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सक्रिय वकील हैं विकास दुबे एनकाउंटर मामले में गठित न्यायिक आयोग के अध्यक्ष

उच्चतम न्यायालय में विकास दुबे एनकाउंटर को लेकर जहां उत्तर प्रदेश सरकार वास्तविक एनकाउंटर बता रही है वहीं याचिकाकर्ता इसे फर्जी बताते हुए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित एक सदस्यीय आयोग के जस्टिस शशिकांत अग्रवाल को हाईकोर्ट का रिटायर्ड जज कहने पर भी एतराज़ व्यक्त कर रहे हैं और उन्होंने बाहलफ़ कहा है कि जस्टिस शशिकांत अग्रवाल अपने पद से सेवानिवृत्त नहीं हुए थे।

कोढ़ में खाज यह तथ्य है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के कई वकीलों का कहना है कि जस्टिस शशिकांत अग्रवाल ने पद से हटने के बाद उत्तराखंड हाईकोर्ट में वकालत शुरू की है और उत्तराखंड हाईकोर्ट की वेबसाइट पर डेजिनेटेड वरिष्ठ वकीलों की सूची में इनका नाम 14वें नम्बर पर दर्ज है। यह भी कहा जा रहा है कि अब शशिकांत अग्रवाल उच्चतम न्यायालय में भी वकालत कर रहे हैं। यक्ष प्रश्न यह है कि सक्रिय रूप से वकालत करने वाले किसी पूर्व जज को क्या किसी न्यायिक आयोग का सदस्य बनाया जा सकता है।

विकास दुबे मामले के याचिकाकर्ता अनूप प्रकाश अवस्थी ने उच्चतम न्यायालय  में सोमवार को होने वाली सुनवाई से पहले हलफनामा दाखिल किया है जिसमें  यूपी सरकार की तरफ से नियुक्त न्यायिक आयोग को अवैध बताया गया है। यह भी बताया गया है कि मामले की जांच के लिए गठित एसआईटी के सदस्य रविंद्र गौर खुद ही पहले फर्जी मुठभेड़ कर चुके हैं। याचिकाकर्ता ने यूपी सरकार की तरफ से करवाई जा रही जांच को दिखावा बताया है।

गौरतलब है कि 14 जुलाई को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने हैदराबाद एनकाउंटर की तरह इस मामले की जांच के लिए भी आयोग बनाने की मंशा जताई थी। इस पर यूपी सरकार ने हलफनामा दाखिल कर पुलिस की भूमिका को असंदिग्ध बताया था। यूपी सरकार ने यह भी कहा था कि उसने रिटायर्ड हाई कोर्ट जज जस्टिस शशिकांत अग्रवाल के नेतृत्व में मामले की जांच के लिए न्यायिक आयोग का गठन किया है। साथ ही आला अधिकारियों के एक विशेष जांच दल (एसआईटी) का भी गठन किया है।

याचिकाकर्ता ने जवाबी हलफनामे में कहा है कि आयोग का गठन पूरी तरह से अवैध है एसआईटी कमीशन ऑफ इंक्वायरी एक्ट की धारा तीन के तहत किसी न्यायिक आयोग के गठन से पहले विधानसभा और विधान परिषद की मंजूरी जरूरी होती है। अगर सदन का सत्र न चल रहा हो तो सरकार को आयोग के गठन के लिए अध्यादेश लाना पड़ता है। लेकिन ऐसा कुछ भी किए बिना न्यायिक आयोग के गठन की घोषणा कर दी गई।

हलफनामे में कहा गया है कि जस्टिस शशिकांत अग्रवाल अपने पद से सेवानिवृत्त नहीं हुए थे। उन्होंने 2005 में विवादास्पद परिस्थितियों में इस्तीफा दिया था। एक विवाद के बाद उनका झारखंड हाई कोर्ट ट्रांसफर किया गया था। लेकिन उन्होंने वहां जाने की बजाय इस्तीफा दे दिया। इस तरह कार्यकाल के बाकी रहते पद छोड़ने वाले व्यक्ति को रिटायर्ड जज कह कर न्यायिक आयोग का नेतृत्व सौंप देना गलत है। 77 साल के जस्टिस अग्रवाल 8 पुलिसकर्मियों और 6 अपराधियों को हत्या वाले इस जटिल मामले की जांच के लिए शारीरिक और मानसिक तौर पर फिट हैं। इस पर भी सवाल है।

इस बीच, यह भी सामने आया है कि शशिकांत अग्रवाल का नाम उत्तराखंड हाईकोर्ट की वेबसाइट पर डेजिनेटेड वरिष्ठ वकीलों की सूची में 14वें नम्बर पर दर्ज़ है और ये वकालत कर रहे हैं।

HIGHCOURTOFUTTARAKHAND,NAINITALLISTOFDESIGNATEDSENIORADVOCATES,DESIGNATEDBYHIGHCOURTOFUTIARAKHANDINTERMSOFSECTION16(2)OFTHEADVOCATESACT,1961(ASON12.12.2018)S.NoNameofAdvocateNotification/letterNo.Date

