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इमरजेंसी की तरफ बढ़ सकती है मोदी सरकार

कहां तो जनाब कश्मीर को ठीक करने चले थे उल्टे पूरे देश को कश्मीर बना दिया। राजधानी दिल्ली तक में सरकार को कल इंटरनेट ठप करना पड़ा। देश की केंद्रीय सत्ता को तय करने वाले यूपी को यह स्वाद पिछले 24 घंटे से मिल रहा है। लेकिन कल के राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन ने इस बात को साबित कर दिया कि देश की बड़ी आबादी और खासकर युवा न केवल इस कानून के खिलाफ हैं बल्कि उसकी वापसी का दबाव बनाने की खातिर वे किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार हैं। इस आंदोलन में युवाओं की भागीदारी अभूतपूर्व थी। और उससे भी ज्यााद उसमें महिलाओं और बच्चियों की मौजूदगी एक नये भारत का एहसास करा रही थी।

तमाम पिछले आंदोलनों के मुकाबले यह आंदोलन इसी रूप में बिल्कुल अलहदा है। अभी तक लोगों को किसी भी आंदोलन के लिए नेतृत्व का इंतजार करना पड़ता था। यहां तक कि 75 की इमरजेंसी के खिलाफ भी जनता भले तैयार थी लेकिन नेतृत्व की कमी के चलते उसकी ताकत सड़क पर नहीं दिख रही थी। और जब जेपी सामने आए तब इमरजेंसी के खिलाफ एक नर्णायक लड़ाई आगे बढ़ सकी। लेकिन इस आंदोलन में परिसरों से उठती युवाओं की आवाज ने सत्ता के गलियारों में बैठे हुक्मरानों की नींद हराम कर दी है।

आईआईटी से लेकर आईआईएम और जामिया से लेकर हार्वर्ड तथा टिस से लेकर एम्स तक शायद ही देश का कोई प्रतिष्ठित संस्थान बचा हो जहां इस आंदोलन की गूंज न सुनायी दी हो। लिहाजा इस आंदोलन को अब किसी नेता का इंतजार नहीं है। यह आंदोलन अब नेता और नेतृत्व से बहुत आगे निकल गया है। युवाओं के रूप में सामने आयी देश की सामूहिक चेतना को इस बात का एहसास हो गया है कि पीछे लौटने का मतलब सब कुछ खत्म हो जाना है। और युवाओं के इस संकल्प को बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र और राज्य सरकारों ने भी महसूस कर लिया है।

हालांकि कल बीजेपी की सरकारों ने इस आंदोलन को रोकने और इसे सांप्रदायिक रंग देने की हरचंद कोशिश की। जिस तरह से उन्होंने धारा 144 लगाकर किसी भी कीमत पर लोगों को इकट्ठा होने से रोकने का प्रयास किया यह उसी बात का संकेत था। लेकिन जनता की सामूहिक एकजुटता के चलते उनके मंसूबों पर पानी फिर गए। वरना मोदी और बीजेपी की राज्य सरकारों से जरूर यह बात पूछी जानी चाहिए कि आखिर पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और केरल समेत तमाम विपक्ष शासित राज्यों में हिंसा क्यों नहीं हुई? यह हिंसा गुजरात, यूपी और कर्नाटक जैसे बीजेपी के शासन वाले राज्यों में ही क्यों हुई? दरअसल इसके दो कारण हैं।

एक तरफ सरकार जब लोगों को प्रदर्शन करने या फिर शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात कहने का मौका नहीं दे रही है तो एक दूसरे तरीके से उन्हें उग्र होने के लिए मजबूर कर रही है। दूसरी तरफ सरकार खुद चाह रही है कि इस आंदोलन को हिंसक बना कर इसे खत्म करा दिया जाए। क्योंकि हिंसा शुरू हो जाने पर किसी भी सरकार के लिए उसका दमन करना आसान हो जाता है। और उसके साथ ही लोगों की भागीदारी भी कम होनी शुरू हो जाती है। लिहाजा सरकार का पूरा जोर इस बात पर है कि इसको हिंसक बनाया जाए।

बीजेपी शासित राज्यों में धारा 144 लगाने का फैसला उसी मकसद का हिस्सा था। इसके साथ ही बीजेपी का पूरा जोर इसे सांप्रदायिक बनाने पर है। और वह चाहती है कि पूरा आंदोलन हिंदू बनाम मुस्लिम की बाइनरी में बंट जाए।अनायास नहीं अंदरूनी रिपोर्टों के मुताबिक गृहमंत्रालय से बाकायदा इस बात के निर्देश दिए गए हैं कि कैसे मुस्लिम बहुल इलाकों में हिंसा फैलायी जाए। इस लिहाज से अल्पसंख्यक बहुल इलाकों के थानों को समुदाय के बीच के अपराधी तत्वों को सक्रिय करने का निर्देश दिया गया है। जामिया से लेकर सीलमपुर और लखनऊ से लेकर मंगलुरू तक में हुई हिंसा के पीछे इसी तरह की रिपोर्टें आ रही हैं। जिसमें बताया रहा है कि शांतिपूर्ण आंदोलन के अंत में कुछ समूहों ने सक्रिय होकर तोड़-फोड़ शुरू कर दी और फिर जमकर हिंसा फैलायी।

