Saturday, January 22, 2022

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किसानों के मुद्दे पर जन गोलबंदी तेज, संगठनों ने अलग-अलग तरीके से की पहल

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प्रधानमंत्री द्वारा नाटकीय ढंग से किसानों की मांग को विपक्ष द्वारा फैलाई जा रही ‘गलतफहमी’ बताए जाने की कड़ी निंदा करते हुए एआईकेएससीसी वर्किंग ग्रुप ने कहा है कि ये दरअसल उन कानूनों से ध्यान हटाने का प्रयास है, जो कॉरपोरेट और विदेशी कंपनियों को सशक्त करते हैं और किसानों से उनकी जीविका का साधन छीनते हैं। जिस सवाल को किसानों के विरोध में केंद्रित करके रख दिया है, यह कि ये ‘किसान बनाम कारपोरेट हितों’ का सवाल है और भारत सरकार कंपनियों और विदेशी कंपनियों के साथ खड़ी है, प्रधानमंत्री उससे बचना चाह रहे हैं।

प्रधानमंत्री की यह दलील कि इससे किसानों के लिए अवसर और विकल्प बढ़ेंगे और इनमें पुरानी व्यवस्था समाप्त करने का कोई आदेश नहीं है, एक सफेद झूठ है। कानून साफ लिखते हैं कि व्यापार निजी कॉरपोरेशन करेंगे और फसल के दाम ऑनलाइन ई-व्यापार से तय होंगे, न कि एमएसपी से, जो पुरानी व्यवस्था है। पुरानी व्यवस्था में बड़े प्रतिष्ठानों द्वारा व्यापार करने पर रोक थी। नया कानून उन्हें अवसर देता है और खेती कराने, खरीद की प्रक्रिया, भंडारण और खाने के व्यापार में उन्हें विकल्प के तौर पर खड़ा करता है।

किसानों की यह दलील पूरी तरह सही है कि प्रधानमंत्री उनकी बात नहीं सुन रहे हैं, और यह कि ठेका खेती, कॉरपोरेट निजी मंडियां, खेती करने की स्वतंत्रता समाप्त कर देंगी, लागत के दाम, कर्जे और घाटे बढ़ा देंगी और आत्महत्याएं तथा जमीन से विस्थापन बढ़ा देंगी। प्रधानमंत्री ने दावा किया कि अब खाद खुले में बिक रही है पर यह नहीं बताया कि उसके दाम दो गुना से ज्यादा कर दिए हैं।

प्रधानमंत्री ने किसानों की पुरानी एमएसपी और सरकारी खरीद, कर्जमाफी और सस्ती खाद और लागत की मांगों पर खुलकर हमला किया है। ये सभी किसानों पर बोझ बढ़ाती हैं और क्योंकि बड़े कॉरपोरेट और व्यवसायिक हित मंहगी लागत, खाद, डीजल, बीज, बिजली बेचने में थे और वे नहीं चाहते थे कि सरकारी खरीद और मंडियों से वे बाधित हों।

प्रधानमंत्री ने दावा किया है कि पुरानी व्यवस्था विफल हो गई थी और नए कानून नई व्यवस्था ला रहे हैं। नए कानून कॉरपोरेट दुनिया को खेती पर सीधा हस्तक्षेप और नियंत्रण करने का अधिकार देते हैं। दिल्ली में आए किसान यही बात प्रधानमंत्री को सुनाना चाहते हैं, जिसे सुनने की जगह उन्होंने अपने कान बंद कर लिए हैं। एआईकेएससीसी ने प्रधानमंत्री से अपील की है कि वे ‘अन्नदाता, आत्मनिर्भर भारत की अगुवाई करेगा’ के गलत नारे न उछालें, क्योंकि उनके कानून और नीतियां किसानों को ‘अन्नदाता कंपनियों का गुलाम बनेगा’ की ओर ढकेल रही हैं।

सिंघू बार्डर पर मौजूद किसान।

एआईकेएससीसी ने खेती के तीनों कानून और बिजली बिल 2020 पर हमला करते हुए कहा है कि इससे कालाबाजारी, खाने की कीमतों की मंहगाई और राशन व्यवस्था तथा गरीबों की खाद्यान्न सुरक्षा पर हमला होगा। वर्किंग ग्रुप के अनुसार प्रधानमंत्री जवाब देने से भाग रहे हैं, वार्ता का मजाक उड़ा रहे हैं, जल्द ही किसान आंदोलन, जिसकी ताकत भी बढ़ रही है और लड़ने का संकल्प भी, उन्हें सच्चाई का सामना करने के लिए मजबूर करेगा।

