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मथुरा के श्रीकृष्ण जन्म स्थान विवाद पर नहीं मिली मुकदमे की अनुमति

उत्तर प्रदेश में मथुरा के श्रीकृष्ण जन्म स्थान परिसर से शाही ईदगाह मस्जिद के कब्जे से 13.37 एकड़ जमीन को श्रीकृष्ण विराजमान को सौंपने के लिए दायर वाद बुधवार को मथुरा के सिविल जज सीनियर डिवीजन न्यायालय ने खारिज कर दिया। न्यायालय ने श्रीकृष्ण विराजमान के वाद पर विचार करने से मना कर दिया। न्यायालय ने कहा कि 1991 के प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट (उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991) के तहत सभी धर्मस्थलों की स्थिति 15 अगस्त 1947 वाली रखी जानी है, इस कानून में सिर्फ अयोध्या मामले को अपवाद रखा गया था।

सुनवाई के लिए वादी पक्ष के विष्णु जैन, हरि शंकर जैन और रंजन अगिनहोत्री ने सिविल जज सीनियर डिवीज़न न्यायालय में पहुंच कर अपना पक्ष रखा। न्यायालय ने पक्ष की पूरी बात सुनी और सुनवाई पूरी होने के बाद अपने फैसले में वाद को खारिज़ कर दिया। इससे पहले सोमवार को मथुरा के सिविल न्यायालय में ये वाद लिस्‍टेड हुआ। न्यायालय को यह तय करना था कि इस याचिका को स्‍वीकार किया जाए या नहीं, लेकिन सुनवाई को 30 सितंबर तक के लिए टाल दिया गया। बाद में श्रीकृष्ण जन्मभूमि के 13.37 एकड़ के स्वामित्व और शाही ईदगाह के निर्माण पर सवाल उठाए गए थे।

प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट 1991
इस के जरिए विवादित राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद मुकदमेबाजी को लेकर छूट दी गई थी, लेकिन मथुरा-काशी समेत सभी धार्मिक या आस्था स्थलों के विवादों पर मुकदमेबाजी से रोक दिया गया था। अधिनियम की धारा 4 के अनुसार, अदालतों को ऐसी याचिकाओं को स्वीकार करने से रोक दिया गया है, जिनमें धार्मिक स्थानों के चरित्र को बदलने की मांग की गई है, जैसा कि वे भारतीय स्वतंत्रता की तारीख के दिन थे।

16 वीं शताब्दी की बाबरी मस्जिद के स्‍थान पर राम मंदिर निर्माण के चलाए गए राम जन्म भूमि आंदोलन के मद्देनजर पूजा स्थल कानून बनाया गया था। पिछले साल अयोध्या के फैसले में, सुप्रीम कोर्ट की एक संविधान पीठ ने उपासना स्थलों की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा था, जिसमें कहा गया था कि यह संविधान में निहित धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को आगे बढ़ाने के लिए लागू किया गया था।

उत्तर प्रदेश के मथुरा में श्रीकृष्ण जन्म स्थान को लेकर दायर याचिका सिविल जज सीनियर डिवीजन लिंक कोर्ट एडीजे एफटीसी (द्वितीय) छाया शर्मा ने खारिज कर दी। उन्होंने इसके पीछे पर्याप्त आधार न होने की बात कही। वहीं श्रीकृष्ण विराजमान के वकील विष्णु शंकर जैन का कहना है कि वे अब हाई कोर्ट में याचिका दायर करेंगे। बता दें कि श्रीकृष्ण विराजमान की ओर से सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट हरि शंकर जैन और विष्णु शंकर जैन की तरफ से दायर याचिका में मुख्यतः 1968 में कृष्ण जन्म स्थान सेवा संस्थान और ईदगाह ट्रस्ट के मध्य हुए समझौते को रद्द करने, ईदगाह मस्जिद को हटाए जाने और 13.37 एकड़ जगह का मालिकाना हक श्रीकृष्ण विराजमान के नाम करने की बात कही गई थी।

