ग्राउंड रिपोर्ट: खेत के बाद अब गांव की बारी, कटाव नहीं रुका तो गंगा में समा जाएंगे कई गांव

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यूपी,चंदौली। कर्मनाशा, गंगा और ऊंचे पहाड़ों से तीव्र वेग से उतरती चन्द्रप्रभा आदि नदियों की बाढ़ से समूचा चंदौली जनपद प्रभावित है। बारिश और बाढ़ से हजारों हेक्टेयर की फसलें चौपट हो जाती हैं। बाढ़ के दंश से लाखों किसानों की बदहाली आम बात है। चंदौली जनपद के तीन दर्जन से ज्यादा गांवों के हजारों किसान गंगा नदी के कटान से अपनी अचल पूंजी से हाथ धो रहे हैं। साल दर साल सैकड़ों बीघे उपजाऊ खेत कटान की भेंट चढ़ रहे हैं।

सैकड़ों ऐसे किसान हैं, जिनके खेतों को गंगा ने काटकर उन्हें भूमिहीन बना दिया है। सरकरी दस्तावेजों में इनके खेत मौजूद हैं लेकिन भौतिक रूप में इनके खेत हैं ही नहीं। इनके खेतों को काटने के बाद यहां गंगा की जलधारा बह रही है। इन्हीं धाराओं में डॉल्फिन भी अठखेलियां और जलतरंगों का आनंद लेते दिख जायेंगे।

भूमि कटान से भूमिहीन हुए किसानों को भरण-पोषण के लिए मजदूरी करनी पड़ रही है। वहीं खेतों को खोने के सदमें में किसानों की जान भी जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि खेतों को काटते-काटते गंगा नदी अब उनके गांव से कुछ ही दूरी पर आ पहुंची है। सरकार जल्द ही कुछ करे अन्यथा हमारी बर्बादी तय है।

गंगा कटान से परेशान ग्रामीण

केंद्र व सूबे की डबल-ट्रिपल इंजन की सरकारें किसानों की आय दोगुना करने का दावा भले कर रही हों लेकिन अपनी बहुमूल्य कृषि भूमि और फसल से हाथ धो रहे इन हजारों किसानों के लिए आय दुगना होने का दावा किसी अपमान के घूंट से कम नहीं है।

सदमे में गई किसान की जान

बुद्धपुर के बचऊ कुम्हार ने अपने जीवन भर की गाढ़ी कमाई से गंगा के तटवर्ती सीवान में 14 बिस्वा खेत का बैनामा कराया था। वृद्ध हो चुकी बचऊ की पत्नी सोनरा देवी गंगा कटान में समा चुके खेत की याद ताजा होते ही सिसकने लगीं। उनकी पथरा चुकी आंखों से एक के बाद एक मोतियों सरीखे आंसू जमीन पर गिरने लगे, जिन्हें मिट्टी ने पलक झपकते ही सोख लिया। उनके पड़ोसी ने उन्हें संभालते हुए जानकारी देने का आग्रह किया।

सोनरा देवी ‘जनचौक’ से कहती हैं कि ‘मैं और मेरे पति ने नमक-रोटी खाकर, मेहनत-मजदूरी करके 10 साल पहले 14 बिस्वा खेती योग्य जमीन ख़रीदी थी। जमीन में कई साल तक फसल भी होती रही। लेकिन पांच-छह साल बाद और किसानों की तरह मेरी भी जमीन गंगा में समा गई। जिस खेत से बुढ़ापे में भरण-पोषण की उम्मीद थी। वह तो कब की निकल चुकी है’।

अपने घर के बाहर सोनरा देवी

सोनरा देवी आगे कहती हैं कि ‘जमीन के खोने के सदमे में मेरे पति साल दर साल टूटते गए और एक दिन दुनिया से चले गए। जमीन को गंगा में समाये कई साल गुजर गये। तब से लेकर आज तक सरकार ने कुछ नहीं किया। सरकार से मुझे मुआवजा नहीं चाहिए। यदि सरकार को बुद्धपुर और गंगा कटान से प्रभावित गांवों के बाल-बच्चों की तनिक भी फ़िक्र है, तो अब भी खेतों को बचाने के लिए ठोस व्यवस्था करे, ताकि सैकड़ों किसान परिवारों को बचाया जा सके’।     

