Thursday, December 2, 2021

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कृषि मंत्री जी! कृषि कानून सिर्फ काले नहीं; घोटाले, गद्दारी और विश्वासघात से भी भरे हुए हैं

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कृषि कानूनों पर देश की संसद में हुयी बहस का जवाब देते हुये कृषि मंत्री और राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के उत्तर में प्रधानमंत्री ने कहा है कि “उन्हें आज तक किसी ने बताया ही नहीं कि इन कृषि कानूनों में काला क्या है।” जो अच्छा है वह सफेद और गोरा है और जो खराब है वो काला है ब्लैक है। ये दोषपूर्ण भाषा है। ये राज करने वाले अंग्रेजों के द्वारा दी गयी रंगभेदी भाषा है जो गोरों की श्रेष्ठता और कालों की निकृष्टता मानती है।  इसलिये कानूनों में काला क्या है के बजाय चर्चा “घोटाला क्या है” पर करना ठीक होगा। 

हालांकि तथ्य यह है कि चौथे दौर की वार्ता में कृषि मंत्री को सारे किसान संगठनों की ओर से डेढ़ घंटे तक बताया गया था कि देश का किसान इन कानूनों को क्यों खराब मानता है। जब पांचवें दौर की बातचीत शुरू हुयी तब किसानों ने उनसे पूछा था कि अब वे बतायें कि इन कानूनों में अच्छा क्या है । मंत्री समूह ने कहा था कि “चालीस लोगों को समझाना संभव नहीं है बेहतर हो कि चार पांच लोगों की कमेटी बना दी जाये।” किसानों ने आपके इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था क्योंकि उसके पीछे की नीयत ठीक नहीं थी। चलिए, आज फिर गिन लेते हैं इन कानूनों के कुछ प्रमुख घोटाले ;

पहला घोटाला तो है इन कानूनों को अध्यादेश के जरिये लाया जाना । अध्यादेश अत्यन्त असाधारण स्थिति में जब संसद के सत्र का हो पाना नामुमकिन हो और  तत्काल कदम उठाना हो तब लाये जाते हैं। अभी दसवें दौर की बातचीत में सरकार इनको डेढ़ या दो साल के लिये स्थगित करने के लिये तैयार थी। प्रधानमंत्री “जिसे लागू नहीं करना न करे” की छूट देने को तैयार हैं । इसका मतलब है कि ये कानून बहुत अत्यावश्यक नहीं हैं। तो फिर  अध्यादेश क्यों लाया गया ?

घोटाला नंबर दो है अध्यादेश का समय !! जब कोरोना लॉकडाउन में साढ़े चार से पांच करोड़ भारतवासी असहाय होकर भूखे प्यासे पैदल पैदल घर लौट रहे थे। जब यह देश कोरोना की महामारी के बहुत खतरनाक दौर से गुजर रहा था।  तब ऐसी क्या असाधारण आवश्यकता थी कि जब पूरे देश की मानवता जिंदगी और मौत के बीच की लड़ाई लड़ रही थी तब कृषि कानूनों के अध्यादेश लाये गए ?

चौतरफा गिरावट के समय अकेला केवल किसान था जो कोरोना की महामारी के बावजूद अनाज पैदा करने में लगा था ताकि देश की जनता भूखे न मरे। तब  प्रधानमंत्री ने भी अपने भाषण में कहा था कि भारत इस देश के किसानों का ऋणी है जिसने किसी की थाली खाली नहीं रहने दी है। मगर बजाय उसको सम्मानित करने के उस किसान के हितों को उस किसान की खेती को छीनने के लिये उसकी जिंदगी को बरबाद करने के लिये ऐसे खतरनाक कानून लेकर आना तीसरा घोटाला है।

चौथा घोटाला है राज्यसभा में इसे पारित कराने का अत्यंत शर्मनाक तरीका। राज्य सभा के नियम कहते हैं कि यदि कोई एक सांसद भी किसी कानून पर मतदान कराने की मांग करता है तो वोटिंग करानी पड़ेगी। बीसियों सांसद खड़े हुये थे। ग्यारह बारह सांसदों को निलंबित किया गया। अखिल भारतीय किसान सभा के सहसचिव के के रागेश तथा एलमारम करीम राज्यसभा के सदस्य हैं।  उन्हें निलंबित कराया गया क्योंकि वे मतदान करने की मांग कर रहे थे। मतदान नहीं कराया गया क्योंकि आपकी सरकार को यह मालूम था कि यदि मतदान कराया गया तो राज्य सभा में यह कानून पास नहीं हो पायेगा।

