जन्मदिन पर विशेष: कांशीराम ने दिया बहुजन राजनीति को आसमानी फलक

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कांशीराम (15 मार्च, 1934 से 9 अक्तूबर 2006) संघर्षों के माध्यम से सामाजिक संगठन खड़ा करने की जीती जागती मिसाल हैं। भारतीय इतिहास में उनका अलग स्थान है, जिन्होंने अंबेडकर, फुले, शाहू जी, गाडगे, पेरियार जैसे दर्जनों विचारकों व संतों की वैचारिकी को मिलाकर एक बहुजन वैचारिकी दी। कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के वैचारिक आंदोलन का एक ठोस एवं मजबूत विकल्प तैयार किया। उन्होंने दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को उस वैचारिकी से जोड़ा, जिनमें कांशीराम के मिशन से शुरुआत में जुड़ने वालों में जगमोहन सिंह वर्मा और डॉ. मसूद अहमद का नाम उल्लेखनीय है।

देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति ने भी मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू होने के साथ दस्तक दे दी। कांशीराम का बामसेफ उत्तर प्रदेश में सक्रिय था। उत्तर प्रदेश में उन्होंने न सिर्फ अंबेडकरवादियों को आकर्षित किया, बल्कि जगमोहन सिंह वर्मा जैसे समाजवादियों को भी आकर्षित किया। लखनऊ विश्वविद्यालय में प्रोफेसर वर्मा कुर्मी समाज के थे और वामसेफ को उत्तर प्रदेश में स्थापित करने में उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी। कांशीराम ने 6 दिसंबर, 1981 को दलित शोषित समाज संघर्ष समिति (डीएस-4) नाम से पहला राजनीतिक संगठन बनाया। कांशीराम ने डीएस-4 के अंग्रेजी मुखपत्र ‘द ओप्रेस्ड इंडियन’ में तमाम लेख लिखकर यह साबित करने की कोशिश की कि शूद्र (ओबीसी) और अति शूद्र (अनुसूचित जाति) एक दूसरे से जुड़े रहे हैं और इसमें आदिवासी भी शामिल रहे हैं। बहुजन समाज भारत में आर्यों के आने के पहले वाली आबादी है। इस संगठन से न सिर्फ दलितों, बल्कि पिछड़ों को जोड़ने की कवायद की। बड़ी संख्या में ओबीसी, खासकर कुर्मी समुदाय के नेता कांशीराम से जुड़ते चले गए। कांशीराम ने मुस्लिमों को भी अपने पाले में करने की कवायद की। उत्तर प्रदेश में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में अस्थायी शिक्षक के रूप में काम करने वाले डॉ. मसूद अहमद 1983 में इसके पूर्णकालिक संगठनकर्ता बन गए। बामसेफ के विपरीत डीएस-4 ने गांवों के दलितों को पार्टी से जोड़ने की कवायद की।

कांशीराम ने चमचा युग नाम से किताब लिखी। ज्योतिबा फुले को समर्पित यह किताब चार भागों में विभाजित है- पूना पैक्ट की पूर्व पीठिका, पूना पैक्ट पर डॉ. अंबेडकर, चमचा युग और उपाय। इसमें पूना पैक्ट के लिए महात्मा गांधी को दोषी ठहराया गया है, जिससे दलितों में चमचा नेता पैदा हुए।

कांशीराम ने 14 अप्रैल 1984 को बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की। मंडल कमीशन रिपोर्ट लागू होने के पहले ही उन्होंने मंडल कमीशन पर चर्चा शुरू कर दी थी। 1987 में हरियाणा विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने कहा, “स्वतंत्रता के 39 साल के बाद भी न तो इस वर्ग को चिह्नित किया गया, न कुछ इस वर्ग को मिला। सच्चाई यह है कि इस देश की सरकार ओबीसी को चिह्नित करने को तैयार नहीं है। डॉ. अंबेडकर द्वारा संविधान में डाले गए अनुच्छेद 340 के मुताबिक काका कालेलकर आयोग और मंडल आयोग का गठन हुआ, लेकिन दोनों रिपोर्टों को कचरे के डब्बे में डाल दिया गया।”