साल के बारह महीने होता है गंगा का कटान

प्रभावित किसानों की कृषि योग्य भूमि को बचाने का वादा हर चुनाव में नेता करते हैं। लेकिन चुनाव जीतते ही हजारों किसानों को अपने हाल पर छोड़कर वो अपनी राजनीति चमकाने में जुट जाते हैं। मौजूदा वक्त में सत्ता पक्ष का विधायक और सांसद होने के बाद भी किसानों के खेतों को गंगा में समाने से रोकने के लिए कोई ठोस पहल नहीं होती दिख रही है।

जिसके चलते विकासखंड धानापुर के बुद्धपुर, महुंजी, जिगना, बयानपुर, प्रहलादपुर, गुरैनी, कवलपूरा, सोनहुली, नगवां, मेढवा, अमादपुर, मिश्रपुरा, महमदपुर, नरौली, रायपुर, नौघरां, हिंगुतरगढ़, प्रसहटा, रामपुर दीयां और सहेपुर समेत कई गांवों के सैकड़ों किसानों की हजारों एकड़ उपजाऊ भूमि (खेत) गंगा के फेटे में समा चुके हैं। करीब सौ से ज्यादा किसान भूमिहीन भी हो चुके हैं।

कटान की वजह से गंगा में समाते खेत

राहत और बचाव कार्य के नाम पर बाढ़ के समय स्थानीय प्रशासन द्वारा भूमि कटान और बाढ़ प्रभावित इलाके का सर्वेक्षण कर रिपोर्ट शासन को भेजी जाती है, लेकिन वक्त गुजरने और बाढ़ उतरने के साथ मामला ठंडा पड़ जाता है। वहीं गंगा बाढ़ उतरने के बाद भी साल के बारह महीने कम-ज्यादा कटान करती रहती है।

अब आ गयी गांव की बारी

खेतों में हो रहे कटान को देखकर साइकिल से लौट रहे 65 वर्षीय राम विलास ईंट की पगडंडी पर सुस्ता रहे थे। बातचीत में गंगा कटान से जुड़ा सवाल सुनकर उनके चेहरे पर गहरी उदासी पसर गई। कुछ पल के बाद मौन तोड़ा तो आधे घंटे तक अपनी और गंगा कटान से पीड़ित ग्रामीणों का दर्द सुनाते रहे। राम विलास कहते हैं कि ‘आराजी दियारा के रघुनाथ, मन्नी, शंकरलाल, दरबारी सिंह, सीरी प्रधान और जगबहादुर की कई बीघे जमीन गंगा में समा चुकी है। दरबारी और सीरी तो भूमिहीन हो चुके हैं’।

राम विलास आगे कहते हैं कि ‘भूमि कटान के बारे में सबको पता है लेकिन समझ में नहीं आ रहा कि आखिर रोकने की कोशिश क्यों नहीं की जा रही है? ले दे के चार-पांच हेक्टेयर जमीन बची है। अब गांव का भी नंबर आ गया है। सरकार ने जल्द कुछ नहीं किया तो गंगा नदी अब गांव को काटेगी। इससे सैकड़ों ग्रामीण बे-घर हो जायेंगे। मैंने खुद पहले 116 लट्ठा और उसके बाद 72 लट्ठा भूमि गंगा में समाते देखा हूं’।

राम विलास और सोमनाथ

राम विलास बताते हैं कि ‘अकेले बुद्धपुर का आराजी दियारा (गंगा किनारे के खेत) तकरीबन दो सौ बीघा टूटकर गंगा में समा चुका है। अकेले नौ बीघा तो मेरा गंगा में जा चुका है। सीरी के परिवार का 24 बीघा और जंगबहादुर का पूरा खेत गंगा के दरियाव में चला गया। लोकापढा की पूरी जमीन ख़त्म हो गयी’।

वो कहते हैं कि ‘दियारा में एक इंच नहीं बचा है। इसके आगे जिनके खेत थे, उनका पता-ठिकाना नहीं है कि वे कहां गए? इसी साल यानी 2023 में चार लठ्ठा गंगा में समा गया। अब स्थिति यह है कि जो थोड़ा बहुत बचा है, उसकी भी बारी आ चुकी है’।

