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प्रशासन में अविश्वास को बढ़ाने का काम करेगा लव जिहाद कानून

गत वर्ष अगस्त महीने में फरीदाबाद, हरियाणा के डीसीपी विक्रम कपूर ने मातहत इंस्पेक्टर के ब्लैकमेल से तंग आकर सर्विस रिवाल्वर से खुद को गोली मार ली थी। पुलिस ने खुंदक में एक स्थानीय अख़बार के संपादक का नाम भी एफ़आईआर में शामिल करा दिया। आरोपी की तलाश में पुलिस उस अखबार में बतौर इंटर्न काम कर रहे और इग्नू से पत्रकारिता का डिप्लोमा करने वाले छात्र तक जा पहुंची। उसके फोन को खंगालने पर पुलिस टीम को हिंदू इंटर्न की मुस्लिम महिला मित्र का संदर्भ मिला। हालांकि इस रास्ते पुलिस वाले आरोपी तक तो नहीं पहुंच सके, लेकिन उनमें से कई ने इंटर्न को एक मुस्लिम लड़की ‘हासिल’ करने की बधाई देने में देर नहीं की।

प्रस्तावित लव जिहाद कानूनों के सांप्रदायिक और लैंगिक पक्ष से कम हानिकर उनका प्रशासनिक पक्ष नहीं है। 1947 में राजनीतिक स्वतंत्रता हासिल करने के बाद भारतीय समाज ने धर्मों-जातियों में बंटे कलेवर और व्यापक आर्थिक-लैंगिक विषमताओं के बावजूद अगर एक राष्ट्र के रूप में आगे बढ़ना सीख लिया था तो इसमें विरासत में मिली प्रशासनिक अखंडता की बुनियादी भूमिका रही।

राष्ट्रीय एकीकरण के पर्याय सरदार पटेल ने तो संघीय ढांचे में भी औपनिवेशिक प्रशासन की अखिल भारतीय सेवाओं को जारी रखने की जोरदार वकालत करते हुए इन्हें देश के ‘स्टील फ्रेम’ का दर्जा दिया था। दूसरी तरफ, पटेल को आदर्श मानने वाली भाजपा सरकार के 2019 में लाए नागरिकता संशोधन विधेयक ने समाज के एक हिस्से में प्रशासनिक अविश्वास की जमीन पुख्ता की जिस पर अब लव जिहाद का क़ानूनी बीज रोपने की तैयारी है।

इस हफ्ते लव जिहाद के मोर्चे पर बहुत कुछ हुआ है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की खंड पीठ ने लव जिहाद की एक एफआईआर ख़ारिज करते हुए संवैधानिक स्थापना दी कि उनके समक्ष मुस्लिम लड़का और हिंदू लड़की नहीं बल्कि दो वयस्क नागरिक हैं, जो अपनी मर्जी से साथ रहना चाहते हैं। संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत यह उनके जीवन के मूलभूत अधिकार का हिस्सा है। तुरंत बाद प्रदेश की योगी कैबिनेट ने एक अध्यादेश को मंजूरी दे दी, जिससे विवाह द्वारा एक धर्म से दूसरे धर्म में किया गया परिवर्तन गैरक़ानूनी होगा। लिहाजा, मुस्लिम रीति रिवाज या आर्य समाज पद्धति में वैध विवाह की पूर्व शर्त के रूप में धर्म परिवर्तन की अनिवार्यता होने से हिन्दू-मुस्लिम अंतर्धार्मिक विवाह पर स्वतः रोक लग जाएगी।

निश्चित ही ऐसे जोड़े सिविल मैरिज एक्ट के अंतर्गत अब भी अदालती विवाह कर सकते हैं। ऐसे में उनकी संतानों को भारतीय उत्तराधिकार कानून में सामान उत्तराधिकार का हक़ भी होगा, लेकिन अदालती विवाह इतनी सार्वजनिक और समय लेने वाली प्रक्रिया है कि छिप-छिपाकर प्रेम विवाह करने वाले जोड़ों के लिए सामाजिक दबाव से बच पाना प्रायः संभव नहीं रह पाता। जो सरकारें लव जिहाद के नाम पर अंतर्धार्मिक विवाहों को रोकने का कानून बना रही हैं, स्वाभाविक है कि उनकी प्रशासनिक मशीनरी इन जोड़ों के रास्ते में हर तरह के रोड़े अटकाएगी ही।