कल लखनऊ में सामने आए एक वीडियो में बिल्कुल साफ तौर पर देखा और सुना जा सकता है कि कैसे अपराधी तत्वों को हिंसा फैलाने की छूट दी गयी है। चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा बलों की मौजूदगी की बात करने वाली लखनऊ पुलिस मौके से नदारद थी और आग लगने के तकरीबन आधे घंटे बाद दमकल की गाड़ियां मौके पर पहुंचीं। राजधानी में इस तरह की प्रशासनिक लापरवाही भलो कैसे हो सकती है। और अगर ऐसा हुआ है तो इस बात को दावे के साथ कहा जा सकता है कि यह 100 फीसद सोची समझी रणनीति का हिस्सा है।

ऐसा लगता है कि केंद्र की मोदी सरकार अपने गणित में नाकाम हो गयी। उसे इस बात का एहसास नहीं था कि मामला इतना जोर पकड़ लेगा। लिहाजा अब नागरिकता संशोधन कानून मोदी सरकार के गले की हड्डी बन गया है। इससे कैसे निकला जाए और कैसे संभाला जाए यह उसकी चिंता का सबसे बड़ा सवाल है। हालांकि सीधे तौर पर इसे वापस ले पाना उसके लिए बहुत मुश्किल है। क्योंकि यह उसकी बड़ी हार मानी जाएगी। इस लिहाज से उसके पास आगे तीन रास्ते बच रहे हैं। पहला सुप्रीम कोर्ट के जरिये।

शायद सुनवाई के लिए 22 जनवरी की तारीख भी इसी लिहाज से तय की गयी है। जिसमें यह बात शामिल है कि तब तक आंदोलन की स्थिति भी स्पष्ट हो चुकी होगी। लिहाजा सरकार और कोर्ट के लिए फैसला लेना आसान रहेगा। अगर पानी सिर के पार होता दिखा तो सुप्रीम कोर्ट के जरिये उसे असंवैधानिक करार देने का रास्ता उसके पास है। और अगर बीजेपी और उसकी सरकारें इसे अपने पक्ष यानी हिंदू-मुस्लिम करा ले जाने में सफल हो जाती हैं। तब उसे बरकरार रखना उनके हित में रहेगा।

एक दूसरा रास्ता भी सरकार के पास मौजूद है। जिसका उसने मौजूदा सेनाध्यक्ष बिपिन रावत के जरिये संकेत दे दिया है। अपने एक बयान में उन्होंने कहा है कि सीमा पर सीजफायर के उल्लंघन की घटनाएं बढ़ गयी हैं। साथ ही उन्होंने जनता को संबोधित करते हुए कहा कि इसके लिए आपको तैयार रहना चाहिए। इसी बात को हाल में बीते संसद सत्र के दौरान केंद्रीय गृहराज्यमंत्री रेड्डी ने आंकड़ों के जरिये बताया था। यह बताता है कि सरकार को किसी डायवर्जनरी टैक्टिस के लिहाज से अगर जरूरत पड़ी तो उसके पास एक विकल्प मौजूद है। वैसे भी यह सरकार किसी बीमारी का इलाज उससे भी बड़ी बीमारी को सामने लाकर करने के लिए जानी जाती है। लिहाजा मोदी सरकार पाकिस्तान के साथ एक और युद्ध में चली जाए तो किसी को अचरज नहीं होना चाहिए।

ऐसा इसलिए भी कहा जा सकता है कि जिस दिशा में सरकार देश को ले जाना चाहती है पाकिस्तान का वह युद्ध उसके लिए फायदेमंद साबित हो सकता है। इसमें मुसलमानों के साथ ही पाकिस्तान का एक और तत्व जुड़ जाएगा। और अभी जो जनता का हिस्सा भारतीय मुसलमानों के साथ जुड़कर आगे आ रहा है उसके लिए सरकार का विरोध करना मुश्किल हो जाएगा। क्योंकि तब मोदी सरकार के लिए उसे पाकिस्तान परस्त और देशद्रोही करार देना आसान हो जाएगा। इस लिहाज से इस बात की पूरी आशंका है कि मोदी सरकार पाकिस्तान के साथ सीमित युद्ध में जा सकती है।

इसके बाद भी अगर हालात पर काबू नहीं पाए जा सके तो फिर सरकार के लिए इमरजेंसी का रास्ता खुला है। और उसके पास बाहरी आक्रमण का एक आसान बहाना भी तैयार होगा। और फिर लोकतंत्र का यह भंग होना 75 से बिल्कुल अलग होगा। उस समय जो कुछ भी हो रहा था कम से कम संविधान के दायरे में था। लेकिन इस बार तो संविधान की चिंदी-चिंदी उड़ेगी। और 95 से ज्यादा सालों से इस इंतजार कर रहे संघ के लिए यह किसी मुंह मांगी मुराद जैसा होगा। जिसमें वह अपनी खून पीने की अतृप्त इच्छा को पूरा करने के लिए कोई कसर बाकी नहीं रखेगा। और इसके साथ ही पूरा देश अगर गृहयुद्ध की आग में जलने लगे तो किसी को अचरज नहीं होना चाहिए।

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संस्थापक संपादक हैं।)

This post was last modified on December 20, 2019 11:07 am

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Published by
Janchowk

Janchowk Official Journalists in Delhi