कांशीराम ने नारा दिया, “मंडल आयोग लागू करो, वर्ना कुर्सी खाली करो।” यह कांशीराम के बहुजन समाज को एकीकृत करने की रणनीति थी, जिसमें वह कम से कम उत्तर प्रदेश में सफल नजर आते हैं। 1990 के दौरान उन्होंने राजबहादुर औऱ जंग बहादुर पटेल व सोने लाल पटेल जैसे कुर्मी नेताओं को अपने साथ जोड़ा।

वह अंबेडकर की राह चले, जिसमें सत्ता हासिल करके सामाजिक बदलाव किया जा सकता है। हालांकि सत्ता से सामाजिक बदलाव की एक सीमा होती है। साथ ही उग्र आंदोलनों की उग्र प्रतिक्रिया और उसका उग्र विकल्प भी आता है। अगर पटेल के शब्दों में कहें, जो उन्होंने गांधी के बारे में कहा था कि “गांधी ने दुनिया को सिखाया कि तलवार से लड़ाई लड़ने वाले खुद भी तलवार के शिकार हो जाते हैं।”

बसपा के सत्ता में आए महज 10 साल भी नहीं हुए थे। कांशीराम के रहते ही पार्टी में भगदड़ मच गई। पार्टी के मजबूत होने के साथ बसपा ने पिछड़े वर्ग खासकर कुर्मी नेताओं को एक-एक कर उखाड़ फेंका। समाजवादी पार्टी के 2000 ईसवी के आसपास मुस्लिम-यादव समीकरण पर केंद्रित होने के साथ बहुजन समाज पार्टी ने ब्राह्मण दलित गठजोड़ पर जोर दिया। मायावती ने कैबिनेट में पद देने के वादे के साथ ब्राह्मणों को प्रभावित किया। यह अवधारणा सामने आई कि आज दलित का सीधे सीधे उत्पीड़न करने वाले ओबीसी हैं, जो जमीन के मालिक हैं और ब्राह्मणों का दलितों से कोई सीधा टकराव नहीं है। पिछड़ा दलित और बहुजन कंसेप्ट बिखर गया। दलितों के बीच लगाए जाने वाले नारे “ब्राह्मण, ठाकुर, बनिया चोर, बाकी सब हैं डीएस फोर” “बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय” “जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी”, “85 पर 15 का राज, नहीं चलेगा, नहीं चलेगा”, “वोट हमारा, राज तुम्हारा, नहीं चलेगा, नहीं चलेगा”, “तिलक, तराजू और तलवार, इसको मारो जूते चार”,  का नारा धीरे-धीरे बदलकर “हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा-विष्णु-महेश है”,  “ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी बढ़ता जाएगा”,“सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय” ने ले लिया।

जातियों के समीकरण बनाकर सत्ता हासिल करने की चरम परिणति अब अलग मुकाम पर पहुंच गई है। राज्य में बहुजन समाज पार्टी हाशिये पर है और प्रचंड बहुमत के साथ भारतीय जनता पार्टी देश में ही नहीं, उत्तर प्रदेश में भी बहुमत में है। भाजपा ने जाति जोड़ने के नाम पर तमाम खटिक, कोरी आदि जैसी जातियों को अपने साथ जोड़ लिया। जाति के चैंपियन मनुवादी एक बार फिर जाति की राजनीति में विजेता बनकर उभरे।

हालांकि काशीराम ने जो वैचारिकी खड़ी की, उसका स्थान यथावत है। उन्होंने देश के वंचित तबके को एक विकल्प दिया कि उनके पूर्वजों ने भी एक विचारधारा दी है, जिस पर चलकर देश का बेहतर तरीके से कल्याण हो सकता है। कांशीराम की वैचारिकी सीधे तौर पर भले ही सत्ता से दूर हो, इस समय कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी भी दलितों और पिछड़ों की अपने दल में हिस्सेदारी बढ़ाने को मजबूर हैं।

            (सत्येन्द्र पीएस एक प्रतिष्ठित पेपर में कार्यरत हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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