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पीएम के विदेश घूमने पर 66 अरब खर्च, जेएनयू के गरीब-दलित छात्रों के लिए पैसे नहीं

क्या आप जानते हैं कि जेएनयू को राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद (NACC) ने जुलाई 2012 में किए सर्वे में भारत का सबसे अच्छा विश्वविद्यालय माना है।

क्या आप जानते हैं कि इस विश्वविद्यालय ने भारत को विश्व स्तर के सैंकड़ों नेता, अर्थशास्त्री और बुद्धिजीवी दिए हैं जिनमें नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अभिजीत बैनर्जी, प्रख्यात पत्रकार और राजनेता योगेंद्र यादव, पत्रकार आशुतोष, वर्तमान वित्तमंत्री निर्मला सीतारमन, उदित राज, कांग्रेस के नेता शकील अहमद खान, वर्तमान केंद्रीय मंत्री सुब्रमण्यम जयशंकर, प्रख्यात वामपंथी नेता प्रकाश करात और सीताराम येचुरी, प्रसिद्ध फ़िल्म अभिनेत्री स्वरा भास्कर, हरियाणा कांग्रेस के नेता अशोक तंवर, एबीवीपी नेता संदीप महापात्रा इत्यादि।

इन सभी ख्याति प्राप्त हस्तियों ने कभी भी इस संस्थान में कथित देश विरोधी गतिविधियों की कभी भी कोई जानकारी किसी को नहीं दी।

कुछ नक़ली और स्वयंभू देश भक्तों और फ़र्ज़ी राष्ट्रवादियों द्वारा अपने क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए इस विश्व प्रसिद्ध विश्विद्यालय को देश विरोधी गतिविधियों के लिए बिना सुबूतों के बदनाम किया जा रहा है। देश और देश के उच्चतम शिक्षण संस्थान को बदनाम करने वाले और अपने राजनीतिक विरोधियों का बिना ठोस सबूतों के अपने राजनीतिक विरोधियों का चरित्र हनन करने वाले यही लोग देशद्रोही कहे जा सकते हैं।

असल में यह शिक्षण संस्थान हमेशा ही बुद्धिजीवियों का गढ़ रहा है और इसीलिए यह संस्थान हमेशा से ही सत्ता की निरंकुशता के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता रहा है, इसीलिए यह संस्थान हमेशा से ही सत्ता की आंख की किरकिरी बना रहा है।

आपातकाल के दौरान जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने वहां का दौरा किया था तब भी सीताराम येचुरी ने उनके सामने ही उनके ख़िलाफ़ विरोधपत्र पढ़ा था, लेकिन फिर भी उन्होंने किसी को पाकिस्तान भेजने और किसी के ख़िलाफ़ देश द्रोही जैसे शब्दों का प्रयोग नहीं किया, लेकिन आज घोर साम्प्रदायिक, जातिवादी और वर्ण व्यवस्था की पोषक फासिस्ट ताकतें सत्ता पा काबिज़ हैं और वे अपने हिंदुत्व के राजनीतिक एजेंडे को लागू करना चाहती हैं।

यह संस्थान उनकी इस प्रक्रिया में बाधा बना हुआ है, इसीलिए आज सत्ता साम, दाम, दंड, भेद की नीति अपनाते हुए अपने इन राजनीतिक विरोधियों का चरित्र हनन करके उनको नेस्तनाबूद करना चाहती है और इस शिक्षण संस्थान पर कब्ज़ा करना चाहती है, लेकिन वहां की लोकतांत्रिक प्रक्रिया के चलते वह सफल नहीं हो पा रही है।

नेहरू जी जैसे व्यक्ति का भी ये बीमार मानसिकता के लोग पिछले पांच वर्षों से चरित्रहनन कर रहे हैं और इतना ही नहीं गांधी जी के हत्यारे गोडसे को इन्होंने अपना आदर्श घोषित किया हुआ है और यही देश भक्ति और राष्ट्रवाद का नक़ाब ओढ़े हुए धर्म के ठेकेदार सावरकर जैसे अंग्रेज़ों के पिट्ठू को भारतरत्न देने की मांग कर रहे हैं।

और तो और साधु के भेष में मौजूद मुनाफाखोर पूंजीपति और राजनीतिज्ञ, पेरियार और अंबेडकर जैसे प्रखर नेताओं के ख़िलाफ़ ज़हर उगल कर उनका चरित्र हनन करने में लगे हैं। क्या यही इनकी सभ्यता और संस्कृति है, जिसकी महानता का वे रात-दिन गुणगान करते हैं?