उधर, भाकपा-माले की राज्य स्थायी समिति की एक दिवसीय बैठक पटना स्थित राज्य कार्यालय में हुई। बैठक में तीनों काले कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के उठ खड़े हुए आंदोलन का स्वागत किया गया। बैठक के हवाले से धीरेंद्र झा ने कहा कि यह आंदोलन अब पूरे देश में फैल रहा है और बिहार में भी हमारी पार्टी और किसान संगठन इन काले कानूनों की असलियत को किसानों के बीच ले जाने का काम करेंगे।

उन्होंने कहा कि भाजपा के नेता गलतबयानी करके किसानों को ठगने में कामयाब नहीं हो सकते। आज पंजाब और हरियाणा के किसान उठ खड़े हुए हैं, कल बिहार के किसान इन काले कानूनों के खिलाफ उठेंगे। ये कानून पूरी तरह से खेती को बर्बाद करने वाले और किसानों से खेती छीन लेने वाले कानून हैं। भाजपा आज पूरी तरह से कॉरपोरेटों की दलाली में लग गई है और खेती और किसानी को बर्बाद कर रही है।

उन्होंने कहा कि बिहार में कृषि रोड मैप पर डींगे मारने वाली नीतीश सरकार किसानों के धान क्रय के बारे में तनिक भी चिंतित नहीं है। भाजपा-जदयू ने एक तरह से कह दिया है कि स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट केवल कागज पर ही रहेगी, धरातल पर वह नहीं उतरेगी। न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान खरीद की गारंटी के सवाल पर माले और किसान महासभा मिलकर गांव-पंचायत स्तर पर धारावाहिक आंदोलन चलाएंगे और धान खरीद के लिए सरकार को मजबूर कर देंगे।

माले नेता ने कहा कि बैठक में पार्टी से जुड़े सभी जनसंगठनों के विस्तार तथा सदस्यता अभियान पर चर्चा की गई। चुनाव में शिक्षा और रोजगार का प्रश्न एक नंबर का प्रश्न बना। युवाओं की बड़ी आबादी बेरोजगारी का दंश झेल रही है। चुनाव में भाजपा द्वारा 19 लाख नौकरियों की बहाली की घोषणा के मद्देनजर छात्र और युवा संगठन सभी जिलों में बैठकें आयोजित करके सदस्यता अभियान चलाएंगे और आंदोलन का सृजन करेंगे। राज्यपाल के अभिभाषण में शिक्षक और स्कीम वर्करों के समान काम के लिए समान वेतन और स्थायीकरण पर कुछ भी नहीं कहा गया। माइक्रोफायनेंस कंपनियों के बोझ तले दबी महिलाओं पर एक शब्द नहीं कहा गया। इन मुद्दों पर धारावाहिक आंदोलन चलाया जाएगा और विभिन्न कामकाजी तबके के संगठन निर्माण पर जोर दिया जाएगा।

राज्य स्थायी समिति की बैठक के उपरांत 3-4 दिसंबर को भाकपा-माले की केंद्रीय कमेटी की बैठक पटना में आयोजित की गई है। बैठक में भाग लेने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों से केंद्रीय कमेटी के सदस्यों का पटना पहुंचना आरंभ हो गया है। केंद्रीय कमेटी की बैठक में बिहार विधानसभा चुनाव के आलोक में पश्चिम बंगाल, असम और अन्य राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों पर चर्चा होने की संभावना है।

कल 2 दिसंबर को मोदी सरकार द्वारा किसानों को गुलाम बनाने वाले तीन कृषि कानूनों की पूर्णतः वापसी, बिजली बिल 2020 की वापसी, बिहार में मंडियों को बहाल करने, न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान खरीद की गारंटी आदि सवालों पर वाम दलों द्वारा आयोजित राज्यव्यापी प्रतिवाद के तहत कल पटना के कार्यक्रम में माले महासचिव कॉ. दीपंकर भट्टाचार्य भी शामिल होंगे।

