Thursday, October 28, 2021

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हिंदू- मुस्लिम एकता के एंबेसडर थे मौलाना आजाद

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स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री, महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मौलाना अबुल कलाम आजाद की आज 63वीं पुण्यतिथि है। आज ही के दिन 22 फरवरी, 1958 को मौलाना आजाद हमसे हमेशा के लिए जुदा हो गए थे। शिक्षा के क्षेत्र में मौलाना आजाद का योगदान अतुल्यनीय है। आजादी के बाद शिक्षा के क्षेत्र में जो भी राष्ट्रीय कार्यक्रम बने, उनमें मौलाना आजाद की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। दूसरे महायुद्ध के बाद जब सारी दुनिया में शिक्षा को लेकर बड़े पैमाने पर काम हो रहा था, तो वे मौलाना आजाद ही थे, जिन्होंने भारत में शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए मुख्य भूमिका निभाई।

विश्वस्तरीय शिक्षा का देश में प्रसार हो, इसके लिए उन्होंने न सिर्फ बच्चों को, बल्कि बड़ों को भी ज्यादा से ज्यादा स्कूल से जोड़ने की प्रक्रिया शुरू की। शिक्षा के बारे में मौलाना आजाद के विचार बड़े ही क्रांतिकारी थे। उनका कहना था, ‘‘यह प्रत्येक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है कि, उसे कम से कम बुनियादी शिक्षा मिले, जिसके बगैर वह एक नागरिक के तौर पर अपने कर्तव्यों को पूरी तरह नहीं निभा सकता।’’

मौलाना आजाद शिक्षा के माध्यम से समाज का स्तर ऊपर उठाना चाहते थे। शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने कई उल्लेखनीय कार्य किए। शिक्षा मंत्री के रूप में उन्होंने देश में नई राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली को बनाया। इस शिक्षा प्रणाली में सभी बच्चों के लिए प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य और मुफ्त की गई। प्राथमिक शिक्षा के साथ-साथ उन्होंने देश में उच्च शिक्षा के लिए आधुनिक संस्थानों को बनाने पर भी काफी जोर दिया।

मौलाना आजाद ने यूजीसी यानी यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन की नींव रखी, जिसका मुख्य उद्देश्य उच्च शिक्षा को बढ़ावा देना, भारत के सभी विश्वविद्यालयों के कार्यों का विश्लेषण करना और एक-दूसरे के बीच समायोजन स्थापित करना था। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने हमेशा आधुनिक संस्थाओं को खोलने की हिमायत की। शिक्षा के क्षेत्र में किए गए मौलाना आजाद के नवाचारों और क्रांतिकारी कार्यों की ही वजह से उन्हें श्रद्धांजलि स्वरूप, मौलाना आजाद की जयंती 11 नवंबर, पूरे देश में ‘राष्ट्रीय शिक्षा दिवस’ के रूप में मनाई जाती है।

11 नवम्बर, 1888 में जन्मे मौलाना अबुल कलाम आजाद बचपन से ही अध्ययन में गहरी दिलचस्पी रखते थे। बारह साल की छोटी सी उम्र में वे फारसी और अरबी की तालीम पूरी कर चुके थे। मौलाना आजाद ने स्वाध्याय से ही अंग्रेजी का अभ्यास किया। लिखने-पढ़ने से ये लगाव ही था कि उन्होंने बचपन में ‘बलाग’ नाम का पत्र निकाला और ग्यारह साल की उम्र तक आते-आते ‘नैरंगे आलम’ नामक पत्रिका निकाली। मौलाना आजाद को शुरुआत में शेर-ओ-शायरी से बेहद लगाव था, लेकिन बाद में उनका झुकाव पत्रकारिता की जानिब होता चला गया। उन्हें देश भर में मकबूलियत, पत्रकारिता के पेशे में आने के बाद ही मिली। जंग-ए-आजादी के दौर में उनकी कलम ने खूब आग उगली। मौलाना आजाद ने बरतानिया हुकूमत के नस्ली भेद-भाव और अत्याचारी तौर तरीकों की अपने लेखों में खुलकर आलोचना की।

साल 1902 में उन्होंने ‘अल-हिलाल’ नामक समाचार पत्र निकाला, जो आगे चलकर देश की राष्ट्रीय विचारधारा के विकास में प्रभावशाली योगदान देने वाला साबित हुआ। राष्ट्रीय क्षेत्र में ‘अल-हिलाल’ राष्ट्रवाद का प्रहरी बनकर सामने आया। इस अखबार के जरिए मौलाना आजाद ने ब्रिटिश नीतियों का खुलकर विरोध किया। लोगों को राष्ट्रवाद के प्रति प्रेरित किया। नतीजतन, साल 1914 में अंग्रेज हुकूमत ने प्रेस अधिनियम के तहत उनके अखबार पर पाबंदी लगा दी, लेकिन अंग्रेजी हुकूमत की पाबंदियां उन्हें रोक नहीं पाईं। एक अखबार पर पाबंदी लगती, मौलाना आजाद दूसरा अखबार निकाल लेते। इसी तरह आम अवाम को वे लगातार अपने लेखन से बेदार करते रहे।

