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Thursday, September 23, 2021

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250 से ज्यादा किसान संगठनों का कल दिल्ली कूच, सरकार ने की जगह-जगह नाकाबंदी

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नई दिल्ली। अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति और एआईकेएससीसी के राष्ट्रीय वर्किंग ग्रुप के साथ ही राज्य स्तरीय संयोजकों ने एलान किया है कि 26 और 27 नवंबर 2020 से ‘दिल्ली चलो’ कार्यक्रम की तैयारी पूरे जोर-शोर के साथ अमल में लाई जा रही है। प्रेस को जारी बयान में एआईकेएससीसी के राष्ट्रीय और राज्य स्तर के नेताओं ने कहा कि अगर केंद्र सरकार ने उनकी मांगें नहीं मानीं तो किसानों का विरोध अनिश्चितकालीन विरोध के रूप में जारी रहेगा। उन्होंने कहा कि किसानों का 26 नवंबर का ‘दिल्ली चलो’ का अनिश्चितकालीन संघर्ष पूरी ताकत के साथ शुरू किया जा चुका है और अब यहां से यह तेजी पकड़ता जाएगा। मुख्य मांगों में तीनों केंद्रीय कृषि कानून रद्द किए जाने और ‘बिजली बिल-2020’ को वापस लिए जाने की मांगें शामिल हैं, जो किसान विरोधी और जन विरोधी हैं। इससे मुख्यतः हमारी खेती और हमारी खाद्यान्न व्यवस्था पर कॉरपोरेट नियंत्रण को विस्तारित करने के लिए लाया जा रहा है।

राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के संयोजक वीएम सिंह ने पूर्व घोषित कार्यक्रम पर पुनः जोर देते हुए देश भर के किसानों से आग्रह किया कि वे अपनी मांगों पर जोर देने के लिए दिल्ली की ओर कूच करें। उन्होंने समाज के अन्य तबकों से भी अपील की कि वे अन्नदाताओं के हितों की रक्षा के लिए इन वाजिब मांगों के पक्ष में बढ़चढ़ कर समर्थन में सामने आएं और किसानों के विरोध को सहयोग दें। पंजाब, हरियाणा, उप्र, उत्तराखंड, राजस्थान, मध्य प्रदेश और अन्य राज्यों से दसियों हजार किसान दिल्ली के लिए विभिन्न दिशाओं से तथा अलग-अलग परिवहन से चल चुके हैं। कर्नाटक, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश से भी सैकड़ों की संख्या में किसान नेता चल कर दिल्ली पहुंच रहे हैं।

एआईकेएससीसी के राष्ट्रीय वर्किंग ग्रुप के नेताओं ने हरियाणा भाजपा सरकार द्वारा किए जा रहे किसानों पर दमन और कई किसान और ट्रेड यूनियन नेताओं की कल रात से की जा रही गिरफ्तारी की कड़ी निंदा की है। हरियाणा से कल रात 21 नेताओं को हिरासत में लिया गया है। उन्होंने कहा, ‘‘ऐसा दमन किसानों के संघर्ष को और मजबूत ही करेगा, क्योंकि उनके लिए यह जीने और मरने का सवाल बन चुका है।” एआईकेएससीसी ने केंद्र सरकार द्वारा जनविरोधी नीतियों के खिलाफ नागरिकों के विरोध करने के जनवादी अधिकार को बाधित करने के लिए कोविड-19 के खतरे का इस्तेमाल करने की कड़ी निंदा की है। एआईकेएससीसी ने साफ तौर पर कहा है कि केंद्र सरकार खेती में बड़ी कंपनियों और विदेशी कंपनियों के हितों को बढ़ावा देने के लिए कोविड-19 की धमकी को बढ़ा-चढ़ा कर पेश कर रही है।

नेताओं ने कहा, “कोविड-19 देखभाल में बहुत से चिकित्सीय और रोकथाम के कदमों, जैसे मास्क, सेनेटाइजर बांटना तथा वंचितों व बेरोजगारों की शारीरिक देखभाल आदि जरूरी हैं, जिनमें भारत सरकार का प्रदर्शन बहुत खराब रहा है। सहयोग की जगह सरकार जुर्माना लगाने और पुलिस कार्रवाइयां कर रही है, जो न केवल नुकसानदेह हैं, बल्कि उनका मकसद लोगों पर दोष मढ़ना और उन्हें निराशा में लाना है।”

नेताओं ने कहा कि जहां सरकार द्वारा कोविड देखभाल के कमजोर कदम जनता के विभिन्न तबकों को प्रभावित कर रहे हैं, वही तीनों काले खेती के कानून और बिजली बिल-2020 भारत के किसानों की कई पीढ़ियों को नष्ट कर देंगे, क्योंकि इनसे खेती, बाजार और खाद्यान्न आपूर्ति श्रृंखला कृषि व्यापारियों के हाथ में सिमट जाएगी। नेताओं ने कहा, ‘‘जहां देश के किसान कोविड देखभाल की तमाम हिदायतों को अमल करने के लिए प्रतिबद्ध हैं, वे अपने संघर्ष को जारी रखने के लिए भी संकल्पबद्ध हैं। भारत सरकार को किसानों को नुकसान पहुंचाने के लिए कोविड के खतरे का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।”

