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मुंबई में हस्तियों ने सुनी नफरत के शिकार लोगों की दास्तान, जुर्म के खिलाफ मिलकर लिया लड़ाई लड़ने का संकल्प

मुंबई। देश में बढ़ती नफरत की सियासत के विरोध में डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया यानी डीवाईएफआई ने राष्ट्रीय अधिवेशन का आयोजन किया। अधिवेशन का विषय था “जुर्म-ए-नफरत में सरकार की मिलीभगत।” इस मौक़े पर DYFI ने देश भर से भीड़ के शिकार हुए उन परिवारों को एकत्र किया था जिन्होंने अपने को धर्म और जाति के नाम पर अपनों को खोया था।

कार्यक्रम दादर पश्चिम में मराठा समाज हॉल में रखा गया था। कार्यक्रम को दो सत्रों में विभाजित किया गया था। पहले सेशन की अध्यक्षता DYFI के राष्ट्रीय अध्यक्ष मोहम्मद रियाज़ ने की। इस आयोजन में पीड़ितों के अलावा उन लोगों को भी शामिल किया गया था जो कभी बीजेपी या सांप्रदायिक संगठन में थे लेकिन अब उनका मोहभंग हो गया है।

इसी कड़ी में 2002 गुजरात दंगे में दंगाईयों का चेहरा बनने वाले अशोक परमार उर्फ मोची भी आमंत्रित थे। अशोक परमार अब किसी हिन्दू संगठन से नहीं जुड़े हुए हैं।

उनका कहना है उनके बारे में मीडिया ने भ्रम फैलाया था यह तस्वीर आक्रोश की है लेकिन मुस्लिमों के खिलाफ आक्रोश नहीं था गरीबी के खिलाफ था। 2002 में भी मैं मोची का काम करता था रोज कमाता था रोज खाता था। दंगे के कारण मेरा मोची काम बंद हो गया था। मेरी तरह न जाने कितने लोग थे जिनकी रोज़ी रोटी बंद हो गई थी। अशोक एक दलित हैं जो वामपंथ से जुड़ गए हैं। 2014, मार्च में केरल में CPM के एक कार्यक्रम में मुसलमानों से खेद व्यक्त किया था। आशोक ने मराठा हॉल में नफरत की राजनीति के खिलाफ बोलते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को चुनौती देते हुए कहा, “जिस गुजरात ने आप को जन्म दिया उसी गुजरात ने महात्मा गांधी और मोहम्मद अली जिन्नाह को भी जन्म दिया है उसी गुजरात में मैं भी पैदा हुआ हूं। आप अभिमान छोड़ कर देश हित में काम करो हिन्दू मुस्लिम बंद करो।”

अधिवेशन में अयूब मेवाती ( जिसे 2016 में अहमदाबाद के आनंद नगर में बकरा ईद से एक दिन पहले गौ रक्षकों की एक भीड़ ने जान से मार दिया) के भाई आरिफ मेवाती ने बताया कि मेरे भाई को गाय की तश्करी के शक में गौ रक्षकों ने मारा था और सरकार अपराधियों के पक्ष में दिखी।

ऊना में चार दलितों की पिटाई से पूरा देश गुस्से में था बड़ा आन्दोलन भी हुआ था। ऊना अत्याचार के शिकार वशराम सरवैय्या ने बताया कि किस प्रकार से पुलिस संरक्षण में सिर्फ चार भाई ही नहीं उनके मां बाप सहित परिवार के कई लोगों की पिटाई की गई थी। 2016 में इसी अत्याचार के विरोध में दलितों ने अहमदाबाद से ऊना की पद यात्रा की थी जिसका नेतृत्व जिग्नेश मेवानी ने किया था।