बैठक में पार्टी के महासचिव कॉ. दीपंकर भट्टाचार्य, वरिष्ठ नेता स्वदेश भट्टाचार्य, राज्य सचिव कुणाल, पोलित ब्यूरो के सदस्य धीरेंद्र झा, अखिल भारतीय किसान महासभा के नेता राजाराम सिंह, विधायक दल के नेता महबूब आलम, रामजतन शर्मा, नंदकिशोर प्रसाद, केडी यादव, ऐपवा की महासचिव मीना तिवारी, अगिआंव विधायक मनोज मंजिल, काराकाट से पार्टी विधायक अरुण सिंह, किसान नेता राजू यादव, सिकटा से विधायक वीरेंद्र प्रसाद गुप्ता, संतोष सहर, अभ्युदय, सरोज चैबे, शशि यादव, जवाहर सिंह, अरवल विधायक महानंद सिंह, आरएन ठाकुर, निरंजन कुमार, वैद्यनाथ यादव, इंद्रजीत चैरसिया आदि शामिल थे।

उधर, लखनऊ में एआईपीएफ ने बयान जारी कर कहा है कि एमएसपी से कम खरीद हो दण्डनीय अपराध घोषित किया जाए। संगठन ने अपने बयान में कहा है कि वित्तीय सम्राट अमेरिका द्वारा विश्व व्यापार संगठन में डाले दबाव और देश के चंद कॉरपोरेट घरानों के मुनाफे के लिए आरएसएस-भाजपा की मोदी सरकार ने देश विरोधी-किसान विरोधी तीनों कानूनों को बनाने का काम किया है। प्रधानमंत्री को इनके बारे में देश को भ्रमित करने की जगह एमएसपी का कानून बनाना चाहिए और इस बात को सुनिश्चित करना चाहिए कि सरकार द्वारा तय न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम दाम पर किसानों की फसल की कोई खरीद नहीं होगी और ऐसा करना दण्डनीय अपराध होगा।

आंदोलित किसानों के समर्थन में पूरे देश में आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट और मजदूर किसान मंच द्वारा आयोजित प्रदर्शन में कहा गया कि मोदी सरकार का किसानों के आंदोलन के प्रति अभी भी रुख दमनात्मक ही बना हुआ है। आज भी किसान आंदोलन के नेताओं पर दंगा कराने जैसी धाराओं में मुकदमे कायम किए गए हैं। सरकार को अन्नदाता किसानों के प्रति अपने दमनात्मक रुख से पीछे हटकर किसानों की मांगों को हल करना चाहिए और देश विरोधी कानूनों को वापस लेना चाहिए।

नेताओं ने कहा कि सरकार को देश की खेती, कॉरपोरेट घराने के हवाले करने के बजाए किसानों की सहकारी समितियों को मदद कर मजबूत करना चाहिए, ताकि आत्मनिर्भर भारतीय अर्थव्यवस्था का निर्माण हो सके। आज जरूरत मण्डी समिति को खत्म करने की नहीं बल्कि उसे और विस्तारित और बेहतर बनाने की है, ताकि किसानों को उनकी सभी प्रकार की उपज का वाजिब दाम मिल सके।

सरकार द्वारा आवश्यक वस्तु अधिनियम में किया संशोधन हमारी सार्वजनिक खाद्य सुरक्षा व्यवस्था को कमजोर करेगा और खाद्यान्न व्यापार में वायदा कारोबार को मजबूत करने का काम करेगा, जिससे आम आदमी को और महंगाई झेलने पर मजबूर होना पड़ेगा। 

विभिन्न जगहों पर हुए प्रदर्शनों का नेतृत्व पूर्व आईजी और राष्ट्रीय प्रवक्ता एसआर दारापुरी, बिहार में पूर्व विधायक और एआईपीएफ बिहार प्रवक्ता रमेश सिंह कुशवाहा, वर्कर्स फ्रंट अध्यक्ष दिनकर कपूर, झारखंड में मधु सोरेन, लखीमपुर खीरी में एआईपीएफ के प्रदेश अध्यक्ष डॉ, बीआर गौतम, सीतापुर में एआईपीएफ के महासचिव डॉ. बृज बिहारी, मजदूर किसान मंच नेता सुनीला रावत, युवा मंच के नागेश गौतम, अभिलाष गौतम, सोनभद्र प्रदेश उपाध्यक्ष कांता कोल, कृपाशंकर पनिका, राजेंद्र प्रसाद गोंड, सूरज कोल, चंदौली में अजय राय, आलोक राजभर, गंगा चेरो, लखनऊ में उपाध्यक्ष उमाकांत श्रीवास्तव, वर्कर्स फ्रंट नेता प्रीती श्रीवास्तव, कमलेश सिंह एडवोकेट, बस्ती में एडवोकेट राजनारायण मिश्र, इलाहाबाद में राजेश सचान, राम बहादुर पटेल, आगरा में इंजीनियर दुर्गा प्रसाद आदि लोगों ने किया।

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