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सोने का अंडा देने वाली मुर्गी एलआईसी को जबा करने की तैयारी

नए साल में एलआईसी फिर एक बार मुश्किलों में घिरी नजर आ रही है। मार्केट के बड़े-बड़े डिफॉल्टरों जैसे अनिल अंबानी की कंपनियों और डीएचएफएल के डूबने का असर एलआईसी पर अब दिखने लगा है।

एलआईसी ने मार्च में खत्म हुए वित्त वर्ष के लिए दिक्कत की आशंका वाले एसेट्स के लिए प्रोविजनिंग की राशि को 18 हजार,195 करोड़ रुपये से 30 प्रतिशत बढ़ाकर 23 हजार 760 करोड़ रुपये कर दिया है। मतलब साफ है कि उसने जितना अनुमान लगाया था उससे कहीं अधिक घाटा होने जा रहा है।

इससे पहले भी यह खबर आई थी कि एलआईसी ने ऐसी कई कंपनियों में निवेश किया है, जो ‘दिवालिया’ होने के कगार पर हैं। इन कंपनियों की याचिका राष्ट्रीय कंपनी कानून ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) द्वारा दिवालियापन की प्रक्रिया के तहत स्वीकार कर ली गई है। इस सूची में आलोक इंडस्ट्रीज, एबीजी शिपयार्ड, अम्टेक ऑटो, मंधाना इंडस्ट्रीज, जेपी इंफ्राटेक, ज्योति स्ट्रक्चर्स, रेनबो पेपर्स और ऑर्किड फार्मा जैसे नाम शामिल हैं।

एलआईसी देश की सबसे बड़ी बीमा कंपनी होने के साथ-साथ मार्केट का सबसे बड़ा घरेलू निवेशक भी है। एलआईसी के पास सालाना करीब तीन लाख करोड़ रुपये का प्रीमियम जमा होता है। देश के करोड़ों लोगों की गाढ़ी कमाई के बल पर लाखों करोड़ रुपये के मोटे भंडार पर बैठी भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) का इस्तेमाल दुधारू गाय की तरह होता रहा है। एलआईसी लंबे समय से सरकार के लिए ‘सोने का अंडा देने वाली मुर्गी’ रही है।

पहले भी UPA की सरकार एलआईसी के फंड का मनमाना इस्तेमाल करती आई है, लेकिन मोदी सरकार ने तो पिछले साढ़े पांच सालों में सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। साल 2014 में इसने भेल की बड़ी हिस्सेदारी खरीदकर सरकार को राहत पहुंचाई। साल 2015 में कोल इंडिया के विनिवेश से सरकार ने 22 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा जुटाने का लक्ष्य रखा था, एलआईसी ने इसकी भी 7,000 करोड़ की हिस्सेदारी खरीदकर सरकार को राहत दी।

2016 में जब इंडियन ऑयल का विनिवेश फ्लॉप होता दिख रहा था तब एलआईसी ने इसमें 8,000 करोड़ रुपये का निवेश किया। साल 2017 में न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी और जनरल इंश्योरेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया का सरकार ने जब विनिवेश किया तो एलआईसी ने इनमें करीब 13,000 करोड़ रुपये का निवेश किया। मार्च 2018 में जब हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स का विनिवेश ऑफर आया तो एलआईसी ने 2,900 करोड़ के निवेश से इस ऑफर का 70 फीसदी हिस्सा खरीद लिया।

साल 2018-19 में सरकारी बैंकों में सबसे बदतर खराब लोन का रेश्यो वाले IDBI बैंक को सरकार ने एलआईसी के गले लटका दिया। एलआईसी अकेले आईडीबीआई के शेयर नहीं खरीद सकती थी। उस पर किसी एक कंपनी में अधिकतम 15 फीसदी शेयर खरीदने की शर्त लागू थी और एलआईसी के पास आईडीबीआई के 10.82 प्रतिशत हिस्सेदारी पहले से ही थी इसके बावजूद एलआईसी ने इस बैंक को बचाने के लिए इसकी 51 फीसदी हिस्सेदारी खरीदी।

एलआईसी ने इस अधिग्रहण के तहत 28 दिसंबर को आईडीबीआई बैंक में 14,500 करोड़ रुपये डाले थे। उसके बाद 21 जनवरी को उसने बैंक में 5,030 करोड़ रुपये और डाले, लेकिन इससे भी मोदी सरकार का मन नहीं भरा है। अक्टूबर 2019 में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने रीयल एस्टेट सेक्टर के लिए बड़ी राहत का एलान किया है। उन्होंने कहा कि देश भर में अटके हाउसिंग प्रोजेक्ट के लिए 15 हजार करोड़ रुपये का फण्ड LIC और SBI द्वारा मिलकर दिया जाएगा। अब यह भी चर्चा है कि 60 हजार के कर्ज में डूबे एयर इंडिया का भी एलआईसी के द्वारा ही उद्धार किया जाएगा।

यानी साफ है 2020 में एलआईसी की वित्तीय स्थिति और भी खराब होने की आशंका है। एलआईसी में देश की अधिकांश जनता की जमा-पूंजी है और वह प्रतिवर्ष अपनी बचत से हजारों-लाखों रुपये निकालकर एलआईसी की पॉलिसी में डालता है। इस पैसे के सहारे उसका और उसके परिवार का भविष्य सुरक्षित रहता हैय़ अब यह पूंजी ही इन डूबती हुई कंपनियों को बचाने के लिए स्वाहा की जा रही है।

(गिरीश मालवीय स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और आजकल इंदौर में रहते हैं।)

This post was last modified on January 1, 2020 8:33 pm

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