Thursday, March 23, 2023

झारखंड: प्रशासनिक संरक्षण में वन भूमि की लूट, कंपनी ने किया 500 एकड़ पर अवैध कब्जा

विशद कुमार
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वन संरक्षण अधिनियम के तहत वन विभाग द्वारा चिन्हित एवं अधिसूचित भूमि पर किसी तरह का निर्माण नहीं किया जा सकता है। यदि राज्य सरकार को भी किसी विशिष्ट परियोजना के लिए ऐसी जमीन की जरूरत होगी तो उसे वन भूमि के अपयोजन की अनुमति भारत सरकार से लेनी होगी। लेकिन, इस कम्पनी ने भारत सरकार के वन संरक्षण अधिनियम का खुला उल्लंघन किया है।

झारखंड में प्रशासनिक संरक्षण में वन भूमि की लूट किस तरह हो रही है, इसका जीता-जागता प्रमाण है बोकारो जिले के चंदनकियारी प्रखंड स्थित सियालजोरी में संचालित वेदांता-इलेक्ट्रोस्टील कारखाना, जिसकी बुनियाद ही सरकार द्वारा चिन्हित व अधिसूचित वन-भूमि पर खड़ी है।

प्रशासनिक संरक्षण में इस कारखाने का निर्माण वन विभाग की 104 एकड़ चिन्हित एवं अधिसूचित (डिमार्केटेड एण्ड नोटिफायड) भूमि पर किया गया। इसके अलावा इस कम्पनी ने वन विभाग की लगभग 500 एकड़ जमीन पर अवैध रूप से कब्जा कर रखा है।

लेकिन, दुर्भाग्यपूर्ण यह कि वन विभाग लाख कोशिशों के बाद भी इसे बचाने में विफल रहा है। जानकार बताते हैं कि अब इस कम्पनी द्वारा वन विभाग की उक्त जमीन को अपने नाम हस्तांतरित करवाने के प्रयास जारी है। अगर इस पूरे मामले की सीबीआई जांच करायी जाय तो बड़े घोटाले का न सिर्फ पर्दाफाश होगा, बल्कि अरबों रुपये मूल्य की सरकारी सम्पत्ति को लूटने व लुटवाने वाले लोग बेनकाब होकर कानून के शिकंजे में होंगे।

वेदांता-इलेक्ट्रो स्टील प्लांट की मौजूदा स्थिति से अवगत कराने से पहले यह बताना जरूरी हो जाता है कि इसकी नींव इलेक्ट्रो स्टील कंपनी के नाम से लगभग 2005-2006 में रखी गई थी।

बता दें कि कंपनी ने सैकड़ों की संख्या में चीनी नागरिकता वाले कारीगरों, इंजीनियरों व तकनीशियनों की मदद से और भारी-भारी मशीनों का उपयोग कर महज कुछ ही घंटों में वन भूमि की प्रकृति ही बदल दी।

यह काम वर्ष 2008-09 में हुआ, जब इलेक्ट्रो स्टील कम्पनी के पास इस कारखाने का सम्पू्र्ण स्वामित्व था। परन्तु बाद के दिनों में परिस्थितिवश इलेक्ट्रो स्टील ने इसे वेदांता ग्रुप के हाथों बेच दिया और वेदांता ग्रुप ने इसका नाम वेदांता-इलेक्ट्रो स्टील कर दिया।

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वेदांता-इलेक्ट्रो स्टील प्लांट

जानकार बताते हैं कि वन संरक्षण अधिनियम के तहत वन विभाग द्वारा चिन्हित एवं अधिसूचित भूमि पर किसी तरह का निर्माण नहीं किया जा सकता है। यदि राज्य सरकार को भी किसी विशिष्ट परियोजना के लिए ऐसी जमीन की जरूरत होगी तो उसे वन भूमि के अपयोजन की अनुमति भारत सरकार से लेनी होगी। लेकिन, इस कम्पनी ने भारत सरकार के वन संरक्षण अधिनियम का खुला उल्लंघन किया है।

दरअसल, झारखंड में सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत से वन भूमि की हो रही खुली लूट के एक मामले में सुनवाई करते हुए लगभग तीन माह पूर्व झारखंड हाईकोर्ट ने हेमंत सरकार की बखिया उधेड़ दी थी। नवम्बर 2022 के प्रथम सप्ताह में झारखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस डॉ रवि रंजन व जस्टिस एस एन प्रसाद की खंडपीठ में राज्य में वन भूमि पर अतिक्रमण करने को लेकर दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई हुई थी।

