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Friday, September 24, 2021

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केरल नन हत्याकांड: इंसाफ तक पहुंचने में लग गए 28 साल

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अभी पिछले दिनों बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस एसएस शिंदे और जस्टिस एमएस कार्णिक की पीठ ने टिप्पणी की थी कि तारीख पे तारीख हकीकत है और बार-बार मुकदमों की सुनवाई स्थगित होने की आलोचनाओं पर कठोर रुख नहीं अपनाया जाएगा। हाई कोर्ट ने यह टिप्पणी उस ट्वीट के संदर्भ में की, जिसमें कहा गया था कि किस तरह उसके खिलाफ दर्ज प्राथमिकियां निरस्त कराने के मामले में बार-बार सुनवाई स्थगित हो रही है। अब केरल के तिरुवनंतपुरम से तारीख पे तारीख का मामला सामने आया है, जहां सीबीआई कोर्ट ने मंगलवार को 28 साल पुराने सिस्टर अभया मर्डर मामले में दो आरोपियों को दोषी ठहराया है। यह मामला अधीनस्थ न्यायालय से लेकर केरल हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक झूलता रहा। 

यह मामला इसलिए भी बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसे केरल पुलिस और क्राइम ब्रांच ने खुदकुशी से हुई मौत बताया था, लेकिन बहुत विरोध-प्रदर्शन और याचिकाओं के बाद यह केस सीबीआई को दे दिया गया था। यही नहीं सीबीआई ने तीन बार फाइनल रिपोर्ट दाखिल की थी, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया था और सीबीआई को और भी गहरी जांच करने को निर्देशित किया था।

कोर्ट ने अपने फैसले में केरल के एक कॉन्वेंट में नन रहीं सिस्टर अभया की हत्या के लिए एक पादरी और दूसरी नन को जिम्मेदार माना है। कोट्टायम के एक कॉन्वेंट में 21 साल की सिस्टर अभया की 1992 में हत्या कर दी गई थी और फिर अपराध छिपाने के लिए उनके शव को कॉन्वेंट के परिसर में स्थित एक कुएं के अंदर फेंक दिया गया था। सीबीआई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि फादर थॉमस कोट्टूर और सिस्टर सेफी के खिलाफ हत्या के आरोप साबित होते हैं। फिलहाल दोनों न्यायिक हिरासत में हैं।

वैसे इस मामले में एक तीसरा आरोपी फादर फूथराकयाल को दो साल पहले ही सबूतों के अभाव में बरी किया जा चुका है। विशेष सीबीआई अदालत के न्यायाधीश जे सनल कुमार ने इस मामले में फैसला सुनाया है। कोर्ट बुधवार को सजा की अवधि पर फैसला सुनाएगी।

सीबीआई ने 1993 में स्थानीय पुलिस से मामले को संभालने के बाद अलग-अलग समय में तीन क्लोजर रिपोर्ट दायर की। 1996 में, सीबीआई ने अनिर्णायक निष्कर्षों के साथ अंतिम रिपोर्ट दायर की। सीबीआई यह नहीं बता पाई थी कि क्या सिस्टर अभया की मौत मानव हत्या थी या आत्महत्या? इस रिपोर्ट को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत द्वारा स्वीकार नहीं किया गया था।

एक अन्य टीम द्वारा आगे की जांच के बाद, एक दूसरी अंतिम रिपोर्ट 1999 में दायर की गई थी, जिसमें निष्कर्ष निकाला गया था कि मौत मानव हत्या थी लेकिन अपराधियों की पहचान नहीं कर पाए। इस रिपोर्ट को भी कोर्ट ने स्वीकार नहीं किया। 2005 में, सीबीआई की एक अन्य टीम द्वारा जांच के बाद एक और रिपोर्ट दर्ज की गई, जिसमें सिस्टर अभया की मौत में अन्य व्यक्तियों के शामिल होने से इनकार किया गया था।