पांचवा घोटाला, संवैधानिक ठगी है। कृषिमंत्री और प्रधानमंत्री दोनों ने इन्हें कृषि क़ानून कहा । लेकिन सरकार ने ये कानून कृषि कानून के नाम पर पारित नहीं किये हैं । इन्हे व्यापार के कानूनों के तौर पर पारित किया गया है। कृषि के मामले में कानून बनाने का अधिकार प्रदेश की सरकारों को है । भारत के संविधान निर्माताओं ने बहुत ही समझदारी के साथ कामों का बंटवारा किया था कि किन चीजों पर राज्य कानून बनायेंगे। किन चीजों पर केंद्र सरकार कानून बनायेगी। और वो ऐसे कौन से विषय होंगे जिन विषयों पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं। नरेंद्र मोदी की सरकार को ये अधिकार ही नहीं है कि वह कृषि के संबंध में कानून बना पाये।

छठवां घोटाला कृषि उपज मंडियों के खात्मे और उनके “खत्म न होने का सरकारी दावा” है। ऐसा करके एक तरह सरकार ने माना है कि किसानों के लिए मंडियाँ जरूरी हैं। मगर क्या सचमुच मंडियां खत्म नहीं होंगी। मंडी रहेंगी लेकिन सिर्फ कागज पर ; बीएसएनएल की तरह। लेकिन व्यवहार में नहीं रहेंगी क्योंकि सारा कब्जा जीओ की तरह कारपोरेट के हाथ में होगा। उनको अप्रासंगिक बना दिया जायेगा। स्थानीय स्तर के प्रशासन और राजनैतिक स्तर के गठजोड़ के जरिये उन मंडियों का कोई औचित्य नहीं रहेगा।

सातवां घोटाला यह दावा है कि “अब किसान देश (और दुनिया) के किसी भी इलाके में जाकर अपनी फसल को बेच सकेगा।” अव्वल तो ऐसी कोई रोक थी ही नहीं – उस पर पंद्रह, बीस, पच्चीस किमी पर जो मंडियां होती हैं उन तक ट्रैक्टर ट्रॉली में ले जाकर फसल को बेचने में किसान के पसीने निकल आते हैं।  इस दावे की बाकी असलियत मनोहर लाल खट्टर और शिवराज सिंह चौहान ने अपने बयानों से साफ़ कर दी  जब उन्होने बाकायदा टेलीविजन चैनल्स पर आकर, सरकारी विज्ञप्तियां निकाल कर इस बात की घोषणा की कि हरियाणा में कोई बाहर का किसान अपनी फसल बेचने के लिये आयेगा तो उसे उसकी फसल नहीं बेचने दी जायेगी। शिवराज तो और आगे बढ़े और कहा कि “यदि कोई बाहर का किसान अपनी फसल बेचने के लिये आयेगा तो उसकी ट्रैक्टर ट्रॉली जब्त कर ,उसको जेल में डाल दिया जायेगा।” किसको झांसा दे रहे हैं कृषिमंत्री और प्रधानमंत्री !!

आठवां घोटाला है अध्यादेश का जून में जारी होना, सितंबर में कानून बनना  लेकिन देश भर में अडानी के बड़े बड़े साइलो , मजबूत धातु के कोठी और कुठीले  पहले ही खड़े हो जाना । कोरोना काल में देश के अलग अलग हिस्सों में निश्चित  दूरी के बाद बडे बडे हजारों लाखों टन अनाज को इकट्ठा करने वाले भंडारण के आधुनिक भंडारगृह बना लेना । ये क्या घपला है ? नोटबंदी होती है कुछ लोगों को पहले मालूम  हो जाता है। कुछ खास फैसले होते हैं कुछ लोगों को पहले मालूम हो जाता है। नीति कौन बना रहा है ; सरकार या अडानी ?

इससे भी ज्यादा बड़ा नौवां घोटाला है एपीएमसी की मंडियां बंद होने से  सरकारी खरीद बंद हो जाना। अगर सरकारी खरीद बंद हो जायेगी तो खरीद के बाद जो भंडारण किया जाता है उसकी उपलब्धता समाप्त हो जायेगी। इसका असर तीन तरीके का होगा । देश की पैंसठ प्रतिशत से अधिक जनता जो राशन प्रणाली के जरिये मिलने वाले गेहूं,चावल और खाद्यान्न पर निर्भर रहती है उस पर जिंदा रहती है उसे बांटने के लिए खाद्यान्न कहाँ से आएगा ? सार्वजनिक वितरण प्रणाली पूरी तरह से ठप हो जायेगी क्योंकि सरकार के पास बांटने के लिये अनाज नहीं होगा। सरकार के गोदामों में रखे हुये खाद्यान्न बाजार की कीमतों को रोकने में  एक डिटरेंट- ब्रेक – का काम करते थे। वे नहीं होंगे तब क्या होगा ?