जंगे आजादी के दौर में मौलाना आजाद का नाम महात्मा गांधी, सरदार बल्लभ भाई पटेल, सुभाष चंद्र बोस और लाला लाजपत राय जैसे राष्ट्रीय नेताओं के साथ अग्रिम पंक्ति में शुमार होता था। समग्र राष्ट्रीय आंदोलन में उनका योगदान अभूतपूर्व और अद्वितीय था। यहां तक कहा जाता है कि यदि मौलाना आजाद ने हिंदू और मुसलमानों को एकजुट कर दोनों को एक साथ लाने का बीड़ा न उठाया होता, तो आज हमारे स्वाधीनाता आंदोलन का स्वरूप कुछ और ही होता।

मौलाना आजाद, मजहब के नाम पर अलगाववाद को बढ़ावा देने वाली हर गतिविधि के विरोधी थे। राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान सांप्रदायिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए उन्होंने कई मुस्लिम लीडरों की आलोचना की। अपनी राजनीतिक आस्थाओं तथा विचारों के चलते उन्हें मुसलमानों के एक बड़े वर्ग का विरोध झेलना पड़ा। बावजूद इसके उन्होंने महात्मा गांधी और कांग्रेस का साथ नहीं छोड़ा।

मौलाना आजाद ने महात्मा गांधी के ‘सत्याग्रह’, ‘सविनय अवज्ञा’ और ‘भारत छोड़ो’ जैसे सभी महत्वपूर्ण आंदोलनों में बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी की। साल 1923 में वे कांग्रेस के सबसे युवा अध्यक्ष चुने गए। आजादी का आंदोलन जब निर्णायक स्थिति में था, यानी साल 1940 से 1945 के दरमियान कांग्रेस की बागडोर मौलाना आजाद के ही जिम्मे थी। साल 1946 में जब मुस्लिम लीग और मुहम्मद अली जिन्ना ने बंटवारे की मांग तेज की, तो मौलाना आजाद इस मांग के खिलाफ डटकर खड़े हो गए।

वे बंटवारे के घोर विरोधी थे। उनका मानना था कि हिंदू और मुसलमान दोनों भाई-भाई हैं, लिहाजा मजहब के नाम पर देश के बंटवारे की कोई जरूरत नहीं। यह मांग ही नाजायज है। मौलाना आजाद की लाख कोशिशों के बावजूद भारत का बंटवारा हो गया। बहुत से मुस्लिम लीडर बंटवारे के बाद पाकिस्तान चले गए, लेकिन उन्होंने भारत में ही रहना मंजूर किया। साल 1952 और 1957 में वे लोकसभा के लिए चुने गए।

मौलाना आजाद, पंडित जवाहर लाल नेहरू के काफी करीबी थे। आजादी के बाद उन्होंने पंडित नेहरू के नजदीकी सलाहकार के रूप में काम किया। राष्ट्रीय नीतियों को बनाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। भारत की सामाजिक, आर्थिक और व्यापारिक नीतियों को आगे बढ़ाने में जिन नेताओं ने अपनी भूमिका निभाई, उनमें मौलाना आजाद अव्वल नंबर पर थे। मौलाना आजाद ने देश में शिक्षा के अलावा सांस्कृतिक नीतियों की भी नींव रखी। उन्होंने साल 1950 में ‘इंडियन काउंसिल फॉर कल्चरल रिलेशंस’ की स्थापना की, जिसका मुख्य कार्य दीगर देशों के साथ सांस्कृतिक संबंधों को बनाना और बढ़ाना था।

मौलाना आजाद राष्ट्रीय एकता की एक अनूठी मिसाल थे। भारतीय संविधान में धर्म निरपेक्षता, धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के सिद्धांतों को जुड़वाने में उनकी अहम भूमिका रही। यही नहीं उन्होंने भारतीय मुसलमानों के लिए अलग ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ’ बनाने के लिए भी खास कोशिशें कीं। औरतों और पिछड़े तबकों को सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक अधिकार मिलें, इसके लिए उन्होंने बुनियादी काम किए।

मौलाना आजाद समाज को बदलने के लिए, शिक्षा को एक बड़ा माध्यम मानते थे। हमारे प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का भी ये मानना था कि यदि देश को आगे बढ़ाना है, तो शिक्षा ही अकेला और सशक्त माध्यम है। सच बात तो यह है कि पंडित नेहरू, मौलाना आजाद को देश में शिक्षा की रोशनी फैलाने के लिए सबसे ज्यादा मुफीद शख्स मानते थे। लिहाजा उन्होंने शिक्षा मंत्री जैसी महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी मौलाना आजाद को सौंपी। मौलाना आजाद भी पंडित नेहरू के यकीन पर खरे उतरे। मौलाना आजाद ने स्वतंत्र भारत में शिक्षा का आधुनिक ढांचा खड़ा किया।

‘जामिया मिलिया इस्लामिया’ जैसी आला दर्जे की यूनिवर्सिटी के वे संस्थापक सदस्य रहे, तो वहीं ‘अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी’ का आधुनिक चेहरा भी उन्हीं की कोशिशों से मुमकिन हुआ। शिक्षा में मौलाना आजाद के योगदान को देखते हुए देश में कई शिक्षा संस्थानों के नाम उन्हीं के नाम पर रखे गए। मसलन ‘मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज दिल्ली’, ‘मौलाना आजाद कॉलेज कोलकाता’, ‘मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी हैदराबाद’, ‘मौलाना आजाद एजूकेशन फाउंडेशन’ और ‘मौलाना आजाद नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टैक्नोलॉजी भोपाल’ आदि। आधुनिक भारत निर्माण में मौलाना आजाद के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता।

(लेखक और वरिष्ठ पत्रकार जाहिद खान का लेख।)

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