बेटियों की नहीं कर पा रहे शादी 

राम विलास आगे कहते हैं कि ‘गांव के उत्तर में अब सिर्फ चार बीघा जमीन बची है। कुछ साल पहले मैंने बैंक से किसान क्रेडिट कार्ड पर डेढ़ लाख रुपये का कर्ज लिया था, जो बढ़कर तीन लाख हो गया तो चार बिस्वा खेत बेचकर कर्ज चुकाया। अब शेष भूमि में पैदा होने वाले अनाज से परिवार का भरण-पोषण चल रहा है’।

खेती ही सहारा

उन्होंने कहा कि ‘कई प्रयास के बाद भी मुझे किसान सम्मान निधि नहीं मिल रही है। फरवरी के अंत में कक्षा दसवीं में पढ़ने वाले पोते की फीस भरनी थी, तो रुपये ही नहीं थे। घर पर एक गाय थी, तो उसे 12 हजार रुपये में बेचकर लड़के की फीस भरी’।

राम विलास कहते हैं कि ‘दो सयान शादी के लायक बेटियां हैं। घर की माली हालत ठीक नहीं होने और शादी के भारी-भरकम खर्च के लिए रुपये की व्यवस्था नहीं होने से उनका विवाह नहीं कर पा रहा हूं। जब सभी रास्ते बंद हो जाएंगे तो खेत बेचकर ही शादी करनी पड़ेगी। बेटियों को घर तो बैठा नहीं सकते ना’?

1985 से शुरू हुआ कटान

बुद्धपुर गांव के 72 वर्षीय सोमनाथ अपने गांव की चार दशक पहले की तस्वीर को कुछ यूं बयां करते हैं। वे कहते हैं कि ‘जहां आज गंगा नदी की धारा के उस पार रेत के टीले और तीन से चार किलोमीटर गंगा का कछार है। वह बुद्धपुर और आसपास के गांवों का उपजाऊ सिवान (खेत-खलिहान) हुआ करता था। हमलोग खुद मालगुजारी और पट्टे पर लेकर खेती करते थे। अब गांव में किसी के पास इतनी जमीन ही नहीं बची है कि वो हम लोगों को मालगुजारी पर खेती करने को दे।

खेत में फसल

सोमनाथ कहते हैं कि ‘आसपास के गांव के लोग इस सिवान में मवेशी चराने के लिए ले आते थे। खेत में चना, जौ, गेहूं, मक्का, बाजरा, सरसों, मटर, तिल, मसूर, अरहर, केराय और अन्य फसलें बैगर किसी खाद के पैदा होती थीं। अभी जो खेत कटने से बचे हैं या कट रहे हैं, उनमें अब भी अच्छी उपज हो रही है’।

सोमनाथ आगे कहते हैं कि ‘समय गुजरता गया और किसान गंगा के कटान की वजह से अपनी कीमती जमीन खोते चले गए। सन 1985 से शुरू हुआ कटान अब तक थमा नहीं है। ग्रामीणों में इस बात का डर है कि यदि ऐसा ही कटान होता रहा तो बुद्धपुर गांव भी जल समाधि ले लेगा।

जनप्रतिनिधि हैं मौन

वर्षा ऋतु के गुजरे हुए चार महीने से अधिक का समय हो चुका है। आसमान में सूरज के नजरे तरेरने से गर्मी पड़ने की दस्तक हो चुकी है। दोपहर के 12 बजे हैं। पीपल के पेड़ के नीचे बुद्धपुर गांव के युवा, अधेड़, बुजुर्ग और महिलायें बैठे हैं। यहां बैठे दीनदयाल का छह बीघे का खेत गंगा के फेंटे में समा चुका है।

गंगा में समाते खेत

दीनदयाल कहते हैं कि ‘छह बीघा मेरा और परिवार का मिलकर कुल 16 बीघा खेती की जमीन को गंगा ने काटकर नदी में तब्दील कर दिया है। आज मेरे खेत में गंगा जल बह रहा है। मैं भूमिहीन होने के कगार पर आ पहुंचा हूं’।

