Sunday, May 22, 2022

खाद्य सुरक्षा के प्रति मोदी सरकार का रवैया अत्याचारी

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‘भारत’ को भले ही लाभ हो रहा हो, लेकिन भारतीयों को यूक्रेन युद्ध के नतीजों की चिंता करनी चाहिए। भले ही भारत सरकार और अनाज निर्यातक वैश्विक गेहूं के अभाव से लाभ उठाने की कोशिश कर रहे हैं, औसत नागरिक, जो पहले से ही बुरी हालत में है, बदतर स्थिति में जाने वाला है।

एक संकीर्ण दृष्टिकोण से, ‘भारत’ को यूक्रेन में युद्ध के कारण लगातार बिगड़ते खाद्य, ईंधन और संसाधन संकट के लाभार्थी के रूप में पेश किया जा रहा है। पिछले सप्ताह से इस आशय की मीडिया सुर्खियों का एक नमूना यहां दिया गया है:

भारत के लिए गेहूं निर्यात में बड़े अवसर को भुनाना चाहिए: मोदी (डेक्कन हेराल्ड)

क्यों यूक्रेन संकट निवेशकों के लिए भारत को अधिक आकर्षक बनाने का अवसर है (प्रिंट)

यूक्रेन युद्ध ने भारतीय कंपनियों को दिया अधिग्रहण का मौका (मिन्ट)

भारतीय अनाज व्यापारी देश का बड़ा गेहूं भण्डार (लगातार पांच बंपर फसल) और अंतरराष्ट्रीय कीमतों में वृद्धि का लाभ उठाने के लिए तैयार हैं, और पहले ही 5,00,000 टन गेहूं निर्यात के अनुबंध पर हस्ताक्षर कर चुके हैं। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारतीय गेहूं का निर्यात दो साल पहले लगभग दो लाख मीट्रिक टन (LMT) से बढ़कर 2021 में 21 LMT हो गया था, और सरकार अब 2022 में 70 LMT गेहूं निर्यात का लक्ष्य रख रही है।

रूस-यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में भारत का गेहूं निर्यात

राज्यसभा में चर्चा के दौरान, केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री, पीयूष गोयल ने कहा कि केंद्र सरकार भारत और भारत के निर्यातकों के लिए खुलने वाले अवसरों की लगातार निगरानी कर रही है। उन्होंने कहा कि केंद्रीय कृषि मंत्रालय रेलवे और जहाजरानी मंत्रालय के साथ समन्वय कर रहा है ताकि मौजूदा स्थिति को देखते हुए कृषि उत्पादों, विशेष रूप से गेहूं की निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित की जा सके।

उद्योग जगत के नेताओं के साथ एक वेबिनार में बात काते हुए, मोदी ने खुद भारत के लिए गेहूं के अप्रत्याशित लाभ पर ध्यान दिया। ”भारत के गेहूं के प्रति दुनिया का आकर्षण हाल ही में बढ़ा है। क्या हमारे वित्तीय संस्थान, निर्यात-आयात विभाग और शिपिंग उद्योग इसके लिए तैयार हैं? क्या वे भारत के लिए पैदा हुए बड़े अवसर को भुनाने के लिए व्यापक प्रयास कर रहे हैं, ”प्रधान मंत्री ने पूछा।

खाद्य सचिव सुधांशु पांडे के अनुसार, केंद्र सरकार ने विदेशों में राजनयिक मिशनों को अनाज के आउटबाउंड शिपमेंट की सुविधा के लिए कहा है। इस बीच, भारत की दो सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों, इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOC) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड ने हाल के सप्ताहों में 20% तक की भारी छूट पर 5 मिलियन बैरल रूसी कच्चा तेल खरीदा है।

हालांकि, युद्ध के बाद तेल की कीमतों में तेज उछाल को देखते हुए, इस तरह के लाभ जनता के लिए बचत में तब्दील नहीं होते। दरअसल, इस महीने सात दिनों के दौरान पेट्रोल और डीजल के दाम छह गुना बढ़ चुके हैं, जबकि रसोई गैस सिलेंडर की कीमत 50 रुपये ज्यादा होगी। समझा ही जा सकता है कि ईंधन की बढ़ती कीमत आवश्यक वस्तुओं को आम आदमी की पहुंच से बाहर कर देगी।

