किसान आंदोलन: आर्थिक पिछड़ापन और प्रतिकूल मौसम किसानों के लिए हुए जानलेवा साबित

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26 नवंबर 2020 से दिल्ली की सीमा पर शुरू हुए किसान आंदोलन ने 26 मई को छः महीने पूरे कर लिये। किसान आंदोलन के इन छः महीने की मियाद में कुल 477 किसानों ने अपनी जान गँवायी है। इनमें से 31 किसानों ने आत्महत्या की है बाक़ी की मौत प्रतिकूल मौसम से हुई है। जबकि कुछ मौतें एक्सीडेंट के चलते भी हुयी हैं लेकिन इनकी संख्या नगण्य है। अप्रैल-मई में जब कोविड-19 की दूसरी लहर पीक पर थी तब भी किसानों की मौत में इजाफा दर्ज़ किया गया।  

किसान आंदोलन में नवंबर महीने में (26-30 नवंबर) 5 किसानों की मौत हुयी। दिसंबर महीने में 58 किसानों की मौत दर्ज़ हुयी। जनवरी महीने में जब मौसम सबसे ज़्यादा प्रतिकूल था, ठंड चरम पर थी तब सबसे ज़्यादा 132 किसानों की मौत हुयी। वहीं फरवरी में 75 और मार्च में 71 किसानों की मौत किसान आंदोलन के दौरान हुयी। गौरतलब है कि मार्च महीने में गर्मी का पारा पिछले 7 दशक का रिकॉर्ड तोड़ रहा था। तब भी किसानों की मौत में वृद्धि दर्ज़ की गयी। कोरोना की दूसरी लहर के बीच किसान आंदोलन में अप्रैल महीने में कुल 79 किसानों की मौत और मई महीने में (22 मई तक) कुल 57 किसानों और कृषि मजदूरों की मौत हुयी है। अप्रैल में कुछ मौतें कोविड के चलते भी हुयी हैं।

आर्थिक पिछड़ापन और उम्र मुख्य कारक

किसान आंदोलन के दौरान हुयी 477 मौतों में आयु और आर्थिक स्थिति मुख्य कारक रही है। सबसे बड़ा कारक उनकी आर्थिक स्थिति रही है। मरने वाले अधिकांश लोग या तो बहुत छोटी जोत (1-3 एकड़ जमीन) के मालिक थे या फिर कृषि मजदूर। और अधिकांश लगभग 80 प्रतिशत किसान और कृषि मजदूर कर्ज़ के बोझ तले दबे थे। जबकि दूसरा मुख्य कारक उम रही। मरने वाले किसानों में लगभग 70 प्रतिशत किसानों की उम्र 60 वर्ष से अधिक थी। जाहिर है आयु बढ़ने के साथ व्यक्ति कि रोग प्रतिरोधक क्षमता और मौसम के हालात से सामंजस्य बिठाने की क्षमता कम होती जाती है।

खबर से सम्बंधित लिंक-

https://humancostoffarmersprotest.blogspot.com/2020/12/list-of-deaths-in-farmers-protest-at.html?m=1

दिसंबर, जनवरी, फरवरी में कुल 265 मौतें हुयी। इनमें से अधिकांश मौतें हर्ट अटैक, न्यूमोनिया और कोल्ड स्ट्रोक से हुयीं। जाहिर है ठंड और शीतलहहर जैसे प्रतिकूल मौसम से बचने का सबसे कारगर हथियार गर्म कपड़े, आग और मौसन के अनुकूल खाना होता है। जाहिर गर्म कपड़े बहुत महंगे मिलते हैं जो कि आर्थिक रूप से गरीब तबके की पहुंच के बाहर होती हैं। ऐसे में उन्हें बहुत कम गर्म कपड़ों में ठंड का मौसम बिताना पड़ता है। यही कारण है कि हर साल देश में लाखों लोग केवल ठंड के चलते मरते हैं। किसान आंदोलन के दौरान सड़क पर टेंट में, ओढ़ने बिछाने और पहनने के लिये बहुत कम और अपर्याप्त गर्म कपड़ों के रहने के चलते ये मौतें हुयी हैं। 

वहीं मार्च महीने में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के पैमाने को पार कर गया था। 29 मार्च को पारे ने 75 साल पुराने साल 1945 के रिकार्ड को तोड़ते हुये 40.1 डिग्री तापमान को छुआ था।