सुनवाई के दौरान अदालत ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि- ऐसा प्रतीत होता है कि अधिकारियों ने मिलीभगत कर वन भूमि को बेच दी है। इसलिए मामले की जांच सीबीआई से कराई जाएगी। सरकार ने जवाब देने का मौका मांगा।

झारखंड सरकार की ओर से तीन सप्ताह का समय दिए जाने की मांग की जा रही थी, लेकिन अदालत ने कहा कि कोर्ट इतना समय नहीं दे सकती है। सरकार के बार-बार आग्रह करने के बाद अदालत ने दो सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।

हालांकि, सरकार ने हाईकोर्ट में क्या जवाब दिया, इस बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं मिल सकी है। लेकिन, इतना तो तय है कि वन भूमि की लूट पर हाईकोर्ट भी राज्य सरकार से सख्त नाराज है।

मालूम को कि इस संबंध में आनंद कुमार ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की है। याचिका में कहा गया है कि राज्य के विभिन्न वन प्रमंडलों की पचास हजार हेक्टेयर वन भूमि पर अतिक्रमण किया गया है। कुछ जगहों पर अधिकारियों की मिलीभगत से वन भूमि बेच दी गई है।

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झारखंड हाईकोर्ट

वेदांता-इलेक्ट्रोस्टील कारख्राना के अवैध वनभूमि पर खड़ा होने को लेकर अब कंपनी के अफसर भी कुछ बोलने को शायद तैयार नहीं हैं।

रैयतों की जमीन तो ली लेकिन रोजगार सबको नहीं दिया

अब आते हैं रैयतों की परेशानियों की ओर, जिसने इस प्लांट को स्थापित करने के लिए अपनी कृषि योग्य जमीन को दिया हुआ है। इस जमीन को जमीन दलालों एवं भू-माफियाओं के द्वारा लिया गया है। जिस वक्त इस जमीन को लिया जा रहा था, उस वक्त यहां के लोगों को 350 से 850 रुपये प्रति डिसमिल की कीमत पर भुगतान किया गया था।

इस प्लांट को स्थापित करने के लिए जिन गांव के लोगों ने जमीन दी है उनमें भागाबांध, मोदीडीह, चंदाहा, कुमारटाड़, सियालजोरी, अलकुसा, गिद्ध टाड़, भंडारीबांध, मोहाल, तेतुलिया इत्यादि गांव शामिल हैं। इन गांवों के लोगों ने इस आशा एवं विश्वास के साथ जमीन दी थी कि यहां के लोगों को नौकरी एवं रोजगार दिया जाएगा।

लेकिन 20% जमीन दाताओं को ही रोजगार दिया गया है, बाकी 80 फ़ीसद रैयतों को अभी तक रोजगार नहीं दिया गया है और आज स्थिति यह है कि प्रभावित गांव के लोगों को आधार कार्ड देखते ही उनके पेपर को डस्टबिन फेंक दिया जाता है।

रैयतों का 350 से 850 रुपये प्रति डिसमिल की दर से जमीन का जो मुआवजा बनता था, उसे भी पूरी तरह से भुगतान नहीं किया है, रैयत आज भी प्लांट का चक्कर लगा रहे हैं।

दूसरी तरफ कंपनी ने वन विभाग की करीब 400 से 500 एकड़ जमीन पर अपना प्लांट स्थापित कर लिया है और कुछ एकड़ कब्जा करके रखा हुआ है।

बोकारो जिले के चास मुफस्सिल थाना अंतर्गत अलकुसा गांव के निवासी व सामाजिक कार्यकर्ता सनाउल अंसारी बताते हैं कि मेरे ही सामने वन विभाग के लोगों पर कंपनी ने हमला करते हुए जमीन पर कब्जा किया था, परंतु अभी तक कंपनी पर किसी भी प्रकार की कोई कार्रवाई नहीं हुई है, इसकी जांच होनी चाहिए।

वे आगे बताते हैं कि बांधडीह रेलवे साइडिंग में जिसमें रॉ-मेटेरियल की ढुलाई ईएसएल वेदांता के द्वारा बड़े वाहनों से की जाती है, जिसमें ओवरलोड की शिकायत उपायुक्त एवं आरटीओ से कई बार की गई फिर भी ओवरलोड कम नहीं हुआ। इसके कारण प्रदूषण भी बहुत फैलता है, पेड़ पौधे पूरी तरह काली गंदगी से भरे हुए हैं।

