नीतीश के गले की फाँस बन गया है कोटा में फंसे छात्रों का मुद्दा

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कोटा में फंसे छात्रों को वापस लाने की ठोस पहल नहीं होने से बिहार में गहरा क्षोभ है। भाजपा विधायक का निजी वाहन से कोटा जाकर अपनी पुत्री को ले आने की घटना ने इस क्षोभ को और बढ़ा दिया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उन छात्रों और प्रवासी मजदूरों के लाने की व्यवस्था करने में देशबंदी के दिशा-निर्देशों को मान रहे हैं और इसकी कोई व्यवस्था नहीं करने पर अड़े है। पर विपक्ष दूसरे राज्यों का उदाहरण देते हुए सरकार पर असंवेदनशील होने का आरोप लगा रहा है। हाईकोर्ट में दायर याचिका पर सरकार ने देशबंदी का पालन करने का संकल्प दुहराया है और कोटा में फंसे छात्रों की देखरेख की जवाबदेही राजस्थान सरकार का होने की दुहाई दी है। 27 अप्रैल को अगली सुनवाई होनी है। 

राजस्थान के कोटा में रहकर बिहार के हजारों छात्र मेडिकल और इंजीनियरिंग की प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए विभिन्न कोचिंग संस्थानों में पढ़ते हैं। अभी बिहार के करीब 12 हजार छात्र वहां फंसे हुए हैं। देशबंदी के दौरान खाने-पीने की परेशानियों से ज्यादा उनके अवसादग्रस्त हो जाने का खतरा है। इससे अभिभावक लगातार सरकार से अनुरोध कर रहे हैं कि बच्चों को जरूरी जांच के बाद वापस लाने की व्यवस्था की जाए। पर सरकार लगातार कह रही है कि ऐसा करना लॉकडाउन के मकसद और निर्देशावली का उल्लंघन होगा, उन छात्रों के स्वास्थ्य के लिहाज से भी लंबी यात्रा की इजाजत देना अनुचित है। 

इस बीच भाजपा विधायक अनिल सिंह निजी वाहन से कोटा जाकर वहां पढ़ने वाली अपनी बेटी को ले आए। राजनीतिक हलकों में इसको लेकर आरोप-प्रत्यारोप तेज है। भाजपा विधायक दल का सचेतक होने के नाते मिली विधानसभा की गाड़ी और ड्राइवर का उपयोग किया था। उस ड्राइवर और विधायक के अंगरक्षकों को निलंबित कर दिया गया है। उस अनुमंडल अधिकारी को भी निलंबित कर दिया गया है जिसने विधायक को कोटा जाने का पास निर्गत किया था। लेकिन विधायक के खिलाफ अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है जिसकी मांग विपक्ष कर रहा है। पर उससे बड़ा सवाल यह है कि जब विधायक की पुत्री को लॉकडाउन के दौरान कोटा से लाया जा सकता है तो दूसरे छात्रों को क्यों नहीं। 

इसे लेकर पटना हाईकोर्ट में कई याचिकाएं दायर हुई हैं। हाइकोर्ट ने राज्य और केन्द्र सरकार को नोटिस देकर हलफनामा पेश करने के लिए कहा है। उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश सरकार तीन सौ बसें भेजकर राज्य के छात्रों को वापस ले आई। दादरा-नगर हवेली, आसाम और हरियाणा के छात्रों को भी अपने राज्य में वापस लाने की व्यवस्था वहां की राज्य सरकारों ने किया है। 

सरकार ने हाईकोर्ट में कहा है कि वह उन छात्रों की परेशानियों को समझती है, पर उन्हें वापस लाना देशबंदी के दिशानिर्देशों का उल्लंघन होगा। इस बीच खबर है कि कोटा में फंसे छात्रों ने घर-वापसी की मांग लेकर 23 अप्रैल को उपवास किया और बिहार सरकार के पास त्राहिमाम संदेश भेजा है। छात्र विभिन्न छात्रावासों और गेस्ट हाउसों में फंसे हुए हैं। अभिभावकों का कहना है कि मेस, कैंटीन और बाजार बंद होने से खाने-पीने की समस्या उत्पन्न हो गई है। दूसरे राज्यों के छात्रों के वापस लौट जाने से बिहार के छात्रों में निराशा उत्पन्न हो गई है। 

बिहार सरकार लगातार यह कहती रही है कि वह किसी को यात्रा करने की अनुमति नहीं देने जा रही है। आपदा प्रबंधन विभाग के प्रधान सचिव प्रत्यय अमृत ने हाईकोर्ट में दाखिल हलफनामा में इसे दुहराया है। उन्होंने कहा कि सरकार कोटा जिला प्रशासन के संपर्क में है और छात्रों के लिए हेल्पलाइन के आठ नंबर जारी किए गए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि कोटा में कोरोना वायरस के बहुत सारे मामले (90) सामने आए हैं। ऐसे में किसी को आने की अनुमति देना उचित नहीं होगा। यही सवाल उठता है कि विधायक अनिल सिंह को इसकी अनुमति कैसे मिल गई। 

 विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने कहा है कि केवल विधायक अनिल सिंह ही नहीं करीब 700 लोगों को विशेष पास जारी किए गए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार महामारी के समय भी अमीर-गरीब का भेद कर रही है। सामान्य लोगों को भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है। 

यह भी उल्लेखनीय है कि 16 अप्रैल को एक निजी बस कोटा से 17 बच्चों के लेकर पटना पहुंची। हालांकि उससे आए बच्चों की जांच कराई गई और होम क्वारंटाइन में रखा गया। उनके घर के बाहर पर्ची भी चिपका दी गई। 

इस बीच बिहार सरकार ने हाईकोर्ट को बताया है कि बिहार के लगभग 17 लाख लोग देश के विभिन्न इलाकों में फंसे हुए हैं। सरकार उनकी यथासंभव सहायता कर रही है। पर वापस लाने की अनुमति देने का प्रश्न नहीं उठता। सरकार ने एक हजार प्रति व्यक्ति अनुदान देने की घोषणा की है। पर यह सोच अभी तक नहीं दिख रही कि इस एक हजार रुपए में कोई व्यक्ति कितने दिन भोजन कर सकता है। वैसे यह रकम सभी लोगों को मिली हो, ऐसा नहीं है। स्वयं सरकार के आंकड़े के अनुसार अभी तक 12 लाख लोगों के खाते में रुपए भेज दिया गए है। अब बाहर फंसे लोगों की संख्या 17 लाख है, मदद केवल 12 लाख को दी गई है। 

 (अमरनाथ वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल पटना में रहते हैं।)

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