इस वाद को सिविल जज सीनियर डिवीजन की अदालत में दायर किया गया था। सिविल जज सीनियर डिवीजन के अवकाश पर होने के कारण लिंक कोर्ट एडीजे एफटीसी द्वितीय छाया शर्मा की कोर्ट में इसकी सुनवाई हुई। बुधवार दोपहर करीब 2.35 बजे अदालत ने इस पर सुनवाई शुरू की। 20 मिनट चली सुनवाई में याचिकाकर्ता के वकील हरि शंकर जैन और विष्णु शंकर जैन द्वारा याचिका दायर करने के आधार रखे। उनका पक्ष जानने के बाद जज ने फैसला सुरक्षित रख लिया। शाम करीब 5:15 बजे एडीजे एफटीसी द्वितीय छाया शर्मा ने अपना निर्णय सुनाते हुए याचिका को आधारहीन होने का हवाला देते हुए खारिज कर दिया।

वाद में यह आरोप लगाया गया था कि 1968 में, सोसाइटी श्री कृष्णा जनमस्थान सेवा संघ ने ट्रस्ट मस्जिद ईदगाह की प्रबंधन समिति के साथ समझौता किया था और भगवान से संबंधित संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा उन्हें दे दिया था। समझौते की वैधता पर सवाल उठाते हुए, वाद में कहा गया था कि श्री कृष्ण जन्म स्थान सेवा संघ का कटरा केशवदेव की संपत्ति में कोई स्वामित्व या अधिकार नहीं है। असली जेल यानी भगवान कृष्ण का जन्म स्थान प्रबंधन समिति यानी ट्रस्ट मस्जिद ईदगाह द्वारा किए गए निर्माण के नीचे है। असली तथ्य खुदाई के बाद अदालत के सामने आएगा।

सुन्नी सेंट्रल बोर्ड ऑफ वक्फ और श्रीकृष्ण जन्म भूमि ट्रस्ट को भी प्रतिवादी बनया गया था। श्रीकृष्ण जन्म भूमि ट्रस्ट 1958 से क्रियाशील नहीं है और यह भगवान की संपत्ति की रक्षा, प्रबंधन और बचाने में विफल रहा है। हजारों वर्षों से भारत में प्रचलित हिंदू कानून के तहत यह मान्यता है कि एक बार देवता में निहित संपत्ति देवता की संपत्ति होगी और देवता में निहित संपत्ति कभी नष्ट नहीं होती है या खोती नहीं है और इसे फिर से स्थापित किया जा सकता है और पुनः प्राप्त किया जा सकता है।

ये वाद भगवान श्रीकृष्ण विराजमान, कटरा केशव देव खेवट, मौजा मथुरा बाजार शहर की ओर से उनकी अधिवक्ता रंजना अग्निहोत्री और छह अन्य भक्तों ने दाखिल किया था। 26 सितंबर को दायर 57 पेज के इस दावे में श्री कृष्ण विराजमान के अलावा रंजना अग्निहोत्री, प्रवेश कुमार, राजेश मणि त्रिपाठी, तरुणेश कुमार शुक्ला, शिवाजी सिंह, त्रिपुरारी तिवारी भक्त वादी थे। याचिका में यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड, कमेटी ऑफ मैनेजमेंट ट्रस्ट शाही ईदगाह मस्जिद, श्रीकृष्ण जन्म भूमि ट्रस्ट, श्रीकृष्ण जन्म स्थान सेवा संस्थान को पार्टी बनाया गया था।

इस वाद को लेकर श्रीकृष्ण जन्म स्थान संस्थान ट्रस्ट का कहना है कि इस केस से उनका कोई लेना देना नहीं है। यह मुकदमा भगवान श्रीकृष्ण विराजमान कटरा केशव देव खेवट, मौजा मथुरा बाजार शहर की ओर से उनकी अंतरंग सखी के रूप में अधिवक्ता रंजना अग्निहोत्री, विष्णु शंकर जैन, हरिशंकर जैन और तीन अन्य ने दाखिल किया था। याचिका में कहा गया था कि मुसलमानों की मदद से शाही ईदगाह ट्रस्ट ने श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर कब्जा कर लिया और ईश्वर के स्थान पर एक ढांचे का निर्माण कर दिया। भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्रीकृष्ण का जन्म स्थान उसी ढांचे के नीचे स्थित है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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This post was last modified on October 1, 2020 12:05 pm

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