झारखंड: पीने के पानी को तरसता कोल्हान, लोग नाले के किनारे बनी डांडी का पानी पीने को मजबूर

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कोल्हान। खनिज सम्पदाओं से भरे झारखंड में सबसे बड़ी कोई समस्या है तो वह पेयजल का संकट है। जो आज भी आदिम युग की याद दिलाता रहता है। एक तो यहां जल संचय का कोई मजबूत साधन नहीं है, जिसके कारण बरसात का पानी बंगाल की खाड़ी में समा जाता है। वहीं दूसरी तरफ विकास के नाम पर हो रहे बोरिंग से भूगर्भ जलस्तर लगातार नीचे सरकता जा रहा है।

वैसे तो पेयजल की समस्या कमोबेश हर मौसम में रहती है, लेकिन जैसे ही गर्मी की दस्तक शुरू होती है यह समस्या विकराल रूप धारण कर लेती है। शहर हो या गांव जलस्तर लगातार नीचे जाने से अब पानी की किल्लत शुरू गयी है। चापाकल हो या नलकूप, सभी हांफने लगे हैं।

केंद्र सरकार के भूगर्भीय जल निदेशालय की रिपोर्ट के अनुसार पिछले बीस साल में भूगर्भीय जलस्तर 2 से 6 मीटर तक नीचे जा चुका है। आने वाले दिनों में यह संकट और भी गहराएगा। झारखंड में आज भी 75 प्रतिशत आबादी पेयजल के लिए चापाकल, कुआं, नदी का चुंआ, खेतों में बने डांड़ी और तालाबों पर ही निर्भर है।

केन्द्र सरकार ने देश भर में नल से जल पहुंचाने की योजना शुरू की तो है, लेकिन आंकडों के अनुसार झारखंड में अभी तक 30 फीसदी घरों तक ही जल पहुंचाया जा सका है। जबकि जमीनी स्तर पर 10 फीसदी भी यह नहीं दिखता है। ग्रामीण क्षेत्र में तो यह पूरी तरह नदारद है।

भूगर्भीय जल निदेशालय की रिपोर्ट के अनुसार झारखंड में औसतन 1,100 से 1,442 मिमी तक बारिश होती है। 23,800 मिलियन क्यूबिक मीटर (एमसीएम) सतही जल और 500 एमसीएम भूगर्भीय जल बारिश से मिलता है। 80 प्रतिशत सतही जल और 74 प्रतिशत भूगर्भीय जल बहकर बेकार चला जाता है।

कई किलोमीटर चलकर पानी लाती महिलाएं

पर्यावरणविद डॉ. नीतीश प्रियदर्शी बताते हैं कि जलसंकट के प्रमुख कारणों में तालाबों का गायब होना, नदियों का अतिक्रमण, जल का अत्यधिक दोहन, बारिश का जल भूगर्भ तक नहीं पहुंचना है। इसके अलावा समय पर बारिश नहीं होने से भी जल संकट गहराया है।

झारखंड के कोल्हान प्रमंडल में पेयजल संकट की तस्वीर

गर्मी की धमक शुरू होते ही सरायकेला-खरसावां जिला अंतर्गत खरसावां प्रखंड की बिटापुर पंचायत स्थित बरजुडीह गांव के ऊपरटोला में पेयजल संकट गहराने लगा है। स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि पेयजल संकट को लेकर आक्रोशित महिलाओं ने डेकची और बाल्टी के साथ प्रदर्शन किया। ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने स्थानीय प्रशासन से पेयजल संकट दूर करने की मांग की है लेकिन प्रशासनिक उदासीनता का आलम यह है कि अभी तक प्रशासन के कान में जूं तक नहीं रेंगी है। जबकि गर्मी बढ़ने के साथ ही पेयजल संकट विकराल रूप लेता जा रहा है।

प्रखंड मुख्यालय से आठ किलोमीटर दूर बरजुडीह ऊपरटोला के लोग पीने के पानी के लिए काफी परेशानी झेल रहे हैं। गांव में चापाकल है लेकिन तीनों खराब पड़े हैं। वहीं सोलर संचालित जलमीनार ढह गया है। दो सरकारी और एक निजी कुआं भी सूख गये हैं। 60 परिवार वाले इस गांव में इसी वर्ष नल-जल योजना के तहत जलमीनार लगी, योजना स्थल के पास बोरिंग भी की गयी है, लेकिन ढंग से बोरिंग नहीं होने से पानी नहीं मिल रहा है। सप्ताह में दो-तीन दिन ही आधे घंटे के लिए पानी मिल पाता है। ग्रामीणों का आरोप है कि योजना केवल कमीशनखोरी के लिए लाई गई है।

