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चलना था महाभियोग, बाइज्जत रिटायर हो गए माननीय

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस एसएन शुक्ला बिना महाभियोग की करवाई के अपना कार्यकाल पूरा करके 17 जुलाई को खामोशी से रिटायर हो गये। जस्टिस शुक्ला के खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला सीबीआई ने दर्ज़ कर रखा है और 2018 से उनसे न्यायिक कार्य छीन लिया गया था। सीबीआई द्वारा इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस एसएन शुक्ला को अनुकूल निर्णय देने के लिए प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट द्वारा संचालित ग्लोबल मेडिकल कॉलेज से रिश्वत लेने के लिए बुक किया गया था। कालेज 2017 में कई कानूनी लड़ाइयों के केंद्र में था, क्योंकि केंद्र सरकार ने शैक्षणिक मानकों के बिगड़ने और आवश्यक गुणवत्ता वाले मापदंडों का पालन न करने के कारण इसकी मान्यता रद्द कर दी थी।

उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई ने सीबीआई को इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस एसएन शुक्ला के खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधी कानून (प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट) के तहत केस दर्ज करने की अनुमति दे दी है। इतिहास में यह पहली बार है जब सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को हाई कोर्ट जज के खिलाफ केस दर्ज करने की अनुमति दी है।

जस्टिस श्री नारायण शुक्ला उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद के ही रहने वाले हैं। उन्होंने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से एलएलबी करने के बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट में वकालत शुरू की। यूपी सरकार में वह अपर महाधिवक्ता भी रहे हैं। 2005 में एसएन शुक्ला को एडिशनल जज बनाया गया और दो साल बाद उन्हें 2007 में स्थाई जज बनाया गया। वह अगले साल रिटायर होने वाले हैं, लेकिन उससे पहले ही उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की गई है।

मामला लखनऊ में कानपुर रोड पर स्थित प्रसाद इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज से जुड़ा है। यह मेडिकल कॉलेज एक समाजवादी पार्टी के नेता बीपी यादव और पलाश यादव का है। 2017 में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) ने मेडिकल संस्थान का निरीक्षण किया। इस दौरान यहां बुनियादी सुविधाएं कम पाई गईं। यहां पर मेडिकल की पढ़ाई के मानक पूरे नहीं हो रहे थे। इसके बाद आदेश के तहत प्रसाद इंस्टीट्यूट समेत देश के 46 मेडिकल कॉलेजों में मानक पूरे न करने पर नए प्रवेशों पर रोक लगा दी गई थी।

आरोपी जज को पद से हटाने के लिए उच्चतम न्यायालय के दो-दो चीफ जस्टिस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखा था पर जस्टिस शुक्ला के खिलाफ भ्रष्टाचार पर जीरो टालरेंस रखने का दावा करने वाली सरकार ने कुछ भी नहीं किया। चीफ जस्टिस दीपक मिश्र के बाद दूसरे चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को रिमाइंडर भेजा था कि जज एसएन शुक्ला हटाए जाएं। उनके खिलाफ संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाया जाए। सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट के किसी जज को हटाने के लिए संसद में प्रस्ताव लाना पड़ता है।

इस मेडिकल कॉलेज को प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट चलाता है। साल 2017 में केंद्र सरकार ने एक आदेश जारी किया। इसके जरिए प्रसाद इंस्टीट्यूट समेत देश भर के 46 मेडिकल कॉलेजों में नए एडमिशन पर रोक लगा दी गई। मेडिकल कॉ़लेजों से कहा गया कि वे साल 2017-18 और 2018-19 के लिए नए एडमिशन नहीं ले सकते। इन कॉलेजों में मेडिकल की पढ़ाई के लिए बुनियादी सुविधाएं न होने के आरोप थे। कॉलेजों में ये प्रतिबंध मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया यानी एमसीअई की जांच रिपोर्ट के आधार पर लगाए गए।

सरकार के फैसले के खिलाफ प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट समेत कई मेडिकल कॉलेज संचालक उच्चतम न्यायालय चले गए। मामला चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की पीठ ने सुना। पीठ की ओर से दूसरे कॉलेजों को कुछ खास राहत नहीं मिली। राहत मिली लखनऊ वाले प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट को। 24 अगस्त, 2017 को उच्चतम न्यायालय  की ओर से प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट को दो राहत मिली । पहली, ट्रस्ट सुप्रीम कोर्ट से अपनी रिट वापस ले सकता है। दूसरी, ट्रस्ट कुछ प्रावधानों के साथ इलाहाबाद हाईकोर्ट जा सकता है। जबकि उसकी एक रिट पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट में खारिज हो चुकी थी।