रोड के किनारे जो भी मकान हैं, उनके भी रंग  काले हो गए हैं। जिस कारण यहां रहने वाले लोग टीबी, दमा सहित कई सांस की बीमारियों को झेलने को मजबूर हैं। इन बीमारियों के कारण बांधडीह गांव के दो से तीन लोगों की मौत हो भी हो चुकी है।

रेलवे साइडिंग में लगभग 600 से 800 मजदूर कार्य करते हैं, परंतु इन मजदूरों को ना ही पीएफ और ना ही ईएसआई का कोई लाभ मिल पाता है। इस विषय पर लगभग सात आठ बार आंदोलन भी किया गया। परंतु अभी तक मजदूरों का पीएफ एवं ईएसआई की व्यवस्था नहीं की गई है। जिस वजह से यहां के मजदूरों को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

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प्लांट में कार्यरत मजदूर

कारखाने में सेफ्टी सिस्टम बेकार

वहीं रेलवे साइडिंग में सेफ्टी की भी सुविधा नहीं रखी जाती है, जिसके कारण कई बार दुर्घटना हो चुकी है। बताना जरूरी हो जाता है कि प्लांट के अंदर सेफ्टी का कोई भी इन्तजाम नहीं रखा गया है, जिस कारण ऑक्सीजन प्लांट में वर्ष 2017-18 के बीच एक विस्फोट हुआ था जिसमें कई मजदूर घायल हुए थे।

इस विस्फोट का नतीजा यह रहा कि विस्फोट का जो मलबा निकला वह मलबा भागाबांध गांव के घरों में पूरी तरह से घुस गया था। एक तरह से भागाबांध गांव प्लांट की चहारदीवारी में कैद है। अतः कभी भी गांव के लोगों को कोई बड़ी दुर्घटना होने पर अपनी जान गंवानी पड़ सकती है। 2 वर्ष के भीतर यहां विभिन्न दुर्घटनाओं में 8 से 15 लोगों की मौत हो चुकी है।

2020 से 21 के बीच यहां बीएफ 2 ब्लास्ट फर्नेस टू में एक लिफ्ट में दुर्घटना होने के कारण तीन लोगों की घटनास्थल पर ही मौत हो गई थी।

करीब 2 से 3 माह पूर्व प्लांट के अंदर 220 केवीए एमआरएसएस साइडिंग में बिजली के शार्ट सर्किट के कारण बहुत बड़ा विस्फोट हुआ, जिसमें लगभग 10 से 15 लोगों की मौत हुई थी। जबकि प्रशासनिक एवं कंपनी के आंकड़ों के हिसाब से 3 लोगों को मृत घोषित किया गया था। इसी तरह आए दिन प्लांट के भीतर भी छोटी बड़ी दुर्घटना होती रहती है।

अधिकारियों के द्वारा जबरन मजदूरों को काम करवाया जाता है और मना करने पर प्लांट से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है, जिसकी वजह से मजदूर भी बंधुआ मजदूर की तरह कार्य कर रहे हैं। यह जांच का विषय है मगर प्रशासनिक मिलीभगत से सबकुछ हो रहा है।

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प्लांट में कार्यरत मजदूर

चास-चन्दनकियारी के एक समाजसेवी कुमार राजेश बताते हैं कि वेदान्ता इलेक्ट्रो स्टील ने सरकारी सांठगांठ करके अपनी हेकड़ी इस तरह से जमा ली है कि कोई भी कानून या सरकारी संस्था उसके लिए मायने नहीं रखती है। वन, श्रम विभाग और प्रदूषण नियमों को हमेशा ठेंगा दिखाना इसकी परिपाटी है।

लगातार सुरक्षा मानकों की अवहेलना के कारण आए दिन दुर्घटना होना आम बात है। सुरक्षाकर्मी लोकल गुंडे का किरदार निभाने के लिए रखे गये हैं, जिनका काम स्थानीय लोगों को आतंकित करना रह गया है। बेतरतीब ढंग से ट्रैफिक संचालन और माल ढुलाई के कारण सड़क दुर्घटना का होना आम है। कारखाने में सेफ्टी का कोई इन्तजाम नहीं है।

(झारखंड से विशद कुमार की ग्राउंड रिपोर्ट)

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