उर्वरकों के मामले में भारत भी असुरक्षित है- उर्वरकों के प्रत्यक्ष आयात के मामले में, और आयातित प्राकृतिक गैस के मामले में भी, जो उर्वरक के उत्पादन में एक अपूर्णीय कच्चा माल है। जैसा कि पत्रकार कौशल श्रॉफ ने उल्लेख किया है, हम अपनी यूरिया आवश्यकताओं के 25%, फॉस्फेट के मामले में 90% (कच्चे माल के रूप में या तैयार उर्वरक के रूप में) और पोटाश के मामले में 100% के लिए आयात पर निर्भर हैं। भारत की पोटाश आपूर्ति का एक तिहाई रूस (जिसने अब निर्यात बंद कर दिया है) और उसके सहयोगी बेलारूस से प्राप्त किया जाता है, जो अब प्रतिबंधों का सामना कर रहा है।

श्रॉफ आगे भारत जैसे बड़े आयातकों के लिए प्राकृतिक गैस की बढ़ती कीमतों के आर्थिक बोझ के बारे में बताते हैं। “एसबीआई के एक शोध नोट के अनुसार, पूल्ड गैस की दर में हर एक डॉलर की बृद्धि के लिए, भारत का उर्वरक सब्सिडी बिल 4,000-5,000 करोड़ रुपये तक बढ़ जाता है।” और यह सिर्फ उर्वरक उत्पादन के कारण है। विश्लेषकों को अब उम्मीद है कि विनियमित गैस की कीमतें तत्काल भविष्य में कम से कम दोगुनी हो जाएंगी, जिससे भारत पर उर्वरक सब्सिडी का बोझ काफी बढ़ जाएगा।

यहां, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि लॉकडाउन से संबंधित व्यवधानों के कारण 2020 से उर्वरकों में वैश्विक संकट है, जिसने भरतीय किसानों को प्रभावित किया है। एक रिपोर्ट के अनुसार, “डीएपी (लोकप्रिय उर्वरक डाई-अमोनियम फॉस्फेट) की कमी रबी 2021 में सबसे अधिक महसूस की गई थी … कई जिलों में इसे राशन किया गया था, और किसानों को सीमित मात्रा में उर्वरक बेचा गया। उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले में, 55 वर्षीय किसान भोगी पाल की मौत खाद खरीदने के लिए कतार में खड़े खड़े हो गई… उर्वरकों की कमी के कारण जब संकट गंभीर हो गया, अक्टूबर-नवंबर 2021 में व्यापक विरोध हुआ। हरियाणा के हांसी जिले में किसान अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर चले गए। इस तरह के विरोध हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और बिहार में भी देखे गए।

जबकि उर्वरक मंत्री मनसुख मंडाविया ने कहा है कि भारत को लगभग 30 मिलियन टन उर्वरक खरीफ (गर्मी में बोई जाने वाली फसल) के मौसम में ज़रूरत होगी और इसकी “व्यवस्था की गई है;” उन्होंने इस पर विस्तार से कुछ नहीं बताया। इस बीच, यह बताया गया है कि इंडियन पोटाश लिमिटेड (आईपीएल) ने कमी को पूरा करने के लिए कनाडा, इज़राइल और जॉर्डन से आयात बढ़ा दिया है, और भारत सरकार एक मिलियन टन पोटाश खरीदने के लिए बेलारूस के साथ बातचीत कर रही है। जैसा कि दुनिया भर की सरकारें उर्वरक आपूर्ति के लिए हाथ-पैर मार रही हैं, यह स्पष्ट नहीं है कि भारत रूस और यूक्रेन से उर्वरक आयात की भरपाई किस हद तक कर पाएगा।