ठंड से मौत के कुछ केस

किसान आंदोलन में किसानों की मौत का एक पैटर्न रहा है। जैसे कि एक खास समय (प्रतिकूल मौसम) में ज़्यादा मौतें हुयी हैं। जनवरी के पहले पखवारे में जब दिल्ली में तापमान 0 से 10 डिग्री तापमान था और शीतलहर और बारिश का प्रकोप ज़्यादा था तब किसान आंदोलन में ज़्यादा मौतें हो रही थी और युवा किसान भी ठंड, शीतलहर, और ठंड से हार्ट अटैक से मरे। जनवरी के पहले पखवारे में किसान आंदोलन में मरने वाले अधिकांश लोगों को सीने और पेट में तीव्र दर्द होने की बात सामान्य तौर पर दर्ज की गयी साथ ही इन मौतों में अधिकांश में वजह हार्ट अटैक बताया। 18-20 साल के युवकों की मौत की वजह भी हर्ट अटैक बतायी गयी। दिसंबर के आखिरी सप्ताह से जनवरी के पहले पखवारे जब ठंड अपने उरूज पर थी तब औसतन रोजाना 6 मौतें हुयी।

17 जनवरी को ही 22 वर्षीय परविंदर सिंह पुत्र गुरजन्त सिंह की मौत ठंड लगने से हो गयी थी। टिकरी बॉर्डर पर ठंड लगने से परविंदर की तबियत अचानक बिगड़ी तो उन्हें नजदीकी अस्पताल ले जाया गया जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गयी। परविंदर सिंह 3 एकड़ खेतिहर ज़मीन थी और उन्होंने सूदखोरों से कर्ज़ ले रखा था। वो पंजाब के मलौत जिले कि औलख गांव के निवासी थे।  

17 जनवरी को ही 20 वर्षीय प्रीतपाल सिंह पुत्र मंजीत सिंह की मौत हो गयी थी। प्रीतपाल छोटी जोत के किसान थे। और वो दिल्ली बॉर्डर से एक दिन पहले ही अपने गांव सेखू वापिस लौटे थे। प्रीतपाल की मौत ठंड लगने के चलते हुयी थी। तीन महीने पहले ही उनका विवाह हुआ था।   

14 दिसंबर मोगा जिले के बिंदर कलां गांव के एक 45 वर्षीय कृषि मजदूर मखण खान की सिंघु सीमा पर हृदय गति रुकने से मौत हो गई। भिंडर कलां गांव के एक मजदूर मखण खान का निधन हो गया। वह परिवार में एकमात्र रोटी कमाने वाला था। पिता व भाई की मौत के बाद भिंडर कलां के किसान मखण खान के सिर अपने और बड़े भाई स्व. दर्शन खान के परिवार को पालने की जिम्मेदारी थी। मरहूम मखण खान के संयुक्त परिवार में 4 लड़के और दो लड़कियां हैं। बेटियों की शादी हाल ही में मखण खान ने कर दी थी। मखण खान पर लाखों रुपये का कर्ज़ भी था।

6 जनवरी को बठिंडा के गांव मंडी कलां के एक नौजवान की दिल्ली मोर्चे में से वापस आते हुए दिल का दौरा पड़ने के कारण मनप्रीत सिंह (24) पुत्र गुरदीप सिंह। मनप्रीत के पास बहुत कम खेत था और उसका परिवार कर्ज़ के बोझ से दबा हुआ था। 

8 फरवरी को सतगुरु सिंह पुत्र रुदा सिंह की हर्ट अटैक से मौत हो गयी। वो संगरुर जिले के शेरोन गांव के निवासी थे। वो छोटी जोत के किसान थे और उन पर 7 लाख रुपये का कर्ज़ था। 

9 मार्च को टिकरी बॉर्डर पर 52 वर्षीय गुरचरण सिंह फानी पुत्र बलकार सिंह की मौत हर्ट अटैक से हो गयी। अमरगढ़ संगरुर जिला के भटिटियन खुर्द गांव के निवासी थे। 1.5 एकड़ जमीन के मालिक गुरचरण पर 25 लाख रुपये का कर्ज था। 

अप्रैल मई में गरीबी और कोरोना ने मिलकर किया शिकार

मार्च के आखिरी सप्ताह से अप्रैल के पहले पखवारे तक दिल्ली का पारा 38 से 40 डिग्री तक चढ़ा हुआ था। बेतहाशा गर्मी में हाईवे पर बैठे किसान लू और गर्मी से मरे। साथ ही कोरोना ने भी किसानों को अपना शिकार बनाया। अप्रैल-मई में हुयी अधिकांश मौतें हर्ट अटैक और बुखार से हुयीं।  

11 अप्रैल को भूमिहीन कृषि मजदूर लखवीर सिंह लक्खी पुत्र जसपाल सिंह म्र 36 वर्ष की हर्ट अटैक से टिकरी बॉर्डर पर मौत हो गयी थी। वो मलौद गांव के धौल खुर्द के निवासी थे। लक्खी सिंह कर्ज के चलते अपनी ज़मीन से हाथ धो बैठे थे।

29 मई को 25 वर्षीय मोमिता बसु पुत्री उत्पल बसु की टिकरी बॉर्डर पर फेफड़े में संक्रमण से अस्पताल में मौत हो गयी। 27 अप्रैल को गुर्जन्त सिंह (50 वर्ष) टिकरी बॉर्डर पर और 28 अप्रैल को निशान सिंह (48 वर्ष) की कोरोना से मौत हो गयी थी। 

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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