अगले ही दिन यानी 25 अगस्त, 2017 को प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंच गया। यहां मामला सुना जस्टिस एसएन शुक्ला की पीठ ने। पीठ ने प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट को ‘एडमिशन के लिए काउंसलिंग’ शुरू करने की इजाजत दे दी। जस्टिस शुक्ला का यही फैसला उनके लिए मुसीबत का सबब बन गया। इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ एमसीआई ने एक बार फिर उच्चतम न्यायालय का रुख किया। उच्चतम न्यायालय ने 18 सितंबर, 2017 को एडमिशन प्रक्रिया पर फिर से रोक लगा दी। इस आदेश की खास बात ये थी कि इसे 21 सितंबर, 2017 को उच्चतम न्यायालय की वेबसाइट पर अपलोड किया गया। इस आदेश से ठीक दो दिन पहले यानी 19 सितंबर के दिन सीबीआई ने इस पूरे मामले में भ्रष्टाचार का भंडाफोड़ किया था और रिश्वत खोरी होने के इल्जाम लगाए थे।

सीबीआई ने मामले में उड़ीसा हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज आईएम कुद्दूसी, प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट के मालिक बीपी यादव, पलाश यादव, एक बिचौलिए विश्वनाथ अग्रवाल, भावना पांडेय, मेरठ के एक मेडिकल कॉलेज के सुधीर गिरी समेत 7 लोगों पर केस दर्ज किया। सीबीआई ने कुद्दूसी और दूसरे लोगों को गिरफ्तार कर लिया।सीबीआई को आरोपियों के पास से दो करोड़ रुपए की नकदी, बातचीत की ऑडियो रिकॉर्डिंग और कुछ अहम दस्तावेज भी मिले। आरोप थे कि उड़ीसा हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज आईएम कुद्दूसी समेत अन्य आरोपियों ने कोर्ट के जरिए प्रसाद इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में एडमिशन का रास्ता साफ कराने का काम अपने हाथ में लिया। फिर अदालत को काम कराने के लिए मैनेज करने का प्रयास किया गया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के दो जज जस्टिस एसएन शुक्ला और जस्टिस वीरेंद्र कुमार जांच के दायरे में आ गए। जस्टिस एसएन शुक्ला का नाम सीबीआई की एफआईआर में नहीं था। मगर सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच के लिए तीन जजों की एक कमेटी बना दी। इस कमेटी में मद्रास हाईकोर्ट की चीफ जस्टिस इंदिरा बनर्जी, सिक्किम हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एसके अग्निहोत्री और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस पीके जायसवाल शामिल थे। तीन जजों की इन हाउस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि जस्टिस एसएन शुक्ला के खिलाफ भ्रष्टाचार के पर्याप्त सबूत हैं। उन्हें फौरन पद से हटाया जाए। जनवरी, 2018 में ये पूरी रिपोर्ट उच्चतम न्यायालय के तब के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा को सौंपी गयी। कमेटी ने जस्टिस शुक्ला को अपने अधिकारों का दुरुपयोग करने का दोषी माना और उन्हें पद से हटाने की सिफारिश की थी ।

इस मामले को लेकर उच्चतम न्यायालय में जजों के बीच भी अप्रिय विवाद सामने आ चुका है। दरअसल मेडिकल प्रवेश घोटाले के नाम से जाने जाने वाले इस पूरे मामले की एसआईटी जांच की मांग करने वाली एक याचिका उच्चतम न्यायालय में आई, जिसकी सुनवाई 9 नवंबर, 2017 को जस्टिस एस अब्दुल नजीर और जस्टिस जे चेलामेश्वर की पीठ ने की। पीठ ने इसे गंभीर माना और इसे पांच वरिष्ठतम जजों की पीठ में रेफर कर दिया। इस पीठ में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा को भी रखा गया और सुनवाई के लिए 13 नवंबर 2017 की तारीख तय की गई। इसी तरह के एक और मामले का जिक्र कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म (सीजेएआर) नाम की संस्था ने भी 8 नवंबर 2017 को जस्टिस चेलामेश्वर की अगुवाई वाली पीठ के सामने रखा था। उस मामले में पीठ ने 10 नवंबर को सुनवाई की तारीख तय की थी।

लेकिन 10 नवंबर को उच्चतम न्यायालय  में हुए एक हाई वोल्टेज ड्रामे के बाद मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने जस्टिस चेलामेश्वर की अध्यक्षता वाली पीठ द्वारा 9 नवंबर को दिए गए उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें अदालत को रिश्वत देने के आरोपों में एसआईटी जांच की मांग वाली दो याचिकाओं को संविधान पीठ को रेफर किया गया था। इस पूरी बहस के दौरान वकील प्रशांत भूषण और चीफ जस्टिस के बीच तीखी नोक झोंक हुई थी। इसके बाद चीफ जस्टिस ने रोस्टर पूरी तरह अपने हाथ में ले लिया था जो अभी तक वैसे ही चल रहा है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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