नीतिगत अत्याचारों का ट्रैक रिकॉर्ड

राज्यसभा चर्चा के दौरान, गोयल ने सदन को सूचित किया कि प्रधानमंत्री ने इस वर्ष गेहूं के निर्यात के लिए अधिक आक्रामक लक्ष्य निर्धारित किया है, और मोदी को उद्धृत करते हुए कहा, “इस अवसर का लाभ उठाएं ताकि हम पूरी दुनिया को इतनी अच्छी गुणवत्ता वाला गेहूं दें कि हमारे गेहूं का स्वाद सबको इतना (अच्छा) लग जाए, उसके बाद (सिर्फ) हमारे देश का ही गेहूं निर्यात हो”

आलोचक इसे प्रधानमंत्री के खोखले जुमलों के रूप में भले ही देख सकते हैं। हालाँकि, स्वतंत्रता के बाद के युग में, उनकी सरकार के ट्रैक रिकॉर्ड को देखें तो, गेहूं के निर्यात पर मोदी के बयान में सबसे खराब आजीविका और भूख संकट से जूझ रहे देश के लिए अशुभ संकेत हैं – एक संकट जो लगभग पूरी तरह से उनकी सरकार की अनुपयुक्त व कठोर नीतियों का परिणाम है।

आखिरकार, यह वही सरकार है जिसने भारत के कोविड -19 संकट के चरम पर ऑक्सीजन निर्यात को दोगुना कर दिया, जब सैकड़ों लोग ऑक्सीजन की कमी के कारण देश भर के अस्पतालों में एक-एक सांस के लिए जूझ रहे थे, राज्य सरकारें अतिरिक्त आपूर्ति के लिए केंद्र से गुहार लगा रही थीं। वाणिज्य विभाग के आंकड़ों से पता चला है कि भारत ने पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में वित्त वर्ष 2020-21 के पहले दस महीनों के दौरान दुनिया को दोगुना मेडिकल ऑक्सीजन – 9,301 मीट्रिक टन बेचकर 8.9 करोड़ रुपये कमाया।

इसी तरह, विदेश मंत्रालय द्वारा प्रकाशित आंकड़ों से पता चलता है कि सरकार ने ‘वैक्सीन मैत्री पहल’ के बैनर तले कुल 95 विदेशी संस्थाओं को मेड-इन-इंडिया टीकों की लगभग 6.6 करोड़ खुराक भेजी, जिनमें से 5 करोड़ से अधिक खुराकें वाणिज्यिक सौदों, संयुक्त राष्ट्र की COVAX सुविधा और GAVI गठबंधन के हिस्से के अंतर्गत थीं। जैसा कि इंस्टीट्यूट ऑफ पीस एंड कॉन्फ्लिक्ट स्टडीज, दिल्ली के अंशुमान चौधरी ने उल्लेख किया है, “भारत का निर्यात कार्यक्रम इतना आक्रामक था कि पिछले महीने संसद के समक्ष सरकार के स्वयं के प्रस्तुतीकरण के अनुसार, मार्च के मध्य में भारतीयों की तुलना में अधिक शॉट देश से बाहर भेजे गए थे। विशेष रूप से, इस समय तक, केसलोड फिर से ऊपर चढ़ना शुरू हुआ था; भारत में 15 मार्च को 23,000 से अधिक मामले दर्ज किए गए थे।

जैसा कि विश्लेषक प्रवीण चक्रवर्ती ने उल्लेख किया है, मोदी सरकार ने पिछले सात वर्षों में प्रत्येक भारतीय परिवार से औसतन 1 लाख रुपये का ईंधन कर एकत्र किया है, भले ही इस अवधि के दौरान तेल की कम कीमतों से उसे अप्रत्याशित लाभ हुआ हो। फिर भी, इसी अवधि में, देश में गरीबी, भूख और कुपोषण केवल बढ़ा था। जैसा कि चक्रवर्ती बताते हैं, मोदी सरकार के कार्यकाल में यह पहली बार है कि वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर गई हैं, और यह देखा जाना बाकी है कि सरकार संकट से कैसे निपटेगी।