1.SriM.S.NegiLetter.NO.2s30/XII-9/Admin.A/UHC/200328.06.2003

2.SriJagdishChandraGuptaletterNO.2614/XII-11/Admin.A/UHC/200303.07.2003

3.SriGouravK.BanerjiletterNo.4290/XII-15/Admin.A/UHC/200319.12.2003

4.SriB.C.PandeNotificationNO.I02/UHC/Admin.A/200401.07.2004

5.SriM.C.KandpalNotificationNO.102/UHC/Admin.A/200401.07.2004

6.SriN.B.TiwariNotificationNo.102/UHC/Admin.A/200401.07.2004

7.Sris.G.HasnainNotificationNo.102/UHC/Admin.A/200401.07.2004

8.Sris.N.BabulkarNotificationNO.I02/UHC/Admin.A/200401.07.2004

9.SriS.P.S.PanwarNotificationNO.I02/UHC/Admin.A/200401.07.2004

10.sm!.TehminaPunwaniNotificationNO.I02/UHC/Admin.A/200401.07.2004

11.SriUmaKantUniyalNotificationNO.I02/UHC/Admin.A/200401.07.2004

12.SriV.K.KohliNotificationNO.I02/UHC/Admin.A/200401.07.2004

13.SriMahendraSinghPalNotificationNO.87/UHC/Admin.A/200528.07.2005

14.SrishashiKant’Agarwal NotificationNO.87/UHC/Admin.A/2005 28.07.2005

15.SrisanjeevPur;NotificationNO.96/UHC/Admin.A/200815.05.2008

16.SriPinakiMisraNotificationNO.96/UHC/Admin.A/200815.05.2008

17.Ms.PinkiAnandNotificationNo.221/UHC/Admin.A/200806.11.2008

18.SriRajendraDobhalNotificationNO.83/UHC/Admin.A/200920/21.05.2009

19.Mrs.GeetaluthraNotificationNo.83/UHC/Admin.A/200920/21.05.2009

20.SriMohanChandraPandeNotificationNO.184/UHC/Admin.A/201130.08.2011

21.smt.PushpaJoshiNotificationNO.185/UHC/Admin.A/201130.08.2011

22.SriBrahaspatiPrasadNautiyalNotificationNO.186/UHC/Admin.A/201130.08.2011

23.SriVijayBahadurSinghNegiNotificationNO.187/UHC/Admin.A/201130.08.2011

24.SriBalaDuttUpadhyayNotificationNo.188/UHC/Admin.A/201130.08.2011

25.SriAta-ur-RabsiddiquieNotificationNO.189/UHC/Admin.A/201130.08.2011

26.SriAvtarSinghRawatNotificationNO.190/UHC/Admin.A/201130.08.2011

27.SriChakraDharBahugunaNotificationNO.276/UHC/Admin.A/201121.12.2011

28.SriSunilKumarJainNotificationNO.12/UHC/Admin.A/201202.03.2012

29.SriTanveerAlamKhanNotificationNO.13/UHC/Admin.A/201202.03.2012

30.SriDevendraKumarSharmaNotificationNO.230/UHC/Admin.A/201211.10.2012

31.SriRajendraPrasadNautiyalNotificationNo.55/UHC/Admin.A/201320/21.03.2013

32.SriRavindraKumarRaizadaNotificationNo.56/UHC/Admin.A/201320/21.03.2013

33.SriJagdishPrasadJoshiNotificationNo.57/UHC/Admin.A/201320/21.03.2013

34.SriArvindVashisthNotificationNO.234/UHC/Admin.A/201401.09.2014

याचिकाकर्ता ने यह भी कहा है कि इस तरह के आयोग का कोई महत्व नहीं है। राज्य सरकार के लिए उसकी सिफारिशों को मानना बाध्यकारी नहीं है। इस मामले की तह तक पहुंचने के लिए ज़्यादा ठोस कदम उठाने की ज़रूरत है।हलफनामे में यूपी सरकार की तरफ से बनाए गए SIT पर सवाल उठाए गए हैं।

हलफनामे में बताया गया है कि एसआईटी के सदस्य डीआईजी रविंद्र गौर खुद ही पहले फर्जी एनकाउंटर में शामिल रह चुके हैं। 30 जून, 2007 को बरेली में दवाइयों के एक डीलर मुकुल गुप्ता को मुठभेड़ में मार गिराया गया था। इस मामले की सीबीआई जांच की थी। सीबीआई ने जांच के बाद यूपी सरकार से रविंद्र गौर के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने की अनुमति मांगी, जिससे यूपी सरकार ने मना कर दिया। यही वजह है कि गौर आज तक सेवा में हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार ने गैंगस्टर विकास दुबे और उसके तीन सहयोगियों की कथित मुठभेड़ की सीबीआई की निगरानी में जांच की मांग करने वाली याचिका में शीर्ष अदालत के समक्ष अपना जवाब दायर किया है। पुलिस महानिदेशक की ओर से दायर जवाबी हफलनामे में कहा गया है कि गैंगस्टर विकास दुबे का एनकाउंटर बनावटी नहीं था, बल्कि वास्तविक था। दुबे का मकसद उन पुलिस वालों को मारना और वहां से भागना था। जवाब में कहा गया है कि याचिकाकर्ताओं द्वारा विकास दुबे की मुठभेड़ की आशंका अपराधियों को बढ़ावा देने की कल्पना और अपराधियों के रक्षकों से उत्पन्न होती है।

उत्तर प्रदेश सरकार ने यह भी कहा है कि उसने पुलिस और अन्य विभागों के साथ अभियुक्तों और उनके सहयोगियों की कथित मिलीभगत के बारे में जांच करने के लिए एक न्यायिक जांच आयोग का गठन किया है। इस प्रकार, अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका का प्रयोग नहीं किया जा सकता है क्योंकि यह “दंड प्रक्रिया संहिता के अनुसार चल रही जांच स्वतंत्र और तटस्थ जांच” है। एसआईटी का नेतृत्व यूपी के अतिरिक्त मुख्य सचिव संजय भूसरेड्डी कर रहे हैं। अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक हरिराम शर्मा और डीआईजी रविन्द्र गौड़ भी एसआईटी टीम का हिस्सा होंगे।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

This post was last modified on July 19, 2020 8:32 pm

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