दीनदयाल कहते हैं कि ‘खेत कम होने से परिवार के भरण-पोषण के लिए प्राइवेट नौकरी करनी पड़ रही है। जैसे-तैसे गृहस्थी की गाड़ी खिंच रही है। मवेशियों के लिए चारे का संकट भी खड़ा हो जाता है। भूमि कटान को रोकने के लिए बहुत बार विधायक, सांसद और अधिकारियों से बात की गई, लेकिन कुछ नहीं हुआ। कोई पहल करने वाला नहीं है। मौजूदा विधायक का भी कोई सहयोग नहीं मिल रहा है’।

उन्होंने बताया कि ‘गंगा कटान रोकने के लिए सांसद डॉ महेन्द्रनाथ पांडेय भी मौन हैं। साल 2015 में लेखपाल आधार कार्ड, खतौनी और जमीन से जुड़े कागजात लेकर गए थे, लेकिन कुछ नहीं हुआ। रमेश, अगम, देवेंद्र, राकेश, शिवपूजन, विनोद आदि किसानों की बड़े पैमाने पर खेती योग्य भूमि गंगा में समा चुकी है।

गंगा कटान पीड़ित देवेंद्र व राकेश

तीन नदियां मचाती हैं तबाही

बरसात के मौसम में मैदानी और पहाड़ी इलाके में हो रही बारिश का पानी गंगा नदी और कर्मनाशा नदी में आने के कारण तटवर्ती इलाकों में बाढ़ का खतरा मंडराने लगता है। जिले के मुगलसराय, सकलडीहा, बरहनी, चकिया और धानापुर विकासखंड के सैकड़ों गांवों में गंगा, चन्द्रप्रभा और कर्मनाशा नदी का पानी भर जाता है।

मुगलसराय और सकलडीहा तहसील के भुपौली, डेरवा, महड़ौरा, कांवर, पकड़ी, महुअरिया, विशुपुर, महुआरी समेत दर्जनों से ज्यादा गांव के खेतों पर लगी सब्जियां, फसल और हरा चारा गंगा कटान और पानी में डूबने से बर्बाद हो जाता है जिससे हर साल लाखों किसानों को आर्थिक नुकसाल उठाना पड़ता है’।

बाढ़ के उतरने के बाद जीवन पटरी पर लौट आता है लेकिन गंगा कटान से पीड़ित किसान साल के 365 दिन धुकधुकी में जीवन काटता रहता है। उसे यही चिंता खाए जाती है कि ऐसे ही गंगा उनके खेतों को काटती रहेगी तो वह दिन ज्यादा दूर नहीं जब खेत के बिना उनके परिवार को दो वक्त की रोटी के लिए तरसना पड़ेगा?

गंगा में समाते खेत की चिंता

2016, 17 और 2022 में गंगा की बाढ़ ने सकलडीहा, धानापुर और बरहनी विकासखंड में काफी तबाही मचाई थी।

खेत के साथ बर्बाद हो रही फसल 

वकालत की पढ़ाई के बाद प्रैक्टिस कर रहे रजनीश कहते हैं कि ‘सरकार हम लोगों को खेती के लिए 2000 रुपये दे रही है। आप बताइये, हमारी लाखों-लाख रुपये की जमीन गंगा में विलीन हो रही है। इस दो हजार रुपये से क्या होगा? मेरी छह बीघा जमीन गंगा में चली गई है। तीन हफ्ते पहले ही गांव के एक किसान की 12 बिस्वा का चक पलभर में गंगा में समा गया। खेत तो गया ही, साथ ही खेत में लगी हजारों रुपये की फसल भी हाथ न आ सकी।

रजनीश कहते हैं कि ‘मीडिया दिनभर फालतू विषय के कवरेज और बहसों में लगी रहती है। कृषि प्रधान चंदौली जनपद की सबसे बड़ी समस्या इस समय भूमि कटान है। इस पर कवरेज क्यों नहीं करती? क्या हम लोग देश में नहीं है? क्या नेताओं, मंत्रियों और मीडिया को इंतजार है कि गांव बह जाए तभी वे काम व कवरेज करेंगे? भूमि का कटान 25 से 30 गांवों में निरंतर हो रहा है। सहपुर से रायपुर, गुरैनी से अवहीं (जमानिया) तक जबरदस्त कटान हो रहा है’।

