Friday, January 21, 2022

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केरल हाईकोर्ट ने पीएम की तस्वीर हटाने की मांग खारिज की, एक लाख का जुर्माना लगाया

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केरल हाईकोर्ट ने कोविड-19 टीकाकरण के बाद नागरिकों को जारी किए गए टीकाकरण प्रमाण पत्र पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर की मौजूदगी के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया है। मंगलवार को दिए फैसले में कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया। जस्टिस पीवी कुन्हीकृष्णन ने फैसले में कहा कि मेरी राय में यह परोक्ष उद्देश्य के साथ दायर की गई तुच्छ याचिका है और मुझे पूरा संदेह है कि यह याचिकाकर्ता के लिए एक राजनीतिक एजेंडा भी है। मेरा मानना है कि यह प्रचार के लिए दायर किया गया मुकदमा है। इसलिए, यह एक उपयुक्त मामला है कि है इसे भारी जुर्माने के साथ खारिज किया जाए। जस्टिस पीवी कुन्हीकृष्णन वही जज हैं, जिन्होंने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा था कि उन्हें प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी पर गर्व है।

मामले में याचिकाकर्ता वरिष्ठ नागरिक और एक आरटीआई कार्यकर्ता हैं। उन्हें एक निजी अस्पताल से पैसे देकर कोविड-19 टीका लिया था। उन्हें दिए गए टीकाकरण प्रमाण पत्र पर प्रधानमंत्री की तस्वीर मौजूद ‌थी। उल्लेखनीय है कि भारत में कोविड -19 टीकाकरण के बाद जारी किए जा रहे प्रमाणपत्र पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर चस्पा रहती है। प्रमाणपत्र पर प्रधानमंत्री की तस्वीर से व्यथित होकर याचिकाकर्ता ने कोर्ट में याचिका दायर की थी। उन्होंने मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाया। याचिकाकर्ता की मांग थी कि यह घोषणा की जाए कि याचिकाकर्ता के कोविड -19 टीकाकरण प्रमाणपत्र पर प्रधानमंत्री की तस्वीर मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

साथ ही, याचिकाकर्ता ने प्रार्थना की थी कि जरूरत पड़ने पर उसे कोविन प्लेटफॉर्म से बिना प्रधानमंत्री की तस्वीर के प्रमाणमत्र जारी किए जाए। याचिकाकर्ता की ओर से पेश एडवोकेट अजीत जॉय ने दलील दी थी कि, टीकाकरण प्रमाणपत्र उनका निजी स्पेश है और इस पर उनके कुछ अधिकार हैं। उन्होंने तर्क दिया था कि चूंकि याचिकाकर्ता ने अपने टीकाकरण के लिए भुगतान किया था, इसलिए राज्य को उन्हें जारी किए गए प्रमाणपत्र में प्रधान मंत्री की तस्वीर चस्पा कर, टीकाकरण के श्रेय का दावा करने का कोई अधिकार नहीं है।मामले में उत्तरदाताओं का प्रतिनिधित्व एएसजी एस मनु ने किया था।

मामले की पिछली सुनवाई में कोर्ट ने याचिका की विश्वसनीयता की जांच की थी, जिसमें पूछा गया था कि किसी के टीकाकरण प्रमाणपत्र पर हमारे देश के प्रधानमंत्री की छवि होना शर्मनाक क्यों है? कोर्ट ने पूछा था कि वह हमारे प्रधानमंत्री हैं, किसी अन्य देश के नहीं। वह जनादेश के जर‌िए सत्ता में आए हैं। केवल इसलिए कि आपके राजनीतिक मतभेद हैं, आप इसे चुनौती नहीं दे सकते … आपको हमारे प्रधानमंत्री पर शर्म क्यों हैं? ऐसा नहीं लगता के 100 करोड़ नागरिकों को कोई दिक्‍कत है, फिर आपको क्यों है?सभी के अपने-अपने राजनीतिक विचार होते हैं, फिर भी वह हमारे प्रधानमंत्री हैं। आप कोर्ट का समय बर्बाद कर रहे हैं।

 ये देखते हुए कि याचिकाकर्ता नई दिल्ली स्‍थ‌ित जवाहरलाल नेहरू लीडरशिप इंस्टीट्यूट का राज्य स्तरीय मास्टर कोच था, कोर्ट ने टिप्पणी की कि आप एक प्रधानमंत्री के नाम पर बने संस्थान में काम करते हैं। आप विश्वविद्यालय से उस नाम को भी हटाने के लिए क्यों नहीं कहते? एक अन्य पीठ ने पहले ही याचिका को यह कहते हुए निरुत्साहित कर दिया था कि इसके बड़े निहितार्थ हैं। फिर भी, याचिका को स्वीकार कर लिया गया और मामले में सभी प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया गया।

याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि उसकी चिंता यह है कि कोविड-19 के खिलाफ राष्ट्रीय अभियान को मीडिया अभियान के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा था, फोटो के साथ प्रमाण पत्र प्राप्त करने पर पीएम को मजबूती मिली।अदालत ने याचिकाकर्ता पीटर म्यालीपरम्पिल पर यह कहते हुए ₹1 लाख का जुर्माना भी लगाया कि याचिका तुच्छ है और ऐसा लगता है कि इसे राजनीतिक उद्देश्यों के साथ दायर किया गया है।एकल-न्यायाधीश ने आदेश दिया कि मेरी राय के अनुसार यह एक निराधार याचिका है, जो गलत मंशा से दायर की गई है। ऐसा लगता है कि राजनीतिक मकसद हैं और इसे भारी कीमत के साथ खारिज किया जाना चाहिए।

न्यायालय ने यह भी देखा कि किस प्रकार व्यक्तियों की स्वतंत्रता से संबंधित हजारों मामले न्यायालय के समक्ष लंबित हैं और वर्तमान प्रकार की याचिकाएं न्यायालय का समय बर्बाद करती हैं।अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में इस तरह की तुच्छ याचिकाओं को भारी जुर्माने के साथ खारिज किया जाना चाहिए। इसलिए याचिका को ₹1 लाख के जुर्माने के साथ खारिज किया जाता है।

अदालत ने पहले याचिकाकर्ता की तस्वीर को शामिल करने पर उसकी आपत्ति पर सवाल किया था और उससे पूछा था कि वह पीएम के लिए शर्मिंदा क्यों है।13 दिसंबर को मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि वह लोगों के जनादेश के कारण पीएम बने। हमारी अलग-अलग राजनीतिक राय है लेकिन वह अभी भी हमारे प्रधानमंत्री हैं।

कोर्ट ने यह भी स्पष्टीकरण मांगा था कि वैक्सीन प्रमाणपत्रों पर वर्तमान पीएम नरेंद्र मोदी की छवि को शामिल करना पूर्व पीएम जवाहरलाल नेहरू के नाम पर एक विश्वविद्यालय के नामकरण से कैसे भिन्न है।

इसके अलावा, यह तर्क दिया गया कि वैक्सीन प्रमाणपत्र व्यक्तिगत स्वास्थ्य विवरण के साथ एक व्यक्ति का निजी स्थान है और पीएम की तस्वीर को शामिल करना पूरी तरह से अनावश्यक और दखल देने वाला है। प्रासंगिक रूप से, यह तर्क दिया गया था कि यह एक व्यक्ति के लिए अभियान स्थान के रूप में वैक्सीन प्रमाण पत्र का उपयोग करके नागरिकों की मतदान की स्वतंत्र पसंद का उल्लंघन करता है।

केंद्र सरकार के लिए यह तर्क दिया गया था कि याचिका विचारणीय नहीं है क्योंकि इसमें संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन का कोई उल्लेख नहीं है। इसके अलावा, याचिकाकर्ता ने केवल टीकाकरण के लिए भुगतान किया है न कि वैक्सीन प्रमाणपत्र के लिए।

दरअसल, ये याचिका कोविड-19 वैक्‍सीन सर्टिफ‍िकेट से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर हटाने के लिए दायर की गई थी। केरल हाईकोर्ट ने सोमवार को कोरोना वायरस टीकाकरण प्रमाणपत्र पर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर हटाने की मांग करने वाली एक याचिका की विचारणीयता की जांच की। याचिकाकर्ता का कहना था कि वैक्सीन सर्टिफिकेट पर प्रधानमंत्री की तस्वीर लगाना गलत है। उन्होंने इसे नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया। याचिकाकर्ता ने कहा कि प्रमाण पत्र एक निजी स्थान है, जिसमें व्यक्तिगत विवरण दर्ज होता है। लिहाजा किसी व्यक्ति की गोपनीयता में दखल देना अनुचित है। प्रमाण पत्र में प्रधानमंत्री की तस्वीर जोड़ना किसी व्यक्ति के निजी स्थान में घुसपैठ है।

इस पर जस्टिस पी वी कुन्हीकृष्णन ने कहा कि प्रधानमंत्री को देश की जनता ने चुना है। ऐसे में वैक्‍सीन सर्टिफिकेट पर उनकी तस्वीर लगाने में क्या गलत है। आपको प्रधानमंत्री पर शर्म क्यों आती है? वो लोगों के जनादेश से सत्ता में आए हैं। हमारे अलग-अलग राजनीतिक विचार हो सकते हैं, लेकिन वो हमारे प्रधानमंत्री हैं।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह का लेख।)

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