देश के पैमाने पर मनरेगा में बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार और गड़बड़ियां आयीं सामने

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ग्रामीण विकास विभाग के सामाजिक लेखा परीक्षा इकाई (एसएयू) ने पाया है कि पिछले चार सालों में मनरेगा की विभिन्न योजनाओं में 935 करोड़ रुपये की वित्तीय गड़बड़ी हुई है। 

उपरोक्त जानकारी अंग्रेज़ी अख़बार ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने ग्रामीण विकास मंत्रालय की प्रबंधन सूचना प्रणाली से ये आंकड़े हासिल किए हैं। 

गौरतलब है कि साल 2017-18 में ये आंकड़े वेबसाइट पर अपलोड होने शुरू हुए। हालांकि वेबसाइट पर मौजूद इन आंकड़ों तक पहुंचना आम आदमी के लिये पहाड़ चढ़ने से कम मुश्किल नहीं है। क्लिक करते ही स्क्रीन पर ‘ नेटवर्क इशू’ प्रकट होकर सारे मंसूबों को धराशायी कर देता है। 

वित्त वर्ष 2017-18 से अब तक सामाजिक लेखा परीक्षा इकाई ने कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की 2.65 लाख ग्राम पंचायतों में पिछले चार सालों में एक बार ज़रूर ऑडिट किया है। इस ऑडिट में कई वित्तीय गड़बड़ियां पाई गई हैं जिसमें रिश्वत, फर्ज़ी लोगों और सामान के लिए फर्ज़ी विक्रेताओं को ऊंचे दामों पर भुगतान करना शामिल है।

इंडियन एक्सप्रेस को प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक अभी तक केवल 12.5 करोड़ रुपये यानी कुल फर्जीवाड़ा की गयी रक़म की महज 1.34 % की ही भरपाई हो पायी है। ये डाटा साल 2017-18 से साल 2020-21 तक का है।

इस संदर्भ में केंद्रीय ग्रामीण विकास सचिव नागेंद्र नाथ सिन्हा ने सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को हाल ही में पत्र लिखकर पूछा है कि राज्य ग्रामीण विकास विभाग में इतनी कम वापसी क्यों हुई है। इंडियन एक्सप्रेस से केंद्रीय ग्रामीण विकास सचिव ने बताया है कि उन्होंने सभी राज्यों को लिखा है। इस पक्ष पर ध्यान ना देना एक मसला है। दूसरा ये कि अनियमितताओं के लिए ज़िम्मेदार व्यक्ति का दोष निर्धारण और एसओपी (स्टैंडर्ड ओपरेटिंग प्रोसीजर) के बिना ये निर्धारित करना आसान नहीं है।”

कब कितनी रक़म जारी किया सरकार ने 

महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के लिये वित्त वर्ष 2017-18 में केंद्र सरकार ने 55,659.93 करोड़ रुपये जारी किए थे और तब से साल दर साल इस राशि में बढ़ोत्तरी ही होती रही है।  और वित्त वर्ष 2020-21 में इस योजना पर ख़र्च 1,10,355.27 करोड़ रुपये पहुंच गया है। 

जबकि इस योजना पर होने वाला कुल खर्च वित्त वर्ष 2017-18 के 63,649.48 करोड़ रुपयों से बढ़कर वित्त वर्ष 2020-21 में 1,11,405.3 करोड़ रुपये हो गया है। 

इन राज्यों में हुयी सबसे ज़्यादा गड़बड़ियां 

तमिलनाडु में सबसे ज़्यादा 245 करोड़ रुपये की वित्तीय गड़बड़ियां पाई गई हैं। इसके अलावा कर्नाटक, बिहार, पश्चिम बंगाल, गुजरात और झारखंड में गड़बड़ियां पायी गयी हैं।  तमिलनाडु और बंगाल को छड़ दें तो अधिकांश राज्यों में पिछले 5-10 सालों में भारतीय जनता पार्टी सत्ता में रही है। 