इलाके के ग्रामीण परेशान

रजनीश आगे कहते हैं कि ‘गांव की जितनी भी उपजाऊ भूमि थी सब गंगा जी में समा चुकी है। जमानिया (गाजीपुर जनपद) में गंगा कटान कर रही थी। लेकिन कुछ साल पहले पत्थर डालकर रोक दिया गया है। मैं चाहता हूं कि हम लोगों को जमीन का मुआवजा देकर यहां भी पत्थर और बोल्डर डालकर गंगा के कटान से गांव को बचाया जाए’।       

जल्दी मिले मुआवजा

भागीरथी देवी ने बताया कि ‘मेरी 10 बिस्वा जमीन गंगा कटान में चली गई है। गंगा नदी से दूसरी तरफ बची 15 बिस्वा जमीन पर अनाज उपजाया जा रहा है। इससे परिवार के 14 सदस्यों का भरण-पोषण मुश्किल से हो रहा है। मवेशियों को चारा-भूसा भी खरीदना पड़ता है। परिवार के जवान व बच्चे मेहनत-मजदूरी करके घर चला रहे हैं’।

भागीरथी देवी कहती हैं कि ‘गांव के कई लोगों की खेती योग्य जमीनें गंगा में समा रही हैं। अभी 15 बिस्वा बचा है। ऐसे ही गंगा माई काटती रहीं तो चार-पांच साल में इस जमीन से भी हम लोग हाथ धो देंगे। हम लोग बड़ी तकलीफ में हैं। सरकार को ध्यान देना चाहिए। किसानों को जमीनों को मुआवजा या जमीन मिलनी चाहिए’।

भागीरथी देवी

शासन भेजी जा रही है रिपोर्ट

धानापुर, मुगलसराय व आसपास के तटवर्ती इलाके में कटान की बात स्वीकारते हुए उपजिलाधिकारी मनोज पाठक ने ‘जनचौक’ को बताया कि ‘सिंचाई विभाग ने गंगा नदी के कटान प्रभावित गांवों का सर्वेक्षण कर रिपोर्ट तैयार की है’।

उन्होंने कहा कि ‘मुगलसराय के प्रभावित गांवों में खेत को कटान से बचाने ले लिए काम शुरू है। अन्य गांवों में भी सिलसिलेवार गहन सर्वेक्षण का काम शुरू है। काम पूरा होने पर रिपोर्ट शासन को भेजी जा रही है। गंगा के कटान से भूमिहीन ज्यादा प्रभावित हैं। इसका अलग से सर्वेक्षण कर शासन को अवगत कराया जाएगा’। 

कटान का जल्द हो स्थाई प्रबंध 

चंदौली जिले के धानापुर के ग्राम प्रधान और समाजसेवी रामजी कुशवाहा बताते हैं कि ‘धानापुर, सकलडीहा, मुगलसराय और बरहनी ब्लॉक के 150 से अधिक गांवों में बाढ़ और तकरीबन 80 से अधिक गांवों में कटान की समस्या से हजारों किसान प्रभावित हैं’।

धानापुर के ग्राम प्रधान रामजी कुशवाहा

रामजी कुशवाहा आगे कहते हैं कि ‘हिंगुतरगढ़, धानापुर और बुद्धपुर गांव की सैकड़ों बीघे की उपजाऊ भूमि गंगा में हर साल समा जाती है। गंगा का जलस्तर भले घट गया है पर बाढ़ के चलते कमजोर हुआ तट सर्दी और गर्मी में भी धीरे-धीरे टूटकर गंगा में समाता रहता है। कटान का यह भयावह दृश्य देख तटीय गांवों के लोग सहमे हुए हैं’।

उन्होंने कहा कि ‘स्थानीय विधायक, सांसद और प्रशासन इस इलाके की समस्या पर ध्यान दें। पिछले पांच दशक से तटवर्ती गांव के किसानों की बड़े पैमाने पर उपजाऊ भूमि गंगा कटान के चलते बर्बाद होती आ रही है। क्षेत्र में गंगा कटान से प्रभावित बुद्धपुर के दक्षिणी हिस्से के खेत लगभग गंगा में समा चुके हैं।

गंगा के कटान का जल्द ही स्थाई प्रबंध नहीं किया गया तो आगामी कुछ सालों में गांव कटने लगेंगे। जिससे सैकड़ों ग्रामीण अपने आशियाने से भी हाथ धो बैठेंगे’।

(चंदौली से पत्रकार पवन कुमार मौर्य की ग्राउंड रिपोर्ट) 

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