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मीडिया ने पार कर दी है ‘अति सर्वत्र वर्जयेत’ की सीमा रेखा: सुप्रीम कोर्ट में अटॉर्नी जनरल

संस्कृत का बहुत प्रसिद्ध लघु सूत्र है ‘अति सर्वत्र वर्जयेत्’ जिसका हिंदी शब्दार्थ है, ‘अति करने से हमेशा बचना चाहिए।’ अति का परिणाम हमेशा हानिकारक होता है। आज ये सूक्ति मीडिया पर सटीक चरितार्थ हो रही है, जिसमें एक बड़े तबके ने गैरजिम्मेदाराना, निरर्थक, आधारहीन, अपमानजनक और टार्गेटेड लांछनात्मक रिपोर्टिंग को वास्तविक पत्रकारिता समझ लिया है। नतीजतन आज न्यायपालिका में कथित मीडिया ट्रायल को लेकर मुकदमों की बाढ़ आ गई है।

अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने बीते मंगलवार को उच्चतम न्यायालय में कहा कि बोलने की आजादी और अदालत की अवमानना कानून के बीच सामंजस्य स्थापित करने की तत्काल आवश्यकता है, क्योंकि मीडिया ‘अपने दायरे’ से बाहर जा रहा है। अटार्नी जनरल ने ‘मीडिया ट्रायल’ और अदालत में लंबित मामलों पर मीडिया टिप्पणियों के बारे में चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि अधिवक्ता प्रशांत भूषण के खिलाफ 2009 के अवमानना मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तैयार कानून के सवालों के साथ- साथ इन मुद्दों पर भी विचार करने की आवश्यकता है। लंबित मामलों के मुद्दे पर भी विचार करने की आवश्यकता है। आज, प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया स्वतंत्र रूप से लंबित मामलों पर टिप्पणी कर रहे हैं, न्यायाधीशों और सार्वजनिक धारणा को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं। यह संस्था को बहुत नुकसान पहुंचा रहा है।

वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण के ख़िलाफ़ अवमानना के एक मामले की उच्चतम न्यायालय में सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल ने कहा कि टीवी चैनल आरोपियों के निजी वॉट्सऐप चैट को प्रसारित कर रहे हैं, यह न्यायिक व्यवस्था के लिए बेहद ख़तरनाक है। माना जा रहा है कि अटॉर्नी जनरल ने अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत आत्महत्या की मौत से जुड़े ड्रग्स मामले को लेकर कुछ चैनलों द्वारा कुछ कलाकारों के वॉट्सऐप चैट को प्रसारित करने के संदर्भ में यह टिप्पणी की है।

प्रशांत भूषण के खिलाफ अवमानना के एक मामले की सुनवाई के दौरान केके वेणुगोपाल ने जस्टिस एएम खानविल्कर, बीआर गवई और कृष्ण मुरारी की पीठ से कहा कि बोलने की आजादी का बहुत दुरुपयोग हो रहा है और यह गलत दिशा में जा रहा है। वेणुगोपाल ने कहा कि कोर्ट में एक जमानत याचिका दायर की जाती है और टीवी चैनल आरोपी के प्राइवेट वॉट्सऐप चैट को प्रसारित करके हो-हल्ला करने लगते हैं। यह आरोपी के अधिकारों का उल्लंघन है और न्याय के प्रशासन के लिए बहुत खतरनाक है।

वेणुगोपाल ने कहा कि अदालत की अवमानना और बोलने की आजादी के बीच सामंजस्य बनाने की तत्काल आवश्यकता है, क्योंकि मीडिया अपनी सीमा से बाहर जा रहा है। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया विचाराधीन मामलों पर खुलेआम टिप्पणी कर रहे हैं तथा जजों एवं जनता के नजरिये को प्रभावित कर रहे हैं। यह संस्थान को बहुत नुकसान पहुंचा रहा है।

हालांकि प्रशांत भूषण की ओर से पेश वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने इससे सहमति नहीं जताई और कहा कि मीडिया को सिर्फ इस आधार पर टिप्पणी करने से रोका नहीं जा सकता है, क्योंकि मामला विचाराधीन है। अपनी इस दलील के समर्थन में धवन ने विदेशी न्यायालयों के कुछ आदेशों का उल्लेख किया। इस पर वेणुगोपाल ने कहा कि वे इस मामले पर धवन और कपिल सिब्बल, जो कि तहलका के तत्कालीन संपादक तरुण तेजपाल की ओर से पेश हुए हैं, के साथ चर्चा करेंगे और फिर कोर्ट के सामने अंतिम जवाब के साथ आएंगे। अटॉर्नी जनरल की मांग को स्वीकार करते हुए कोर्ट ने मामले को नवंबर महीने के पहले सप्ताह तक के लिए स्थगित कर दिया है।

भूषण पर आरोप है कि उन्होंने साल 2009 में तहलका पत्रिका को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि पिछले 16 मुख्य न्यायाधीशों में से कम से कम आधे भ्रष्ट थे। इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय कानून से जुड़े कई बड़े सवालों पर विचार कर रहा है, जो कि बोलने की आजादी और अदालत की अवमानना से जुड़े हुए हैं। प्रशांत भूषण के साक्षात्कार के खिलाफ वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे द्वारा की गई शिकायत के आधार पर उच्चतम न्यायालय ने अवमानना मामले की शुरुआत की। यह मामला, जो एक दशक से अधिक समय से निष्क्रिय पड़ा हुआ था, इस साल जुलाई में फिर से सामने आया, जब इस मामले को उच्चतम न्यायालय द्वारा भूषण के दो ट्वीट्स के खिलाफ नए अवमानना मामले के साथ सूचीबद्ध किया गया।

17 अगस्त को न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने विचार के लिए कानून के तीन प्रश्न तैयार किए थे। वे हैं, यदि न्यायाधीशों के भ्रष्टाचार को लेकर सार्वजनिक बयान दिए जा सकते हैं, तो उन्हें किन परिस्थितियों में और किस आधार पर दिया जा सकता है, और सुरक्षा उपायों, यदि कोई हो, के संबंध में क्या देखा जाना चाहिए? ऐसे मामलों में शिकायत करने के लिए क्या प्रक्रिया अपनाई जानी है जब आरोप न्यायाधीश के आचरण के बारे में है? तथा  क्या सेवानिवृत्त न्यायाधीश के खिलाफ, भ्रष्टाचार के रूप में कोई भी आरोप सार्वजनिक रूप से लगाया जा सकता है, जिससे न्यायपालिका में आम जनता का विश्वास हिल जाए, और क्या समान आचरण न्यायालय की अवमानना अधिनियम के तहत दंडनीय होगा? इसके अलावा, भूषण ने कानून के दस अतिरिक्त प्रश्न भी प्रस्तुत किए, जिस पर पीठ ने विचार करने के लिए सहमति व्यक्त की। 2 सितंबर को न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा की सेवानिवृत्ति के बाद यह मामला न्यायमूर्ति खानविलकर की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष सूचीबद्ध हो गया।

इससे पहले तबलीगी जमात के मामले में मीडिया की कवरेज को लेकर हाल ही में मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे की अगुवाई वाली पीठ ने कहा था कि बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार का हाल के समय में सबसे ज्यादा दुरुपयोग हुआ है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

This post was last modified on October 14, 2020 3:37 pm

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