दिल्ली से दूर जहां से रेल सेवा की कमी के कारण दिल्ली पहुंचना कठिन है, वहां ताल्लुका, जिला, राज्य स्तर पर विरोध आयोजित किए जा रहे हैं। झारखंड में राजधानी में राजभवन की ओर मार्च किया जाएगा। कर्नाटका में 1000 स्थानों पर ग्रामीण कर्नाटक बंद आयोजित करेंगे। विभिन्न जिलों में किसान गोलबंद होकर संघर्ष तेज कर रहे हैं। 26 नवंबर को तमिलनाडु में 500 स्थानों पर रास्ता रोको और रेल रोको आंदोलन आयोजित होगा, जिसमें मजदूर भी किसानों का साथ देंगे। जिला और ताल्लुका स्तर पर पूर्वी उप्र, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में विरोध आयोजित होंगे। तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में 26 नवंबर को ग्रामीण हड़ताल होगी और केंद्र सरकार के कार्यालयों पर सभी जिलों में 27 को प्रदर्शन किए जाएंगे।

आंध्र प्रदेश में 27 नवंबर को बिजली बिल और सुधारों के खिलाफ सब स्टेशनों पर प्रदर्शन किए जाएंगे। दक्षिण ओडिशा में 26 नवंबर को तीन कृषि कानूनों के खिलाफ सम्पूर्ण बंद आयोजित होगा और 27 नवंबर को विरोध प्रदर्शन आयोजित होंगे। महाराष्ट्र में 26 नवंबर को ग्रामीण हड़ताल के अमल में 37 जिलों के 200 तहसीलों में मंडियां बंद की जाएंगी, तहसील स्तर के प्रदर्शन होंगे। कुछ जिलों में दिल्ली के विरोध के समानांतर अनिश्चित विरोध शुरू किए जाएंगे। 26 और 27 नवंबर को बिहार के सभी ब्लाक मुख्यालयों पर धरने-प्रदर्शन होंगे, जिसमें नवनिर्वाचित विधायक भी भाग लेंगे। पश्चिम बंगाल में सभी जिलों में ग्रामीण हड़ताल होगी। 500 से ज्यादा सम्मेलन और कार्यक्रम पिछले हफ्तों में राज्य में आयोजित किए गए हैं।

प्रेस को बयान जारी करने वालों में जय किसान आंदोलन के संगठन मंत्री आविक साहा, आल इंडिया किसान मजदूर सभा के डॉ. आशीष मित्तल और वी वेंकटरमैया, आल इंडिया किसान सभा के डॉ. अशोक धावाले और हनन मौला, आल इंडिया किसान सभा के अतुल कुमार अंजान और भूपेंद्र सामर, क्रांतिकारी किसान यूनियन के डॉ. दर्शनपाल, बीकेयू धकौंडा के जगमोहन सिंह, किसान स्वराज से कविता कुरुगंती, किरन विस्सा, आशा, किसान राज्य रायता संघ के कोडीहल्ली चंद्रशेखर, नेशनल एलायंस फार पीपुल्स मुवमेन्ट्स से मेधा पाटकर, लोक संघर्ष मोर्चा से प्रतिभा शिंडे, आल इंडिया किसान महासभा से राजाराम सिंह और प्रेम सिंह गहलावत, स्वाभिमानी शेतकारी संगठन से राजू शेट्टी, संगटिन किसान मजदूर संगठन से रिचा सिंह, जमूरी किसान सभा से सतनाम सिंह अजनाला, आल इंडिया किसान खेत मजदूर संगठन से सत्यवान, किसान संघर्ष समिति से डॉ. सुनीलम, तेराई किसान सभा से तजिंदर सिंह विग, जय किसान आंदोलन से योगेंद्र यादव, राज्य संयोजक और समन्वयकर्ता में कार्तिक पाल, एआईकेएससीसी, पश्चिम बंगाल, के. बालकृष्णन, एआईकेएससीसी, तमिलनाडु, जीसी बायारेड्डी, एआईकेएससीसी, कर्नाटका, वड्डे सोबनाद्रिश्वरा राव, एआईकेएसीसी, आंध्र प्रदेश, भालचंद्र, एआईकेएससीसी, ओडिशा शामिल हैं।

उधर, आल इंडिया सेंट्रल कॉउंसिल ऑफ ट्रेड यूनियंस aicctu (ऐक्टू) ने कहा है कि अखिल भारतीय आम हड़ताल (26 नवंबर) का उत्तराखंड में भी व्यापक असर रहेगा। ऐक्टू के प्रांतीय महामंत्री कॉ. केके बोरा ने कहा कि तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। तमाम किसान-मजदूर मोदीशाही के खिलाफ सड़कों पर उतरेंगे। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार सरकारी फैक्ट्रियों, निगमों, विशालकाय संस्थाओं को बेच रही है। दूसरी तरफ मजदूरों के हितैषी 44 लेबर कानून ख़त्म कर दिए गए हैं। ये सब भाई-भतीजे वाले लुटेरे कॉरपोरेट पूंजीवाद को पनपाने की साजिश है। इसके चलते सभी कामगारों चाहे वो वाइट कॉलर जॉब के प्रोफेशनल हों या मध्यवर्गीय निम्नवर्गीय मजदूर हों, सब की  नोकरियों में बंधुवागिरि हो जानी है। मोदिशाही ने संरक्षित/प्रोटेक्शन को ख़त्म कर  भयावह बेरोजगारी को पूंजीवाद के लिए आम की गुठली की तरह चूसने और फेंक देने के लिए छूट दे दी है।