हम लव जिहाद के जिस कुएं में जी रहे हैं, अपने व्यक्तिगत उदाहरण से बताना चाहूंगा। 2012 में मेरी बेटी ने फ्लोरिडा, अमेरिका में अंतर्धार्मिक विवाह किया। दोनों दूल्हा-दुल्हन अमेरिका में पढ़ते थे, लेकिन वहां के नागरिक नहीं थे। दोनों ने विवाह के लिए अपने को ऑनलाइन रजिस्टर कराया था और दिए गए दिन-समय पर हम सभी विवाह क्लर्क के सामने थे। 20 मिनट और 20 डॉलर लगे पूरी प्रक्रिया संपन्न होने में और विवाह का सर्टिफिकेट पाने में। विवाह क्लर्क स्वयं विवाह की गवाह बनी, उन्होंने हमें चंद तस्वीरें भी उतार कर दीं।

अपने 35 वर्ष के पुलिस जीवन में मुझे हरियाणा में लव जिहाद का एक भी उदाहरण नहीं मिला। यानी, संगठित रूप से धर्म परिवर्तन कराने के लिए प्रेम या विवाह को माध्यम बनाने का। हां, प्रेम विवाह करने के लिए व्यक्तिगत धर्म परिवर्तन के उदाहरण जरूर दिखे, जिनमें प्रेम मुख्य तत्व था और धर्म परिवर्तन गौण। इस सितंबर में हुआ बल्लभगढ़, फरीदाबाद का निकिता कांड, जैसा कि पुलिस जांच से भी सिद्ध हुआ, एक नृशंस्य हत्या थी, न कि किसी लव जिहादी साजिश का नमूना।

हरियाणा खाप हत्याओं के लिए बदनाम प्रदेश रहा है। पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट में ऐसी याचिकाओं का तांता लगा रहता है, जिनमें मनपसंद शादी करने वाले हिंदू जोड़ों द्वारा खाप प्रकोप से अपनी रक्षा की गुहार की गी होती है। हरियाणा सरकार के शेल्टर होम आये दिन ऐसे कितने ही जोड़ों की शरणस्थली बनते हैं। ऐसे में इसे कैसे समझें कि उत्तर प्रदेश की ही तरह हरियाणा सरकार भी स्त्री सशक्तीकरण के नाम पर लव जिहाद विरोधी कानून की तैयारी में है, जबकि उन्हें खाप हिंसा विरोधी कानून बनाना चाहिए।

लड़कियों की सुरक्षा को लेकर प्रधानमंत्री मोदी के फ्लैगशिप कार्यक्रम ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ की 2015 में हरियाणा की धरती से ही शुरुआत हुई थी। तब भी, लिंग अनुपात की जमीनी स्थिति यह है कि प्रदेश के तमाम गांवों में उत्तर पूर्व, बंगाल, बिहार, ओडिशा, नेपाल, बांग्लादेश से क्रय की हुई पत्नियां मिलेंगी। यानी, राज्य में एक तरह से मानव तस्करी को एक सर्व-स्वीकृत विवाह प्रणाली की मान्यता मिली हुई है। कानून की यहां जरूरत है।

बिना आंकड़ों और अध्ययन के लव जिहाद को एक अतिवादी राष्ट्रीय अपराध के रूप में स्थापित करने की राजनीतिक मुहिम को हवा देने के नतीजे क्या होंगे? इस माहौल के गहराने से देश की प्रशासनिक अखंडता का क्या बनेगा? नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों में लव जिहाद नाम के किसी अपराध का जिक्र तक नहीं। स्वयं मोदी सरकार संसद में इसके अस्तित्व से इनकार कर चुकी है। सर्वोच्च न्यायलय ने 2016-18 के अखिला-अतिया प्रकरण की सुनवाई के दौरान केंद्र की आतंक विरोधी जांच एजेंसी एनआईए द्वारा केरल में छान-बीन कराई थी, लेकिन उसे लव जिहाद जैसी परिघटना का अस्तित्व नहीं मिला।

यह अतिवाद की भू-राजनीति का भी युग है। बाह्य अतिवाद और आंतरिक अतिवाद दोनों भारत के मुस्लिम समाज पर भी उसी तरह हावी होना चाहते हैं, जैसे किसी अन्य समुदाय पर। बाह्य अतिवाद मुस्लिम समाज के इस दौर को ‘इस्लाम का संकट’ बताता है और आंतरिक अतिवाद इसे ‘इस्लाम खतरे में’ के नजरिये से पेश करना चाहता है। ऐसे में लव जिहाद का हौव्वा खड़ा करना मुस्लिम समाज में प्रशासन के प्रति अविश्वास को ही बढ़ाएगा।

(विकास नारायण राय हैदराबाद पुलिस एकेडमी के डायरेक्टर रह चुके हैं।)

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This post was last modified on November 29, 2020 9:22 pm

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