दसवां बड़ा घोटाला है ठेका खेती का कानून। अंग्रेजों के जमाने की नील की खेती को छोड़ दें तो ताजे अनुभव क्या हैं उसके ? उत्तरप्रदेश बिहार के गन्ना किसानों की दुर्गति जाने भी दें तो अभी पंजाब ओर गुजरात के किसानों ने पेप्सिको के लिये जो आलू उगाये थे उसका नतीजा क्या है ? अभी मध्य प्रदेश के होशंगाबाद और पिपरिया ऐसे आठ दस जिलों में जो धान की ठेका खेती करायी गयी थी उसकी हालत क्या है ? ठेका कंपनियों ने उन्हे महंगी कीमत पर बीज दिये, महंगी कीमत पर खाद दिया,कीटनाशक दिये। बाद में टुच्चे बहाने बनाकर उपज नहीं खरीदी और उन्हें लाखों के कर्ज में डुबो दिया।  ठेका खेती के तजुर्बे भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में ये हैं कि अंततः किसान लुटता है, उसकी जमीन उसके हाथ से जाती है। ये केवल घोटाला नहीं है। ये गद्दारी है, विश्वासघात है।

ग्यारहवां घोटाला ये जो कंपनियां आयेंगी हैं वो ठेका खेती से क्या पैदा करेंगी  ? लोगों की थाली के लिये सामान ? गेहूं,दाल, चावल, सब्जियां पैदा करने आयेंगी ? नहीं !! ये अंतर्राष्ट्रीय बाजार के लिये माल उपजायेंगी।  फिर खाद्यान्न सुरक्षा का क्या होगा ?

बारहवां घोटाला 1955 के आवश्यक वस्तु कानून का खात्मा है। यह क़ानून जीवनोपयोगी वस्तुओं की कालाबाजारी रोकने के लिये था। मुनाफाखोरी और कालाबाजारी की जड़ है जमाखोरी करके बाजार में नकली कमी पैदा कर देना। अभी कोरोना काल में लोग देख चुके हैं कि सामान्य जरूरत की चीजों की कीमतें कितनी ज्यादा हो गयी थीं। अभी अभी आलू और प्याज की बेवजह महंगाई और इन दिनों खाने के तेल की आकाश छूती कीमतें इसी का परिणाम है। 

तेरहवां घोटाला है किसानों से अदालत जाने के अधिकार को छीनना। यह देश का पहला कानून है जिसमें कारपोरेट कंपनियों की इस कदर हिमायत की गयी  है कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत को भी समाप्त कर दिया। इस देश का संविधान गारंटी देता है कि हर व्यक्ति को , यहां तक कि जो भारत का नागरिक नहीं है उसे भी,  अपने खिलाफ हुये अन्याय के विरोध में न्याय पालिका से लेकर सर्वोच्च न्याय पालिका तक जाने का अधिकार होगा। अडानी-अम्बानी और अमरीकी कार्पोरेट्स के लिए मोदी सरकार ने उसको ही समाप्त कर दिया है।

घोटाले तो अनेक हैं। इन सबको गिनाने के लिए यह स्थान कम पड़ जाएगा।  इसमें सबसे बड़ा महा घोटाला है सरकार – भाजपा – संघ और उनके पालतू मीडिया का किसानों के प्रति आपराधिक रवैया ; 75 से ज्यादा दिन से दिल्ली बॉर्डर्स पर देश को बचाने के लिये, देश की खेती को कारपोरेट और विदेशी कंपनियों के कब्जे से बचाने के लिये बैठे देशभक्त किसानों को खालिस्तानी, पाकिस्तानी, देशद्रोही कहना। इस दौरान 208 किसानों की शहादत के बाद भी बजाय हमदर्दी या संवेदना के उन्हें लाठीचार्ज , आंसू गैस के गोलो ,  पानी की बौछारों का शिकार बनाना। उन्हें तेरह लेयर की बाड़ों,  कंटीले तारों , सड़कों पर ठोंकी गयी कीलों से अपमानित और लांछित करना । संसद में खिलखिलाते हुए उनका मजाक उड़ाना। एक लोकतांत्रिक देश में प्रतिरोध की लोकतांत्रिक आवाज को कुचलने के लिये उसके साथ दुश्मन राष्ट्र जैसा बर्ताव करना। किसानों से जिन शब्दों मे सरकार बात कर रही वह केवल असभ्यता नहीं है, ये केवल निमर्मता या बर्बरता नहीं है ये धूर्तता की सर्वोच्चता है।

जाहिर है कारपोरेट की खुद की अपनी सरकार तो झूठ बोलना बंद नहीं करेगी – इन झूठों का एक ही प्रत्युत्तर हो सकता है और वह यह है कि सच को गाँव और बस्ती तक ले जाया जाए। लड़ाई को और तेज किया जाए।

(लेखक अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं।)

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