Mon. Sep 16th, 2019

खतरे में नौनिहालों का भविष्य और जान

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नई दिल्ली। भाईचारे की मिसाल के रूप में प्रसिद्ध हमारे देश में जाति और धर्म के नाम पर मारपीट और हत्याएं होना अब आम बात हो गई है। लंबे समय से चली आ रही इन वारदातों में पिछले सालों में लगातार वृद्धि हुई है। मोदी के पहले कार्यकाल में जहां गो हत्या के नाम पर मॉब लिंचिंग हुईं वहीं इस कार्यकाल में जय श्रीराम के नाम पर एक विशेष धर्म के बच्चों को टारगेट बनाया जा रहा है। ऐसा नहीं है कि यह कोई अचानक हो रहा। ऐसा भी नहीं है कि इस तरह की वारदातों को जनता अंजाम दे रही है। यह सब एक सोची समझी रणनीति के तहत किया जा रहा है। विशेष संगठनों और विशेष व्यक्तियों के उकसावे पर। चाहे झारखंड में तबरेज अंसारी के जय श्रीराम का नारा न लगाने पर पीट-पीटकर हत्या करने का मामला हो या फिर पश्चिम बंगाल में एक शिक्षक को ट्रेन से फेंकने का। सत्तापक्ष के किसी नेता की ओर से अफसोस जाहिर नहीं किया गया।

ऐसा भी नहीं है कि दूसरी ओर से कोई सियासत न हो रही है। धर्म के नाम पर राजनीति सेंकने वाले उधर भी अपना खेल खेल रहे हैं। देश की राजधानी दिल्ली के लालकुआं हौजखास का मामला इसका ताजा उदाहरण है। दारू पीने को लेकर हुए झगड़े ने साम्प्रदायिक रूप ले लिया और कुछ नाबालिग नशेड़ी युवकों को उकसाकर मंदिर में तोड़फोड़ करा दी गई।
इस तरह के मामलों में यह बात देखने में आ रही है कि दोनों ओर से जो भी उत्पाती लड़के वारदातों में शामिल थे उनमें से अधिकतर नाबालिग थे। अधिकतर मामलों में 15-18 साल तक की उम्र के लड़के इस तरह की वारदातों में लिप्त पाये जा रहे हैं।

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यह जगजाहिर है कि यह उम्र सोच के मामले में अपरिपक्व मानी जाती है। अक्सर देखने में आता है कि जाति धर्म के नाम पर राजनीति करने वाले संगठन इसी उम्र के बच्चों को बरगलाकर अपना उल्लू साधते हैं। ये सब वे लोग हैं जो अपने बच्चों को एक से बढ़कर एक स्कूल में पढ़ाते हैं। उन्हें किसी से कहासुनी से भी दूर रहने की हिदायत देते हैं। हां अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए दूसरों के बच्चों की बलि चढ़ाने से बाज नहीं आते। ये जितने भी बच्चे “जय श्रीराम” या “अल्ला हू अकबर” के नारे लगाते घूम रहे हैं। ये सब इस्तेमाल हो रहे हैं। पैसों का लालच देकर। सत्ता की हनक दिखाकर या फिर इतिहास को तोड़मरोड़कर उनके अंदर एक विशेष धर्म के प्रति नफरत पैदा करके।
नेताओं के उकसावे में आकर ये युवा वारदात को अंजाम तो दे रहे हैं पर इसके परिणाम से अनभिज्ञ हैं। यह सनक उन्हें जेल की सलाखों के बीच धकेल दे रही है। इससे इनका भविष्य तो बर्बाद हो ही रहा है साथ ही उनके परिजनों पर भी बादल सा फट जा रहा है। मैं उन लोगों से पूछना चाहता हूं जो इस तरह की वारदातों की मौखिक रूप से, मीडिया या फिर सोशल मीडिया पर पैरवी करते हैं। क्या ये लोग अपने बच्चों को इस तरह की वारदात करने भेजेंगे? मतलब मेरे बच्चे पढ़-लिखकर कामयाब हों और दूसरे के बच्चों को इस्तेमाल कर हम जाति और धर्म का ठेकेदार बनने का अपना स्वार्थ सिद्ध कर लें।
इन बच्चों को तो इतनी समझ नहीं है कि ये अपना बुरा भला समझ सकें पर जो लोग इनका इस्तेमाल कर रहे हैं उनको तो सबक सिखाया जा सकता है। इन बच्चों को उनके चंगुल से निकाला जा सकता है।  
एक दूसरे से लड़ने से भले ही किसी दल या व्यक्ति का भला हो जाए पर देश व समाज का भला तो आपस में मिलजुल कर काम करने से होगा। भाईचारा कायम कर एक अच्छा माहौल बनाना होगा। जो लोग कट्टरता के पैरोकार हैं वे समझ लें कि जिन भी देशों में कट्टरता को बढ़ावा दिया गया है वे आज बर्बादी के कगार पर हैं। चाहे लीबिया का मामला हो, सीरिया हो, इराक हो या फिर हमारा पड़ोसी देश पाकिस्तान। वह कट्टरता ही थी जिसके चलते वो आज पूरी तरह से बर्बाद हो गये हैं।
हमारे देश के लोकतंत्र की खूबसूरती से दूसरे देश इसलिए ही प्रभावित होते हैं क्येंकि हम लोग भले ही विभिन्न धर्मों के हों, विभिन्न जातियों के हों, विभिन्न क्षेत्रों के हों या फिर हमारी भाषा अलग-अलग हो फिर भी हम सब एक हैं। हमारा देश किस्म-किस्म के फूलों का एक गुलदस्ता है। जिसमें हर फूल की अपनी अलग खुशबू है। अनेकता में एकता ही हमारी ताकत है। इस ताकत को कुछ सियासतदानों के बहकावे में मत खोओ। जो हमारे बच्चे देश के खेवनहार बनने वाले हैं, उनका जीवन बर्बाद मत होने दो।

धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले जम्मू-कश्मीर को यही सियासत खा रही है। अलगाववादी नेताओं ने वहां के बच्चों का इस्तेमाल कर उनकी छवि बिगड़ैल युवाओं की बना दी है। पत्थरबाजों का का तमगा उनके गले में डाल दिया है। निकालो अपने बच्चों को इस जाति और धर्म के दलदल से। इनकी प्रतिभा और जज्बा का इस्तेमाल देश के उत्थान के लिए करने की जरूरत है।
अब तो देश में एक माहौल बने, जो जितने भी दल या नेता जाति और धर्म के नाम पर हमारे बच्चों का उकसा रहे हैं। उनसे पूछा जाये कि तुम्हारे बच्चे कहां हैं?  मॉब लिंचिंग की वारदातें इन भोले-भाले बच्चों से क्यों करवा रहे हो। अपने बच्चों से कराओ। थमाओ ये हथियार अपने बच्चों के हाथों में। जवाब मिलते ही सब समझ में आ जाएगा। ये जितने भी जाति और धर्म के ठेकेदार देश में घूम रहे हैं ये सब सत्ता और पॉवर के लिए अपनी दुकानें खोले हुए हैं। अब समय आ गया है कि इस तरह की दुकानों पर शटर लगा दिये जाएं।
देश का इतिहास उठाकर देख लीजिए। ये जितने नेता जाति और धर्म के नाम पर उन्माद फैलाते हैं। उस उन्माद में दूर-दूर तक इनके बच्चे नहीं दिखाई देते हैं। क्या कभी किसी नेता को मॉब लिंचिंग का शिकार होते देखा है। क्या कभी किसी नेता के बच्चे को मॉब लिंचिंग की वारदात को अंजाम देते देखा गया है। नहीं, तो फिर क्यों इनका हथियार बन रहे हो।
इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने अपने पहले और मौजूदा कार्यकाल में इस तरह के मामलों की भर्त्सना तो कई बार की है मगर कभी ठोस कार्रवाई की पहल नहीं की। भोपाल की सांसद प्रज्ञा ठाकुर के गोडसे को देशभक्त कहने पर प्रधानमंत्री ने नाराजगी तो जताई पर वह कुछ कर न सके। ऐसा ही मध्य प्रदेश में विजय वर्गीय के विधायक बेटे के मामले में हुआ। एक नौकरशाह को बैट से मारने पर वह पार्टी से निकालने की बात कहते तो दिखे पर अभी तक उसका पार्टी से न निकाला जाना उनकी नीयत को संदेह के घेरे में खड़ा कर देता है।
 2019 के चुनाव में जीतते ही प्रधानमंत्री ने संविधान और लोकतंत्र की कसमें तो खाईं। अल्पसंख्यकों को सुरक्षा देने की बातें तो बहुत बड़ी-बड़ी कीं पर जमीनी स्तर पर उनका प्रयास दिखाई न देना उनकी करनी और कथनी में अंतर को दर्शा रहा है।
दरअसल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कांग्रेस और आज के तथाकथित समाजवादियों की कमजोरी का फायदा उठा रहे हैं। भाजपा और उसके सहयोगी संगठनों ने जाति और धर्म के नाम पर होने वाले फसाद को तूल देने पर अपना पूरा ध्यान केंन्द्रित कर रखा है। बंटवारे और आजादी की लड़ाई में क्रांतिकारियों की शहादत का जिम्मेदार महात्मा गांधी और पंडित जवाहर लाल नेहरू को बताकर आजादी की लड़ाई से बच्चों का ध्यान भटकाया जा रहा है। पाकिस्तान, जम्मू-कश्मीर, बढ़ती जनसंख्या और मुगल शासकों के हिंदुओं पर किये गये अत्याचार के नाम पर देश के मुस्लिमों के खिलाफ हिंदू बच्चों को भड़काया जा रहा है। यह सब इसलिए हो रहा है जिससे ये बच्चे रोजगार न मांगें।