ट्रेन में फरीदाबाद के हाफिज जुनैद की भीड़ द्वारा पिटाई की गई थी जिस कारण जुनैद की मौत हो गई थी। जुनैद के भाई नफीस और कासम ने बताया कि कैसे उसके भाई को धर्म के नाम पर मारा गया था। पुणे के इंजीनियर सादिक शेख के मामू शाहनवाज़ शेख ने भी मोहसिन के क़त्ल की दास्तान सुनाई जिसे 2014 अर्थात मोदी युग के शुरू में मुस्लिम होने के कारण मार दिया गया था।

विलास वयतंडे (सतारा, महाराष्ट्र) और सतीश (तमिलनाडु) ने भी अपने भाइयों के क़त्ल की कहानी सुनाई जिन्हें जाति के कारण मार दिया गया था। नितिन आगे के पिता राजू आगे ने अपने बेटे के क़त्ल की दास्तान सुनाई।

बुलंदशहर में हिन्दू कट्टरवादी संगठन द्वारा इंस्पेक्टर सुबोध कुमार की हत्या कर दी गई थी। कुमार की पत्नी रजनी सिंह बीमारी के कारण मुंबई नहीं पहुंच सकी थीं। रजनी सिंह ने वीडियो संदेश से संबोधन कर नफरत की लड़ाई में साथ खड़े रहने का आश्वसन दिया।

आईपीएस ऑफिसर तथा गुजरात में मोदी एंड कंपनी के खिलाफ बगावत करने वाले संजीव भट्ट की पत्नी श्वेता भट्ट ने कहा, “मैं यहां एक पत्नी के तौर पर उपस्थित हूं।” उन्होंने संजीव भट्ट को दी गई उम्र कैद को गलत बताया। मेडिकल एविडेन्स नहीं जांचे गए, 300 गवाहों में से केवल 30 गवाह को कोर्ट में बुलाया गया। हमें उलट जांच का मौका नहीं मिला। तीस साल पुराना केस है। जब वह नौकरी पर नये-नये थे नौकरी ज्वाइन किए 15 दिन हुए थे। कस्टडी से उनका कोई लेना देना नहीं था। वह आदमी जमानत पर छूटने के 18 दिन बाद अपनी मौत से मरा था। फिर भी जानबूझ कर उनके सिर मढ़ दिया। मैंने तय कर लिया है कि संजीव को वापस लाऊंगी किसी भी मूल्य पर। ”

पीड़ितों में सुबोध कुमार सिंह की पत्नी रजनी सिंह, बेटे अभिषेक प्रताप सिंह और श्रेय प्रकाश सिंह जुनैद के परिवार के सदस्य मोहम्मद नफीस और मोहम्मद कासम, मोहम्मद शेख के परिवार के सदस्य शाहनवाज शेख, ऊना के पीड़ित वैश्राम, अशोक और पीयूष सरवैय्या अयूब मेवाती के परिवार के सदस्य आरिफ मेवाती, नितिन आगे के परिवारी राजू आगे, अमित व्यतंडे के पिता विलास व्यातंडे सवर्णों द्वारा मारे गए अशोक के भाई सतीश, जातीय उत्पीड़न के शिकार सत्यभामा इस मौके पर मौजूद थे और इन सब ने अपनी बात रखी।

दूसरे सत्र की अध्यक्षता सुभाषिनी अली ने किया।

पहले और दूसरे सेशन के दरम्यान फिल्म अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने कहा, “जो इन लोगों ने झेला है। इनके मुकाबले हमने कुछ भी नहीं झेला। दो प्रतिशत भी नहीं। मैं आज इस प्रोग्राम में पीड़ितों के साथ शामिल होकर गर्व अनुभव कर रहा हूं। मेरी भी बहुत से लोग निंदा करते हैं। देशद्रोही कहते हैं। पाकिस्तान भेजने की बात करते हैं लेकिन मेरी पीड़ा के मुकाबले इनकी पीड़ा जिनके अपने भीड़ के शिकार हुए हैं उनकी पीड़ा बहुत बड़ी है। मैं इनके साहस को सलाम करता हूं। मेरी संवेदना इन सभी के साथ है।” बात रखने के बाद सभी पीड़ितों से नसीरुद्दीन शाह ने हाथ मिलाया। शाह के लिए अशोक मोची आश्चर्य चकित करने वाले मेहमान थे। शाह ने अशोक मोची के बारे में कलीम सिद्दीकी से विस्तृत जानकारी हासिल की।