याद रहे, जेएनयू में अधिकांश देश के ग़रीब घरों के बच्चे ही पढ़ते हैं और उनको अगर सरकार की ओर से आर्थिक सहायता मिलती रही है तो इसमें क्या बुराई हो सकती है? यह तो सरकार का कर्त्तव्य भी है। ये बच्चे क्या कोई विदेशी या ग़ैर- भारतीय हैं? ये वही प्रतिभाशाली बच्चे हैं जो धन के अभाव में पलते हुए भी कड़ी स्पर्धा से गुज़रकर इस संस्थान में प्रवेश पाते हैं।

और हां एक बात और, बात-बात में हिंदुत्व का राग अलापने वाले ये राम भक्त और राम राज्य के समर्थक और हिंदुत्व के बहाने सत्ता पर काबिज़ समय-समय पर हिन्दू-मुस्लिम और मंदिर-मस्जिद और संस्कृत-हिंदी-उर्दू भाषा संबंधी विवाद खड़ा करने वाले ये स्वयं भू देश भक्त और विश्व गुरु क्या यह नहीं जानते कि जेएनयू में पढ़ने वाले 98 प्रतिशत शिक्षार्थी बेहद ग़रीब हिन्दू परिवारों या ग़ैर-मुस्लिम परिवारों से ही आते हैं ? कहां गया इनका हिंदुत्व?

पिछले पांच वर्षों में विदेशी इन्वेस्टर्स को बुलाने के बहाने प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर लगभग 66 अरब रुपये की भारी भरकम धनराशि खर्च होने का अनुमान है, लेकिन आज तक एक भी इन्वेस्टर भारत नहीं आया। इन्हीं की ग़लत आर्थिक नीतियों के कारण आज देश भयंकर आर्थिक मंदी के दौर से गुज़र रहा है।

पेट्रोल के दाम आसमान छू रहे हैं, उद्योग-धंधे लगातार चौपट हो रहे हैं, बेरोज़गारी और महंगाई अपने चरम पर है और रुपये औंधे-मुंह पड़ा हुआ है। सरकारी संस्थान एक के बाद एक घाटे में चल रहे हैं। अनेकों बंद भी हो चुके हैं या बंद होने के कगार पर हैं। पूंजीपति बैंकों से लोन लेकर विदेश भाग रहे हैं और ‘चौकीदारों’ का कहीं कोई अतापता नहीं है। इसी कारण देश के अधिकांश बैंक घाटे में चल रहे हैं।

दूसरी ओर, श्रमिक वर्ग को चूसकर सरकार द्वारा समर्थित उद्योगपति या पूंजीपति लगातार मालामाल होते जा रहे हैं तो श्रमिक वर्ग कंगाली की हालत में जीने को मजबूर है। ऐसे में कुंभ मेले पर 4500 करोड़ रुपये का सरकारी अपव्यय, तीन हज़ार करोड़ की पटेल की मूर्ति, अयोध्या में करोड़ों खर्च करके घी के दीये जलाना और अब 2500 करोड़ की राम की मूर्तियों जैसी गैर ज़रूरी बातों पर सरकार धड़ल्ले से अरबों रुपये पानी की तरह बहा सकती है, लेकिन शिक्षा पर खर्च करना उन्हें बेहद ग़ैर-ज़रूरी लगता है।

यह कैसी और कौन सी मानसिकता है और कौन सा अर्थशास्त्र है और कौन सी भारतीयता, कौन सा राष्ट्रवाद और कौन सी देश भक्ति है? क्या वंदेमातरम् और भारत माता की जय बोलने से ही कोई देश भक्त और राष्ट्रवादी हो जाता है? क्या जेएनयू में पढ़ने वाला हर विद्यार्थी देश द्रोही है? इन सवालों पर गंभीरता से सोचने और समझने की दरकार है न कि किसी के झूठे प्रचार में फंसने की। किसी भी फ़र्ज़ी राष्ट्रवाद, फ़र्ज़ी देश भक्ति और देश विरोधी प्रचार का हिस्सा न बनें।

अशोक कुमार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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This post was last modified on November 23, 2019 2:31 pm

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