सड़कों पर भूखे-प्यासों का उमड़ा सैलाब सरकारों की बेरहमी का सबसे बड़ा सबूत: माले

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लखनऊ। भाकपा (माले) ने कहा है कि उत्तर प्रदेश समेत देश भर की सड़कों पर तपती दोपहरी में गृहस्थी सर पर उठाए पैदल या अन्य साधनों से बच्चों-महिलाओं सहित लाखों प्रवासी मजदूरों के घर वापस लौटने के विचलित कर देने वाले दृश्यों ने जहां गरीबों के प्रति मोदी सरकार के निर्मम, असंवेदनशील व अमानवीय बर्ताव को उजागर किया है, वहीं महामारी से निपटने के उसके प्रबंधकीय कौशल व दूरदर्शिता पर भी सवाल खड़े किये हैं।

पार्टी के राज्य सचिव सुधाकर यादव ने शुक्रवार को जारी बयान में कहा कि आजाद भारत में अब तक के सबसे बड़े पलायन ने देश के हुक्मरानों द्वारा निर्मित आपदा को जन्म दिया है। महानगरों से आजीविका से मरहूम होकर गांव लौटता, रास्ते में वाहनों से कुचलकर या भूख से थक-हार कर जानें गंवाता, पुलिस की लाठियां खाता मजदूरों का सैलाब सरकारों की हृदयहीनता व नीतिगत विफलता का परिचायक है।

राज्य सचिव ने कहा कि महज चार घंटे की मोहलत देकर देशव्यापी लॉकडाउन लगाने वाली मोदी सरकार को इन स्थितियों का पूर्वानुमान और उसका निदान भी सोचना चाहिए था। लॉकडाउन में यदि प्रवासी मजदूर परिवारों की जीवन स्थितियां महानगरों में न्यूनतम भी रहने लायक होतीं, तो जान देने की जिद तक की पैदल यात्रा कर वे घर नहीं लौट रहे होते। यदि सरकारें चाहतीं, तो उनकी घर वापसी के लिए पर्याप्त बसों-ट्रेनों की व्यवस्था कर सकती थीं और सुरक्षित पहुंचा सकती थीं, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया है।

एसी स्पेशल ट्रेनें तो सबके लिए ‘पहले आओ पहले पाओ’ के आधार पर चलायी जा रही हैं, लेकिन प्रवासी मजदूरों के लिए पंजीकरण, प्रवास के राज्य व गृह राज्य की इजाजत लेने जैसे तमाम पेंच लगा दिए गए हैं। क्यों नहीं घर जाने की इच्छा रखने वाले सभी मजदूरों के लिए पर्याप्त परिवहन की व्यवस्था की जा रही है? क्यों मजदूरों के लिए अपने ही देश के भीतर राज्यों की सीमाओं को किसी पराये देश की सरहद के माफिक बना दिया गया है? यदि सरकारें मजदूरों की इस अकथनीय पीड़ा को देख कर भी अनदेखा न करें, तो नीतियों में समायोजन करके सबको कम-से-कम घर तक सुरक्षित पहुंचा सकती हैं।

लेकिन इसके बजाय, सरकारें चाहे भाजपा की हों या कांग्रेस की, इस अवसर का इस्तेमाल मजदूरों के अधिकार छीनने के लिए कर रही हैं। दशकों के संघर्षों से हासिल श्रम कानूनों को एक झटके में प्रशासनिक आदेश निकाल कर स्थगित कर देना, काम के घंटे आठ से बढ़ा कर 12 करना इसी तरह की कार्रवाई है। एक ऐसे समय में जब करोड़ों की संख्या में मजदूर आजीविका जाने से परेशान हों और प्रतिकार करने की स्थिति में भी न हों, उनके ऊपर हमले किये जा रहे हैं। संकट की घड़ी में एक तरह से उनका शिकार किया जा रहा है। योगी सरकार इसमें सबसे आगे है।

माले नेता ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी व वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा घोषित बीस लाख करोड़ रुपये के पैकेज का बड़ा हिस्सा दरअसल कर्ज बांटो कार्यक्रम है और यह मजदूरों-किसानों के साथ धोखा है। जिन विकराल समस्याओं का मजदूर व गरीब वर्ग इस समय सामना कर रहा है, उसका हल इस पैकेज में नहीं है, न ही भविष्य के प्रति कोई उम्मीद जगाता है।

(विज्ञप्ति पर आधारित।)

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