तीस्ता शीतलवाड ने अपने संबोधन में कहा, “इस सरकार ने तो अपनी ही अवाम के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया है। पीड़ित किसी एक धर्म के नहीं हैं। हमें समझना चाहिए मॉब लिंचिंग पर कानून पर कानून बनाने की उठ रही मांग पर तीस्ता ने कहा कि यदि UPA सरकार में दंगा विरोधी कानून बना होता तो आज यह दिन नहीं देखने पड़ते। इस प्रकार की घटनाओं पर कुछ हद तक लगाम लगाई जा सकती थी। तीस्ता ने असम में नागरिकता के नाम पर बंगाली, हिन्दी भाषी और असमियों समेत 40 लाख लोगों की नागरिकता खतरे में होने तथा मीडिया चुप्पी पर सवाल खड़ा किया।

डॉक्टर राम पुनियनी ने अटल बिहारी पर चुटकुले से अपनी बात शुरू की। उन्होंने बताया, “अटल जी को जब अमेरिका में गाय का बीफ परोसा गया तो साथी ने गाय के बीफ की जानकारी दी तो अटल जी ने कहा कि माता तो भारत की गाय है। अमेरिका की गाय थोड़े ही माता है।” पुनियानी ने आगे कहा, “भाजपा दुनिया की नंबर 1 पार्टी है और बीफ़ निर्यात में न.1 है, लिंचिंग में भी न. 1 है। इनका राष्ट्रवाद दलित, आदिवासी, महिला एवं मुस्लिम के अधिकारों को छीन रहा है। आरएसएस का जन्म समता आन्दोलन के विरोध में और राजे-महाराजे, ज़मींदारों के हितों को साधने के लिए हुआ था। सामाजिक आन्दोलन से सरकार की दिशा तय होती है। इसलिए सामाजिक आन्दोलन भी ज़रूरी है।” अन्य अतिथियों में लेखिका प्रतिमा जोशी, मरियम धवले, एडवोकेट मुक्ता दाभोलकर, निवृत सुप्रीम कोर्ट न्यायधीश श्री गोपाल गौड़ा इत्यादि उपस्थित रहे और उन्होंने अपना वक्तव्य रखा।

सम्मेलन में शामिल देश की बड़ी हस्तियों में सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस गोपाल गौवडा, सुभाषिनी, डॉ. राम पुनियानी, एडवोकेट मुक्ता दाभोलकर, नसीरुद्दीन शाह, तीस्ता सीतलवाड़, श्वेता भट्ट, मरियम धावले, प्रतिमा जोशी और कलीम सिद्दीकी प्रमुख थे।

मुख्य आयोजक प्रीति शेखर थीं। अधिवेशन के अगले दिन जब वह और उनके पति नौकरी पर गए हुए थे और बेटा कॉलेज तो पांच पुलिस जिसमें एक महिला पुलिस भी शामिल थी, अपार्टमेंट में उनके साथ दुर्व्यवहार करने की कोशिश की। उन्होंने बताया कि उनके अनुसार मैं फरार हूं और मैं इस अपार्टमेंट में छुपा हुआ हूं। जब मुझे उनसे फोन पर बात करने का मौका मिला तो प्रीति ने कहा हमें क्रिमिनल न समझा जाए ( 2013 में एक शांतिपूर्ण मार्च को लेकर वारंट था)। प्रीति ने फोन पर ही अगली तारीख पर कोर्ट या पुलिस स्टेशन में हाजिर हो जाने को कहा। जिसके बाद यह मामला सुलझ गया। प्रीति ने यह जानकारी फेसबुक के माध्यम से दी।

(अहमदाबाद से कलीम सिद्दीकी की रिपोर्ट।)

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