ग्रामीणों ने बताया कि स्थिति यह है कि कोंदाडीह स्थित नाले के किनारे खेत में बनी पुरानी डांडी से ही गांव की प्यास बुझती है। इसके लिए ग्रामीणों को डेढ़ किमी दूर कोंदाडीह गांव जाना पड़ता है। ग्रामीणों ने गांव में नल-जल योजना को बेहतर ढंग से संचालित करके घरेलू जलापूर्ति करने की मांग की है।

खेत में बनी पुरानी डांडी से पानी लेते ग्रामीण

कोल्हान प्रमंडल के ही पूर्वी सिंहभूम जिला अंतर्गत डुमरिया के पलाशबनी पंचायात के बाकड़ाकोचा गांव में डुंगरी टोला के लोग इन दिनों भीषण पानी के संकट से जूझ रहे हैं। इस गांव में मुख्यमंत्री नल-जल योजना के तहत जलमीनर बनाई गयी थी, ताकी गांव के लोगों को जरूरत के हिसाब से पानी घर-घर तक पहुंचाया जा सके। लेकिन पिछले दो महीने से सोलर लाइट से चलने वाला जलमीनार का मोटर खराब पड़ा है। ऐसे में इस भीषण गर्मी में ग्रामीण दो किलोमीटर दूर बोंगा डुंगरी जुड़िया नाला से पीने का पानी लाने के लिए मजबूर हैं।

वहीं पेयजल समस्या को लेकर ग्राम प्रधान खेला सोरेन ने बताया कि जलमीनार का मोटर दो महीने से खराब पड़ा है। इसकी सूचना जनप्रतिनिधियों और पेयजल स्वच्छता विभाग के अधिकारियों को भी दी गई है। लेकिन अभी तक इस जलमीनार के मोटर को बनाने का प्रयास नहीं किया गया है। वहीं विभाग के अधिकारी सिर्फ आश्वासन पर ही काम चला रहे हैं। उन्होंने कहा कि पानी लाने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ रही है। प्रधान खेला सोरेन ने आगे बताया कि गांव से दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित बोंगा डुंगरी जुड़िया नाला में गड्ढा खोदकर डांड़ी से पानी लाने को हम ग्रामीण मजबूर हैं।

बड़ाडहर गांव के ग्रामीण भी सालभर पानी की परेशानी में घिरे रहते हैं। लगभग 200 की आबादी वाले इस गांव में कुल 20 परिवार रहते हैं। गांव में पानी की समस्या काफी गंभीर है। वैसे एक सरकारी चापाकल से लगा जलमीनार तो है, जो मुखिया के फंड से 4 साल पहले सोलर संचालित बनाया गया था। लेकिन अब चापाकल में लगा मोटर मिट्टी के अंदर धंस गया है जिसके कारण पीने के पानी के लिए हाहाकार मचा हुआ है।

प्रमंडल का पश्चिमी सिंहभूम जिला अंतर्गत जंतालबेड़ा गांव में जहां तमाम बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है। वहीं पेयजल की विकराल समस्या से ग्रामीण काफी परेशान हैं। यहां सबसे घटिया व्यवस्था शिक्षा, पेयजल और सड़क की है।

पानी लेकर घर जाती महिला

गांव में स्वास्थ्य के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। राशन लाने के लिए तीन सौ परिवार को पांच किमी दूर जाना पड़ता है। गांव में मात्र दो चापाकल सही सलामत हैं। मतलब मात्र दो चापाकल तीन सौ ग्रामीणों की प्यास बुझा रहे हैं। पेयजल संकट की यह तस्वीर अपने आप में कितनी तकलीफदेह है, खुद ही समझा जा सकता है।

पेयजल और स्वच्छता विभाग की ओर से वर्ष 2015-16 में जलमीनार का निर्माण कराया गया था। अब वह पिछले दो साल से खराब पड़ा है। लेकिन उसकी मरम्मत नहीं करवाई गई। गांव में चार चापाकल हैं, जिसमें दो चापाकल पूरी तरह खराब पड़े हैं। पानी को लेकर ग्रामीणों को सुबह चार बजे से रात के आठ बजे तक जद्दोजहद करनी पड़ती है। दो चापाकल में यदि एक भी खराब हो गया तो ग्रामीणों के सामने पीने के पानी के लिए हाहाकार मच जाता है। दिन भर ग्रामीणों को कतार में लगकर पानी लेना पड़ता है।

(वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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