खाद्य सुरक्षा के प्रति मोदी सरकार का रवैया अत्याचारी रहा है। पिछले साल, बार-बार बंपर फसल के बाद खाद्य भंडार में अपनी ‘बहुतायत की समस्या’ को हल करने का प्रयास करते हुए, केंद्र ने लगभग 78,000 टन चावल डिस्टिलरीज को आवंटित किया, जिसे भारतीय खाद्य निगम (FCI) द्वारा 37 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से इथेनॉल 20 रुपये प्रति किलो की रियायती दर पर उत्पादन के लिए खरीदा गया था। । खाद्य मंत्रालय ने आने वाले वर्षों में उद्योग को अनाज आवंटन बढ़ाने के अपने इरादे की भी घोषणा की, और अनुमान लगाया कि 2025 तक इथेनॉल का उत्पादन करने के लिए लगभग 165 लाख टन अनाज का उपयोग किया जाएगा। जैसा कि एक विश्लेषक ने कहा, “अच्छी गुणवत्ता वाले चावल का उपयोग इथेनॉल का निर्माण करने हेतु निर्णय किसी भी समय के लिए एक खराब नीति है, विशेष रूप से महामारी के दौरान अनैतिक है।”

जैसा कि हाल ही में हंगर वॉच के सर्वेक्षण से पता चला है, दरअसल, जब देश में पहली बार महामारी आई उसके केवल दो साल बाद ही भारत में गरीबी और भूख तेज़ रफ्तार से बढ़े, भले ही सरकार ने अपनी विभिन्न खाद्य सुरक्षा योजनाओं की सफलता की तुरही बजाई हो। निष्कर्ष अभूतपूर्व हैं: 66% उत्तरदाताओं ने आय हानि की सूचना दी, जबकि 79% परिवारों ने किसी न किसी रूप में खाद्य असुरक्षा की सूचना दी, जो चौंकाने वाली संख्या है।

मोदी सरकार के इस ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए, भारतीयों को खाद्य निर्यात में भारत की अप्रत्याशित वृद्धि का जश्न मनाने वाली रिपोर्टों से सावधान रहना चाहिए, और उन सरकारी पंडितों से जिन्होंने सरकार से खाद्य क्षेत्र में नव-उदारवादी सुधारों की शुरुआत करते हुए अंतर्राष्ट्रीय संकट का लाभ उठाने का आग्रह किया। ऐसा इसलिए कि ऐतिहासिक रूप से, इस सरकार और उसके द्वारा सक्षम बनाए गए निजी खिलाड़ियों द्वारा कमाए गए लाभ ने कोई जरूरी नहीं कि भारतीय जनता, और कम से कम, कमजोर समूहों को, लाभान्वित किया हो।

कगार पर भारत

कड़वी सच्चाई यह है कि भारत में अत्यधिक गरीबी का ‘विरोधाभास’ अपवाद के बजाय आदर्श रहा है। चौंकाने वाली बात यह है कि दुनिया में दूध, दाल और बाजरा का सबसे बड़ा उत्पादक और चावल, गेहूं, गन्ना, मूंगफली, सब्जियों और फलों का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश दुनिया के 40% कम वजन वाले लोगों (200 मिलियन से अधिक लोगों) का देश है।

पहले के एक लेख में, इस लेखक ने कई कारणों को रेखांकित किया था – सर्वोपरि, खाद्य, ईंधन और उर्वरक पर प्रभाव – जो हाल के इतिहास में यूक्रेन युद्ध को किसी भी अन्य संघर्ष से भिन्न बनाते हैं। जबकि भारत सरकार, मीडिया का एक हिस्सा और निजी खिलाड़ी इस संकट से ‘भारत’ द्वारा कमाए गए लाभ का जश्न मना रहे हैं, तथ्य यह है कि यूक्रेन युद्ध के नतीजे न केवल भारतीय गरीबों के लिए, अब अधिकांश भारतीयों के लिए बुरे दिन के संकेत दे रहे हैं।

(सजय जोस एक शोधकर्ता और पत्रकार हैं। कोविड रिस्पांस वाच में अंग्रेजी में प्रकाशित इस लेख का हिंदी अनुवाद कुमुदिनी पति ने किया है।)

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