तमिलनाडु में राज्य भर में 12,525 ग्राम पंचायतों में सबसे अधिक 245 करोड़ रुपये की हेराफेरी हुयी, जिसके लिए 37,527 ऑडिट रिपोर्ट अपलोड की गईं। वसूली 2.07 करोड़ रुपये रही, जो गलत तरीके से खर्च की गई राशि का केवल 0.85% है। एक कर्मचारी को निलंबित कर दिया गया है और दो को बर्खास्त कर दिया गया है, लेकिन एक भी प्राथमिकी दर्ज़ नहीं की गई है।

आंध्र प्रदेश में 12,982 ग्राम पंचायतें हैं, और 31,795 सोशल ऑडिट किये गये और रिपोर्टें अपलोड की गईं। कुल 239.31 करोड़ रुपये की हेराफेरी की गई; वसूली 4.48 करोड़ रुपये (1.88%) की हुयी। 14.74 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया और 10,454 कर्मचारियों को चेतावनी दी गयी। कुल 551 कर्मचारियों को निलंबित कर दिया गया है और 180 कर्मचारियों को बर्खास्त कर दिया गया है। तीन एफआईआर दर्ज़ की गई हैं।

कर्नाटक के 6027 ग्राम पंचायतों में 173.6 करोड़ रुपये की हेराफेरी हुयी है। जिसमें से केवल 1.48 करोड़ रुपये (0.68%) की वसूली हुई है। कुल 22,948 लेखा परीक्षा रिपोर्ट प्रस्तुत की गईं। इस मामले में कर्नाटक में कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं हुयी है और अपने किसी भी कर्मचारी को निलंबित नहीं किया है, भले ही दो कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त कर दी गई हैं।

बिहार में 12.34 करोड़ रुपये की हेराफेरी की गई। वसूली 1,593 रुपये थी।

पश्चिम बंगाल में 2.45 करोड़ रुपये की हेराफेरी की गई और 14,802 रुपये वसूल किए गए। गुजरात में 6,749 रुपये की हेराफेरी की गई, जिसमें से कुछ भी बरामद नहीं हुआ।

झारखंड ने सबसे अधिक प्राथमिकी दर्ज की- पिछले चार वर्षों में देश भर में दर्ज 38 में से 14 झारखंड में दर्ज़ की गयी हैं।  दो कर्मचारियों को निलंबित कर दिया गया और 31 की सेवाएं समाप्त कर दी गईं। हालांकि, 51.29 करोड़ रुपये के गबन में से केवल 1.39 करोड़ रुपये (2.72%) ही वसूल किए गए हैं।

वहीं, केरल, अरुणाचल प्रदेश, गोवा, लद्दाख, अंडमान और निकोबार, लक्षद्वीप, पुदुचेरी, दादर और नागर, दमन और दीव जैसे अपेक्षाकृत छोटे प्रदेशों में मनरेगा में कोई वित्तीय गड़बड़ी नहीं पायी गयी है। इस सूची में राजस्थान का भी नाम है। 

हर 6 महीने में होना चाहिये ऑडिट

वित्त वर्ष 2017-18 से अब तक सामाजिक लेखा परीक्षा इकाई ने कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की 2.65 लाख ग्राम पंचायतों में पिछले चार सालों में एक एक बार ऑडिट किया है। 

जबकि मनरेगा अधिनियम की धारा- 17 ग्राम पंचायतों में सभी कार्यों के सोशल ऑडिट को अनिवार्य करती है। योजना नियमों के ऑडिट को 2011 में अधिसूचित किया गया था, और सामाजिक लेखा परीक्षा के लिए लेखा परीक्षा मानकों को 2016 में अधिसूचित किया गया था। ग्रामीण विकास मंत्रालय ने एक वित्तीय प्रबंधन सूचकांक जारी किया है, जिसमें वित्त के प्रबंधन में राज्यों की दक्षता का आकलन करने के लिए सामाजिक लेखा परीक्षा एक प्रमुख पैरामीटर है। 2011 के नियम कहते हैं कि राज्य सरकार हर छह महीने में एक बार हर ग्राम पंचायत में मनरेगा के तहत किए गए कार्यों के सोशल ऑडिट की सुविधा प्रदान करेगी।

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