जो देश भुखमरी के मामले में 119वें स्थान पर है। बेरोजगारी के मामले में 45 साल का रिकार्ड तोड़ा गया हो। जिस देश के दो प्रदेशों के सैकड़ों गांवों के लोग सूखे के चलते अपने घर और बाहर छोड़कर पलायन कर चुके हैं। जिस देश में जल संकट भयावह रूप ले रहा हो। महिलाओं की अस्मत रोज नीलाम हो रही हो। निजी संस्थाओं में कर्मचारियों का शोषण और उत्पीड़न चरम पर हो। लोकतंत्र की रक्षा करने वाले तंत्र को बंधक बनाने का दुस्साहस हो रहा हो। उस देश में बस हिंदू और मुस्लिम का मुद्दा ही हावी होना यह दर्शाता है कि पूरे का पूरा शासन तंत्र देश को इस तरह की वारदातों में झोंकने में लगा है। ऐसा नहीं कि देश में विपक्ष कोई सकारात्मक काम कर रहा हो। आज देश की दुर्दशा के लिए सत्ता पक्ष से कहीं कम जिम्मेदार विपक्ष नहीं है। ऐसा लग रहा है कि विपक्ष में बैठे नेता बस अपना गला बचाने में लगे हैं। हां सबको सत्ता दे दो, जिससे ये लोग जनता के खून पसीने की कमाई पर अय्याशी कर सकें। 
जो लोग यह समझ कर चुप बैठे हैं कि मॉब लिंचिंग या दूसरे जाति और धर्म के नाम पर होने वाले विवाद उनसे कहीं दूर हैं। उन्हें समझना चाहिए कि अगर इस तरह की वारदातों पर अंकुश नहीं लगा तो वह दिन दूर नहीं जब हमारे बच्चे भी इस आग की चपेट का हिस्सा होंगे। कुछ मारने वालों में होंगे तो कुछ को मौत निगल जाएगी।
लोकसभा चुनाव में विपक्ष में रहने वाले क्षेत्रीय दलों के सफाये को भले ही राजनीति में जातिवाद के खत्म होने के रूप में देखा जा रहा हो। पर मोदी के इस प्रचंड बहुमत में जातिवाद से भी बड़ा मामला धर्म का रहा है। मोदी ने बड़ी चतुराई से धर्म को राष्ट्रवाद में बदल दिया।
दरअसल भाजपा यह बात भलीभांति समझ चुकी है कि देश की जमीन भावनात्मक मुद्दों पर राजनीति करने के लिए बहुत उपजाऊ है। और अब उन्हें मोदी जैसा मंझा हुआ वक्ता मिल गया जो हर माहौल को अपने हिसाब से ढालने में माहिर है। झूठ को सच के रूप में परोसने में उन्हें पारंगतता हासिल है। इसमें दो राय नहीं कि इस उन्माद में एक विशेष धर्म के लोग ही नहीं बल्कि हर वर्ग के कमजोर लोग भी शिकार हो रहे हैं। निजी कार्यालयों में, सार्वजनिक स्थलों पर, स्कूल कालेजों में। सब जगह। यहां तक सुरक्षा की जिम्मेदारी लिये घूम रही पुलिस भी कमजोरों को ही अपना निशाना बनाकर अपना रिकार्ड पूरा कर ले रही है।

(लेखक चरण सिंह पत्रकार हैं और आजकल नोएडा में रहते हैं।)

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