इस साल अक्तूबर में, हाई कोर्ट ने दिन-प्रतिदिन के आधार पर सुनवाई को तेज करने का निर्देश दिया था। जस्टिस वीजी अरुण की एकल पीठ ने कहा था कि यह देखना निराशाजनक है कि 1992 के अपराध से संबंधित आपराधिक कार्यवाही को अंतिम रूप देना बाकी है, चाहे वह प्रोविडेंस या डिजाइन के कारण हो। एकल पीठ ने महामारी की स्थिति को देखते हुए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से गवाहों से जिरह की अनुमति दी थी।

केरल हाई कोर्ट 1 नवंबर, 2008 को सीबीआई की कोच्चि इकाई को जांच का निर्देश दिया। इसके तुरंत बाद, 19 नवंबर, 2008 तक सीबीआई ने फादर थॉमस कोट्टूर, सिस्टर सेफी और फादर जोस पुथरीकायिल को गिरफ्तार कर लिया। सामाजिक कार्यकर्ता जोमन पुथेनपुरकेल द्वारा गठित एक ‘एक्शन काउंसिल’ ने मामले में उचित जांच की मांग करते हुए कई याचिकाएं दायर की थीं। जुलाई 2009 में, सीबीआई ने फादर थॉमस कोट्टूर, सिस्टर सेफी और फादर जोस पुथरीकायिल को हत्या और सबूत नष्ट करने के आरोप में आरोपी बनाते हुए आरोप पत्र दायर किया था।

थॉमस कोट्टूर कोट्टायम के बीसीएम कॉलेज में सिस्टर अभया को साइकोलॉजी पढ़ाता था। वो तत्कालीन बिशप का सचिव भी था। बाद में वो कोट्टायम के कैथोलिक डायोसिस का चांसलर भी बना। सिस्टर सेफी भी उसी हॉस्टल में रहती थी, जहां सिस्टर अभया रहती थीं। उसके पास हॉस्टल का प्रभार भी था। दोनों को हत्या और अपराध छिपाने और सबूत मिटाने का दोषी पाया गया है।  थॉमस कोट्टूर पर ट्रेसपासिंग यानी बिना अनुमति के घर में घुस जाने का दोष भी है।

सीबीआई के अनुसार, सिस्टर अभया ने 27 मार्च, 1992 की तड़के सुबह लगभग 4.15 बजे अपने हॉस्टल रूम से किचन में जाने के दौरान कोट्टूर, होज़े फूथराकयाल और सेफी के बीच अनैतिक गतिविधियों को देख लिया था। इसके बाद आरोपियों ने कथित रूप से सिस्टर अभया के सिर पर किसी भोथरी चीज से वार किया था और फिर अपराध छिपाने के लिए उनका शव कुएं में फेंक दिया था।

कोर्ट ने सीबीआई की पहली तीन फाइनल रिपोर्ट को खारिज कर दिया था। कोर्ट ने उन्हें और भी गहरी जांच करने को कहा था। कोर्ट ने रिपोर्ट में कई गड़बड़ियों का हवाला दिया था, जैसे कि उस रात कुत्तों ने नहीं भौंका था, या फिर यह तथ्य कि किचन का दरवाजा बाहर से बंद था या फिर सिस्टर अभया के कुएं में कूदने की आवाज कॉन्वेंट के लोगों को कैसे नहीं सुनाई दी।

सिस्टर अभया को न्याय दिलाने की लड़ाई लड़ रहे पैनल में अकेले जीवित बचे सदस्य मानवाधिकार कार्यकर्ता जोमोन पुथेनपुराकल ने कहा कि ‘सिस्टर अभया के केस को आखिरकार न्याय मिल गया है, अब उनकी आत्मा को शांति मिलेगी। यह इस बात का ज्वलंत उदाहरण है कि किसी को यह नहीं सोचना चाहिए कि अगर आपके पास पैसा और बाहुबल है तो आप न्याय से खिलवाड़ कर लेंगे।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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