उन्होंने कहा कि अभी तक मौजूद सामाजिक सुरक्षा ईएसआई, ईपीएफ, पेंशन, बिल्डिंग, चाय, बीड़ी, सिनेमा, असंगठित, चूना, ईंट भट्टा, प्रवासी आदि मजदूरों के हित बोर्ड और नियम खत्म कर अंग्रेजी राज से भी बदतर हालातों में धकेला जा रहा है। अंग्रेजी राज को 1924 में ट्रेड यूनियन का अधिकार कानूनी तौर पर देना पड़ा था, मगर मोदीयुग ने यूनियन के अधिकार को अंग्रेजी राज से भी बुरा आपराधिक बनाने के नियम बना डाले हैं। अब हड़ताल पर जुर्माना और जेल को कानूनी बनाया जा रहा है।

कॉ. केके बोरा ने बताया कि मजदूरों को गुलाम बनाने की मोदी कानून की व्यवस्था के खिलाफ ये हड़ताल लगातार संघर्ष का एलान है। 26 नवंबर की हड़ताल मजदूरों के प्रतिवाद की शुरुआत है। समूचे देश में मजदूर परस्त यूनियन इस हड़ताल में शामिल है। उत्तराखंड में भी इस हड़ताल का व्यापक असर रहेगा। NHPC, ONGC, बैंक बीमा, पोस्टल, सेंट्रल के अलावा उद्योगों, निर्माण, आशा आंगनबाड़ी, भोजनमाता समेत परिवहन, रेल में भी हड़ताल और समर्थन कार्यक्रम होंगे। AICCTU की समस्त यूनियंस हड़ताल की तैयारियों में जुटी हैं।

उन्होंने कहा कि अन्य सेंट्रल ट्रेड यूनियनों में भी व्यापक कार्यवाही की सूचनाएं साझा की हैं। देहरादून में गांधी पार्क, हलद्वानी में बुद्ध पार्क रुद्रपुर में शुक्ला पार्क में बड़े आयोजन की तैयारियां हैं। उन्होंने सभी कामगारों से हड़ताल को सफल बनाने का आह्वान किया है।

बदायूं में लोकमोर्चा ने किसान सत्याग्रह शुरू करने की घोषणा की है। किसान सत्याग्रह द्वारा गन्ना मूल्य घोषित करने, गन्ना बकाये का भुगतान करने, शेखुपुर चीनी मिल की क्षमता बढ़ाने समेत किसानों के मुद्दों को उठाया जाएगा। लोकमोर्चा संयोजक अजीत सिंह यादव ने कहा कि किसानों के गन्ना बकाया के लिए संघ-भाजपा की योगी सरकार जिम्मेदार है। विधानसभा चुनाव के पहले प्रधानमंत्री मोदी द्वारा जारी भाजपा के संकल्प पत्र में गन्ना खरीद के 15 दिनों के अंदर गन्ना भुगतान करने का वादा किया गया था, लेकिन सत्ता में आने के बाद भाजपा सरकार ने किसानों के साथ धोखाधड़ी की है।

पेराई सत्र शुरू होने के एक माह बाद भी अभी तक योगी सरकार ने सूबे में गन्ना मूल्य घोषित नहीं किया है, जिसके चलते चीनी मिलें गन्ना भुगतान नहीं कर रही हैं। लाखों किसानों का नए सत्र का गन्ना बकाया भुगतान नहीं हो पा रहा है, जबकि गन्ना कानून में खरीद के 15 दिनों के अंदर भुगतान का प्रावधान है। पिछले वर्ष का हजारों करोड़ रुपये गन्ना बकाया का भुगतान भी तक किसानों को नहीं मिला है। बदायूं जनपद में ही किसानों का 70 करोड़ रुपये के करीब भुगतान बकाया है, जिससे किसानों के सामने भुखमरी का संकट पैदा हो गया है।

लोकमोर्चा संयोजक ने कहा कि संघ-भाजपा की योगी सरकार चीनी मिल मालिकों से मिलीभगत कर किसानों को धोखा दे रही है। किसान सत्याग्रह के द्वारा गन्ना किसानों समेत जनपद के किसानों की आवाज को उठाया जाएगा। सरकारों से समाधान की मांग की जाएगी। सत्याग्रह के अंतर्गत उपवास, धरना प्रदर्शन, पदयात्राएं, बैठकें, किसान जागरण यात्राएं आदि आयोजित की जाएंगी।

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