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मधु किश्वर ने दी रंजन गोगोई के राज्यसभा में नामज़दगी को चुनौती

राज्यसभा में सरकार द्वारा नामजद होने के बाद जस्टिस रंजन गोगोई आलोचनाओं के केंद्र में हैं। उनके साथी जजों में से जस्टिस मदन बी लोकुर, जस्टिस कुरियन जोसेफ, जस्टिस एपी शाह, जस्टिस मार्कण्डेय काटजू और जस्टिस एके पटनायक जैसे वरिष्ठ जजों ने तो लेख लिख कर सरकार के इस कदम और जस्टिस रंजन गोगोई द्वारा इसे स्वीकार किये जाने के निर्णय की निंदा की है। साथ ही अन्य लोगों ने भी इस मामले में प्रतिकूल प्रतिक्रिया ही व्यक्त की है। पर अब इस नामज़दगी को सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका द्वारा चुनौती दी गयी है।

लीगल वेबसाइट बार एन्ड बेंच के अनुसार मधु पूर्णिमा किश्वर ने इस नामांकन को चुनौती दी है। उन्होंने कहा है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता, संविधान के मूल ढांचे का एक अंग है और यह लोकतंत्र का एक मजबूत और अनिवार्य स्तंभ भी है।

इस याचिका में कहा गया है कि न्यायपालिका की शक्ति, देश के नागरिकों के भरोसे में निहित है। कोई भी ऐसा कदम जो इस भरोसे को क्षीण करता है, नागरिकों के न्यायपालिका में विश्वास को अस्थिर कर देगा। जैसे कि पूर्व सीजेआई जस्टिस रंजन गोगोई का राज्यसभा के लिये नामांकन। यह निर्णय न्यायपालिका की स्वतंत्रता को आहत करेगा क्योंकि इससे नागरिकों का भरोसा इस संस्था से डिगा है।

याचिका में आगे कहा गया है,

अतः इस संदर्भ में यह चिंता व्यक्त की जा रही है कि,

“… his (Gogoi’s) nomination as a Rajya Sabha member by the President of India gives it the colour of a political appointment and therefore casts a shadow of doubt on the credibility of the judgments delivered under his headship of the Supreme Court.”

” उनका ( गोगोईं का) राज्यसभा के लिये किया गया नामांकन, एक राजनीतिक नियुक्ति के रूप में देखा जाएगा, और इससे सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश के पद पर रहते हुए उनके द्वारा दिये गए फैसलों पर संदेह भी उठेगा।”

आगे कहा गया है,

“Justice (Retd.) Ranjan Gogoi’s acceptance of RS nomination is all the more befuddling since he himself pronounced that there is a valid “strong viewpoint” that “post retirement appointment is itself a scar on judicial independence of the judiciary”.”

” जस्टिस (रिटायर्ड) रंजन गोगोई द्वारा राज्यसभा का नामांकन स्वीकार करना, एक प्रकार की विडंबना होगी, क्योंकि उन्होंने खुद ही कहा है कि अवकाश ग्रहण के बाद जजों की किसी पद पर की गयी नियुक्ति, न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर एक धब्बा होगी।”

आगे यह भी लिखा गया है कि, इस नियुक्ति से लोगों को न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर आक्षेप करने के लिये अनावश्यक रूप से अवसर और मसाला मिल जाएगा।

आगे यह भी कहा गया है,

“It has given a handle to the external enemies of India as well as Break Up India Forces within the country to defame and cast aspersions on the highest judiciary of India. This is amply evident from the adverse coverage of this appointment in the national and international media.”

“यह भारत के बाहरी और आंतरिक शत्रुओं को जो देश और न्यायपालिका तथा सुप्रीम कोर्ट को बदनाम कर के नुकसान पहुंचाना चाहते हैं, को एक आधार देगा। यह बात, इस नियुक्ति के बाद, जो प्रतिकूल खबरें देश और दुनिया भर की मीडिया में छप रही हैं को देख और पढ़ कर जाना जा सकता है।”

इसी के साथ याचिकाकर्ता मधु किश्वर द्वारा यह अनुरोध किया गया है कि अदालत इस पर विचार करे और फिलहाल इस पर स्थगनादेश दे ।

यााचिका में आगे कहा गया है कि अदालत,

सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की सेवानिवृत्ति के बाद होने वाली नियुक्तियों पर रोक लगाये, जैसा कि लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम 2013 में लोकपाल और लोकायुक्तों की पुनर्नियुक्ति पर लगाया गया है।

इस याचिका में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के उन अवकाश प्राप्त जजों का भी उल्लेख किया गया है जो राज्यसभा में रिटायर होने के बाद नामांकित हुए हैं या चुने गए हैं।

याचिका के अनुसार,

● सबसे पहले राज्यसभा के लिये नामांकित रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस बहरुल इस्लाम थे, जो जनवरी 1983 में सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हुए थे और जून 1983 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समय में राज्य सभा के लिये नामजद किये गए थे। उस नियुक्ति को न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर एक आघात के रूप में देखा गया था।

● इसके बाद पूर्व सीजेआई जस्टिस रंगनाथ मिश्र राज्य सभा के लिये चुने गए। लेकिन यह एक राजनीतिक दल कांग्रेस पार्टी द्वारा दिये गए टिकट पर चुनाव जीत कर राज्य सभा में पहुंचे थे। लेकिन इस निर्वाचन पर भी न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को लेकर बहस हुई थी और कांग्रेस की आलोचना हुई थी।

अब देखना है सुप्रीम कोर्ट इस याचिका पर क्या कार्यवाही करती है। लेकिन यह बात बिल्कुल सही और युक्तियुक्त है कि जजों को रिटायर होने के बाद कोई भी सरकारी नियुक्ति या राजनीति में नहीं आने देना चाहिए। जहां तक न्यायिक जांच आयोगों की बात है वह एक अलग तरह का दायित्व है अतः उस पर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफ़सर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

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This post was last modified on March 18, 2020 10:27 pm

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