिना अभियोजन और कानूनी मुकदमों से बलों को सुरक्षा प्रदान करने की शक्ति देता है। आफस्पा असम, नगालैंड, मणिपुर (इंफाल नगर परिषद क्षेत्र को छोड़कर), अरुणाचल प्रदेश के चांगलांग, लोंगडिंग और तिरप जिलों के साथ असम की सीमा से लगे अरुणाचल प्रदेश के जिलों के आठ पुलिस थाना क्षेत्रों में आने वाले इलाकों में लागू है।

नगालैंड में सेना की फायरिंग में कम से कम 13 बेकसूर ग्रामीणों की मौत ने इलाके में दशकों से जारी उग्रवाद-विरोधी अभियान को एक बार फिर कठघरे में खड़ा कर दिया है। असम राइफल्स पर खासकर नगालैंड और मणिपुर में आम लोगों पर अत्याचार और बेकसूरों की हत्या के आरोप पहले भी लगते रहे हैं। इस घटना के विरोध में तमाम जनजातीय संगठनों ने सोमवार को राज्य में छह घंटे बंद रखा है।

हाल के वर्षों की इस पहली घटना ने कई अनुत्तरित सवाल खड़े किए हैं। सवाल पूछा जा रहा है कि क्या सेना ने इतने बड़े ऑपरेशन से पहले उग्रवादियों के बारे में मिली सूचना की पुष्टि नहीं की थी या फिर बीते दिनों मणिपुर में एक कर्नल विप्लव त्रिपाठी के सपिरवार मारे जाने के बाद उसके खिलाफ उग्रवादियों के खिलाफ किसी बड़े ऑपरेशन को अंजाम देने का भारी दबाव था?

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी घटना पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अपने एक ट्वीट में इस घटना हृदय विदारक बताया है। उनका सवाल है कि गृह मंत्रालय आखिर क्या कर रहा है? देश में आम नागरिक और सुरक्षा बल ही सुरक्षित नहीं हैं। जनजातीय संगठन ईस्टर्न नगालैंड पीपुल्स ऑर्गनाइजेशन (ईएनपीओ) ने इस घटना के विरोध में क्षेत्र के छह जनजातीय समुदायों से राज्य के सबसे बड़े हॉर्नबिल महोत्सव से भागीदारी वापस लेने की अपील की है।

(जनचौक ब्यूरो की रिपोर्ट।)

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