खुलने लगी हैं सांसद डेलकर की खुदकुशी की पर्तें, मोदी के विश्वस्त रहे प्रफुल्ल पटेल की तरफ घूमी सुई

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सांसद मोहन डेलकर की आत्महत्या का राज खुलने लगा है और शक की सुई गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी के सबसे विश्वस्त सहयोगी रहे प्रफुल्ल पटेल की तरफ मुड़ गई है। यह NCP वाले प्रफुल्ल पटेल नहीं हैं, यह हैं गुजरात के पूर्व गृह राज्य मंत्री ‘प्रफुल्ल खोड़ा पटेल’ जो इस वक्त दमन दीव दादरा नगर हवेली के प्रशासक के पद पर बैठे हुए हैं।

कल महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख ने यह बात कही है कि सांसद मोहन डेलकर की आत्महत्या के मामले में दादरा और नगर हवेली के प्रशासक प्रफुल्ल पटेल की भूमिका की जांच की जाएगी। देशमुख ने कहा कि सात बार सांसद रहे डेलकर ने अपने सुसाइड नोट में कुछ मुद्दे उठाए हैं। दादरा नगर हवेली के पुलिस अधीक्षक, जिलाधिकारी आदि का नाम सुसाइड नोट में लिखा है। खासतौर पर उन्होंने वहां के प्रशासक प्रफुल्ल पटेल के नाम का उल्लेख किया है।

अब सब साफ समझ में आ रहा है कि हमारा राष्ट्रीय मीडिया मोहन डेलकर की आत्महत्या की असली वजह जनता को बताने के बजाए क्यों उस पर कुंडली मार कर बैठ गया था, क्योंकि अगर जनता यह जान जाए कि प्रफुल्ल पटेल की प्रशासक के पद पर किस प्रकार से गलत नियुक्ति की गई है तो ही तस्वीर पूरी तरह से साफ हो जाती है कि इस केस में क्या छुपाया जा रहा है।

पहले यह जान लीजिए कि प्रफुल्ल खोड़ा पटेल गुजरात के मुख्यमंत्री के कितने विश्वस्त सहयोगी रहे हैं। आप को जानकर यह आश्चर्य होगा कि 2010 में जब गुजरात के गृह मंत्री अमित शाह को सीबीआई जांच के कारण इस्तीफा देना पड़ा तो उनकी जगह मोदी ने प्रफुल्ल पटेल को ही गुजरात में गृह राज्य मंत्री नियुक्त किया। वे हिम्मतनगर के विधायक थे। उन्हें ठीक वही पोर्टफोलियो भी आवंटित किए गए जिन विभागों को पूर्व मंत्री अमित शाह ने संभाला था। साफ है कि वह उस वक्त मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के सबसे पसंदीदा विधायक थे।

2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भाजपा के पूर्व सदस्यों को तीन संघ शासित प्रदेशों में प्रशासक के रूप में नियुक्त किया। यह संवैधानिक परंपरा का साफ-साफ उल्लंघन था, क्योंकि अब तक यह पद आईएएस अधिकारियों को दिया जाता है।

गृह मंत्रालय की वेबसाइट भी कहती है कि दमन और दीव, दादरा और नगर हवेली और लक्षद्वीप पर संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार IAS अधिकारियों के माध्यम से प्रशासित किया जाता है, जिन्हें प्रशासक के रूप में नियुक्त किया गया है, लेकिन मोदी सरकार ऐसी परंपरा को तोड़ने के लिए कुख्यात रही है। दादरा नगर हवेली के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि किसी नेता को प्रशासक बनाया गया हो।

2019 में हुए लोकसभा चुनाव में दादरा नगर हवेली के प्रशासक प्रफुल्ल पटेल ने दादरा और नगर हवेली में नियुक्त आईएएस अधिकारी कन्नन गोपीनाथन पर दबाव बनाने की कोशिश की। इस मसले पर चुनाव आयोग को सामने आना पड़ा। चुनाव आयोग ने प्रशासक प्रफुल्ल खोदाभाई पटेल को निर्देश दिया था कि वह दादरा और नगर हवेली कलेक्टर कन्नन गोपीनाथन को जारी किए गए नोटिस को वापस ले लें, ताकि विभिन्न ‘आधिकारिक कार्यों’ पर उनके निर्देशों का पालन न किया जा सके।

उसी वक्त से कन्नन गोपीनाथन बीजेपी की आंखों में कांटे की तरह गड़ गए थे। गोपीनाथन ने दादरा नगर हवेली में निष्पक्ष रूप से चुनाव करवाए। इसी चुनाव में मोहन डेलकर ने बीजेपी प्रत्याशी को जीत की हैट्रिक लगाने से रोका और जीत दर्ज की। कन्नन को बाद में इस्तीफा देना पड़ा, लेकिन इसके बाद से ही सांसद मोहन डेलकर भी उनके राडार पर आ गए।

आदिवासी सांसद मोहन डेलकर पर लगातार दबाब बनाया गया। उन्होंने संसद के अपने भाषण में इस बात का जिक्र किया है कि किस तरह से पिछले डेढ़ साल से उन पर दबाव बनाया जा रहा है और परेशान किया जा रहा है।

दादरा नगर हवेली एक यूनियन टेरेटरी है, जिसका यह भी इतिहास रहा है कि कोई आईएएस तीन वर्ष से अधिक प्रदेश में नहीं रहा है, किंतु प्रशासक प्रफुल्ल पटेल को प्रदेश में साढ़े तीन साल से भी अधिक हो गए थे।

जुलाई 2020 में सांसद डेलकर ने वीडियो जारी कर संघ प्रदेश दादरा नगर हवेली एवं दमण-दीव के प्रशासक प्रफुल्ल पटेल पर आरोप लगाते हुए यहां तक कह डाला कि वे प्रशासनिक मनमर्जी के खिलाफ आगामी लोकसभा सत्र में अपना इस्तीफा सौंप देंगे। प्रशासक पटेल के निर्देश पर संघ प्रशासन उन्हें एवं उनके समर्थकों को तयशुदा टारगेट बना रहा है। प्रशासन उन पर आतंकवादी जैसी कार्रवाई कर रहा है। उन्होंने संसद में भी अपनी व्यथा को प्रकट किया, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।

सुनवाई होती भी कैसे? …जब प्रशासक प्रधानमंत्री के इतने विश्वस्त सहयोगी रहे हैं। अन्ततः डेलकर इतने विवश हो गए कि आत्महत्या करनी पड़ी। शायद अब ईश्वर की अदालत में ही उनका न्याय होगा….!

(गिरीश मालवीय स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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