Saturday, November 27, 2021

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‘लव जिहाद’ अध्यादेश मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट नहीं होगा ट्रांसफर

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कथित लव जेहाद अध्यादेश यानी धर्मांतरण अध्यादेश पर उत्तर प्रदेश सरकार को उच्चतम न्यायालय से जोर का झटका लगा है। चीफ जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस वी रामासुब्रमण्यन की पीठ ने सोमवार को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा धर्म परिवर्तन के खिलाफ लाए गए उस अध्यादेश के खिलाफ इलाहाबाद हाई कोर्ट में दायर याचिकाओं को अपने पास ट्रांसफर करने से इनकार कर दिया, जिसमें अन्य बातों के अलावा, शादी के लिए धार्मिक रूपांतरणों का अपराधीकरण किया गया है। पीठ ने कहा कि अगर इलाहाबाद हाई कोर्ट मामलों को तय करने जा रहा है, तो हमें क्यों हस्तक्षेप करना चाहिए?

पीठ ने सख्त टिप्पणी की कि हमने नोटिस जारी किया है, इसका मतलब यह नहीं है कि इलाहाबाद हाई कोर्ट निर्णय नहीं ले सकता है। लोग इन दिनों हाई कोर्टों को हल्के में ले रहे हैं। हाई कोर्ट एक संवैधानिक न्यायालय है। पीठ ने कहा कि हाई कोर्ट इस मामले पर गौर कर रहा है तो हम किस आधार पर उसे यहां ट्रांसफर करें और हम चाहेंगे कि हाई कोर्ट इस पर फैसला दे।

सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल पीएस नरसिम्हा ने हाई कोर्ट और उच्चतम न्यायालय के समक्ष कार्यवाही की बहुलता से बचने के लिए स्थानांतरण आवेदन की अनुमति देने के लिए उच्चतम न्यायालय से आग्रह किया था। इसी तरह की याचिकाएं उच्च न्यायालयों में लंबित हैं। हाई कोर्ट ने 2 फरवरी को मामले को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है।

योगी-आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली यूपी सरकार ने इलाहाबाद हाई कोर्ट से उच्चतम न्यायालय में लंबित याचिकाओं के हस्तांतरण के लिए संविधान के अनुच्छेद 139 ए के तहत एक आवेदन दायर किया था। याचिका में कहा गया था कि शामिल किया गया प्रश्न इस माननीय न्यायालय के समक्ष लंबित रिट याचिकाओं के समान है। उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित कार्यवाही और इन में परस्पर विरोधी निर्णयों की बहुलता होगी और इसलिए कृपया इसे उच्चतम न्यायालय में स्थानांतरित कर सकते हैं।

उच्चतम न्यायालय ने 6 जनवरी को यूपी और उत्तराखंड सरकारों की ओर से विवाह के लिए धर्म परिवर्तन के खिलाफ अध्यादेशों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर नोटिस जारी किया था। पीठ ने हाई कोर्ट के पास इस मुद्दे को देखते हुए उन पर सुनवाई करने के लिए प्रारंभिक अनिच्छा व्यक्त की थी, याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ताओं द्वारा किए गए अनुरोध पर, पीठ ने नोटिस जारी करने के लिए सहमति व्यक्त की, लेकिन कानूनों पर रोक लगाने से इनकार कर दिया।

इस बीच, उत्तर प्रदेश सरकार ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष अपना जवाबी हलफनामा दायर किया और मुख्य न्यायाधीश गोविंद माथुर से अनुरोध किया कि वे मामले को स्थगित कर दें। अतिरिक्त महाधिवक्ता मनीष गोयल ने कहा कि चूंकि उच्चतम न्यायालय ने पहले ही मामले का संज्ञान लिया है और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है, इसलिए हाई कोर्ट के लिए सुनवाई जारी रखना उचित नहीं हो सकता है।

दरअसल हाई कोर्ट में विचाराधीन याचिकाओं में धर्मांतरण विरोधी कानून को संविधान के खिलाफ और गैरजरूरी बताते हुए चुनौती दी गई है। याची का कहना है कि यह कानून व्यक्ति की निजी पसंद और शर्तों पर व्यक्ति के साथ रहने और मत अपनाने के मूल अधिकारों के विपरीत है। यह निजी स्वतंत्रता के अधिकार का हनन करता है। इसे रद किया जाए। इस कानून का दुरुपयोग किया जा सकता है।

राज्य सरकार की तरफ से कहा गया कि शादी के लिए धर्म परिवर्तन से कानून व्यवस्था की स्थिति खराब न हो इसके लिए कानून लाया गया है, जो पूरी तरह से संविधान सम्मत है। इससे किसी के मूल अधिकारों का हनन नहीं होता, वरन नागरिक अधिकारों को संरक्षण प्रदान किया गया है। इससे छल-छद्म के जरिये धर्मांतरण पर रोक लगाने की व्यवस्था की गई है।

उच्चतम न्यायालय में योगी आदित्यनाथ सरकार की ओर से धर्मांतरण कानून लागू होने के मामले में दाखिल याचिका पर आज सुनवाई को देखते हुए चीफ जस्टिस गोविंद माथुर तथा जस्टिस एसएस शमशेरी की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई को आज टाल दिया और अब दो फरवरी को केस सुना जाएगा। कई याचिकाओं पर सुनवाई के लिए हाई कोर्ट ने आज यानी 25 जनवरी की तारीख तय की थी।

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने 24 नवंबर को शादी के लिए जबरन या झूठ बोल कर धर्म परिवर्तन करने को लेकर उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश-2020 को मंजूरी दी थी, इसके तहत दोषी व्यक्ति को 10 साल तक की कैद हो सकती है। राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने 28 नवंबर को इस अध्यादेश पर मुहर लगा दी थी।‌‌ इस अध्यादेश के तहत सिर्फ शादी के लिए अगर महिला ने धर्म परिवर्तन किया या कराया गया है, तो वो शादी रद्द कर दी जाएगी। वहीं अगर शादी के बाद धर्म परिवर्तन करना होगा, तो उसके लिए जिला अधिकारी के यहां आवेदन देना होगा।

उत्तराखंड में धार्मिक स्वतंत्रता कानून 2018 में लागू किया गया था। याचिका में कहा गया है कि हाल ही में उत्तर प्रदेश, हरियाणा और मध्य प्रदेश ने विवाह की आड़ में हिंदू युवतियों का धर्म परिवर्तन कराने के कथित प्रयासों पर अंकुश लगाने के लिए कानून बनाने की मंशा जाहिर की थी। इस तरह की गतिविधि को अक्सर लव जेहाद बताया जाता है।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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